पाठक संख्या

नई प्रस्तुति

कुछ प्रमुख लेख

एक नज़र यहाँ भी डालें

राजेश झरपुरे की कविताएं





रोशनी के लिए
पेड़
जंगल की ताकत हैं
वे ही सूरज का ताप निगलकर
झुलसते हुए भी
ललकारते हैं मेघों को
और पृथ्वी लहलहा उठती है।

कोयला खान की सुरंग के अंधेरे
रोशनी की ताकत हैं
भूगर्भ से
खनिक खोदकर लाते हैं- कोयला
तो कल-कारखानों की मशीनें
और हमारे घर के ट्यूब लाइट्स
जगमगा उठते हैं।

पेड़ों को काटकर
जंगल को नहीं बचाया जा सकता
और खनिकों के हाथ से
छीनकर कुदाल(रोज़गार)
रोशनी को नहीं बचाया जा सकता।

अब तुम्ही बताओ दोस्तो
पेड़ और कुदाल के बीच
कुल्हाड़ी का क्या काम...?
***
मुश्किल समय में

जिन्होंने चाहा
डर डरकर जीना
वे सब आलिशान गलियारे के
अन्दर और बाहर बैठे रहे।

उन्होंने
सहमति और समझौते का
जीवन चुना।

वे सदैव
झुककर चलते
और अपनी आँख
ज़मीन पर
गड़ाये रखते।

वे जब भी देखते
सड़कों और चौराहे पर
धर्म की ध्वजा
ले जाती उन्मादित भीड़ को
उनके हाथ स्वत: उठ जाते
और उनके मुख से निकले
जयकारे के शब्दभेदी बाण
आसमान को चीरकर रख देते।
इन डरे हुए दिनों में
बड़ा मुश्किल और नामुमक़िन है
असहमत होकर
आलिशान शामियाना के
विरोध में बैठे लोगों को
डरा देना
जो डर डरकर कभी नहीं जीते।
****
डर

डर
वहाँ नहीं होता
जब आप किसी पहाड़ी पर खड़े
संतुलन खो बैठते हैं
और नीचे धरा को देखकर
सिहर उठते हैं।

जब आप
किसी गहरे कुएँ की
जगत पर खड़े
सहसा अन्दर झाँककर
पानी की सतह को देखकर
काँप उठते हैं
तब भी
डर भूगर्भ में
नहीं होता।

डर
बन्दूक की
नली में भी नहीं होता
जो सीधे
आपकी कनपटी पर
हत्यारा धर देता है
और आप
ट्रीगर दबने के पहले ही
मर जाते हैं।

दरअसल
डर तुम्हारे भीतर ही
कहीं छुपा बैठा होता है
जो सदा
तुम्हें धमकाता रहता
कभी कर्म से
कभी धर्म से
कभी षड्यंत्र से।

यह डर
जो तुम्हारे भीतर समाया है
पहाड़ों से भी ऊँचा
भूगर्भ से भी गहरा
और हत्यारे की
गोली से भी ज़्यादा
ख़तरना़क और जहरीला है।

क्या...
तुम सचमुच
डरे हुए हो...?
*****

समझ

आप अकेले
हँस नहीं सकते
हँसने के लिए
लेना होगा
अनुमति अनिवार्य
रोना हो तो
खुशी से रोयें
पर नहीं पड़ना चाहिए
राज़-काज में व्यवधान
अन्यथा
भुगतना पड़ेगा दंड।

यद्यपि यह कोई राजाज्ञा नहीं
पर कुछ तो समझ
आप में भी होनी चाहिए।
*****

उसका दु:खी होना

जो उसका नहीं था
उसके खोने के विचार से
उदास था- वह

जो उसने पाया नहीं
उसके गुम जाने का ख़याल कर
दु:खी था- वह

इस तरह भी
बेमतलब उदास और दु:खी
होते हैं- आदमी
यह मैंने
स्वयं के अन्दर उतर कर जाना।

टिप्पणियाँ


सहयोग कोई बाध्यता नहीं है। अगर आप चाहते हैं कि 'मंतव्य' का यह सिलसिला सतत चलता रहे तो आप स्नेह और सौजन्यता वश हमारी मदद कर सकते हैं।

अपने सुझाव/प्रस्ताव भेजें

नाम

ईमेल *

संदेश *

संपादक

आपकी मेल पर नई रचनाओं की जानकारी मिलती रहे, इसलिए ईमेल के साथ सब्सक्राइब कर लें

काली मुसहर का बयान

लोकप्रिय

आज के यथार्थ का पूर्वाभास अर्थात् प्रेमचंद की प्रारंभिक कहानियाँ और यथार्थवाद (‘हार की जीत’ तथा ‘नमक का दारोगा’ के बहाने एक बातचीत)

कहानी कला (भाग- एक, दो और तीन) - प्रेमचंद

संवेदना की नई परिभाषा गढ़ती कहानियाँ

जयशंकर प्रसाद की कहानी 'पाप की पराजय'

एक मशहूर बाल रोग चिकित्सक का बचपन

ज्ञानरंजन की कहानी 'घंटा'

‘कफ़न’ को यहाँ से पढ़ें

प्रज्ञा गुप्ता की कविताएँ

प्रेमचंद की कहानी 'शतरंज के खिलाड़ी'

डॉ. रामदरश मिश्र - बड़े लेखक, बड़े मनुष्य