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डाउन सिंड्रोम : समाज में जागरूकता का एक प्रयास

 

अनवर सुहैल 


विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है। यह 2007 से मनाया जा रहा है। इसका अर्थ ये हुआ कि दुनिया में इस व्याधि के बारे में बहुत बाद में जागरूकता आई। इसके पूर्व इस डाउन सिंड्रोम को लोग छुपा लिया करते थे। 
          अब दुनिया भर में जो प्रयास किये जा रहे हैं, उसके कारण डाउन सिंड्रोम से ग्रसित लोगों को अब बीमार या सामाजिक रूप से त्याज्य नहीं माना जाता है। डाउन सिंड्रोम एक ऐसी स्थिति है जिससे ग्रसित व्यक्ति को सारे समाज से स्वीकार्यता मिलनी ही चाहिए। डाउन सिंड्रोम जिसे ट्राइसोमी 21 के नाम से भी जाना जाता है, डाउन सिंड्रोम एक आनुवंशिक विकार है जिससे पीड़ित व्यक्ति के पास एक अतिरिक्त गुणसूत्र (क्रोमोसोम) या गुणसूत्र का एक अतिरिक्त टुकड़ा होता है। यह विभिन्न शारीरिक और संज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) समस्याओं को जन्म देता है, जिसमें विकास में देरी, बौद्धिक अक्षमताएं, चेहरे की विशिष्ट विशेषताएं जैसे कि तिरछी आँखें और एक सपाट नाक एवं हृदय दोष और थायराइड की समस्या आदि शामिल हैं।  डाउन सिंड्रोम वाले व्यक्तियों को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, कई लोग उचित समर्थन और संसाधनों के साथ पूर्ण जीवन जीते हैं। प्रारंभिक हस्तक्षेप कार्यक्रम और समावेशी (इन्क्लूसिव) शिक्षा उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करती है और उन्हें समाज में सकारात्मक योगदान देने में सक्षम बनाती है।
          हिंदी साहित्य में इस विषय पर लिखा ही नहीं गया है। मुक्तिबोध ने कहा था कि हमारे समय में विषयों की कमी नहीं है, फिर भी हमारा उपलब्ध हिंदी साहित्य नए और चैलेंजिंग विषयों पर क्यों नहीं लिखता है? उस पर तुर्रा ये कि साहित्य के तथाकथित मठाधीश हिंदी में नोबल पुरुस्कार पाने की लालसा भी पाले रहते हैं। कोई साहित्य तभी बहुआयामी होता है जब वह समाज के हर कोने की पड़ताल करता है और खासकर उस समाज के हाशिये पर पड़े लोगों की समस्याओं को भी मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिशें करता है।
         डाउन सिंड्रोम विषय पर छत्तीसगढ़ कैडर के सेवानिवृत प्रशासनिक अधिकारी संजय अलंग ने एक उपन्यास  "चलो साथ चलें" की रचना की है। इसके पूर्व संजय अलंग ने इतिहास और संस्कृति पर दस से अधिक किताबें लिखी हैं। उनके तीन कविता संग्रह भी प्रकाशित और चर्चित हैं। कथा या उपन्यास लेखन क्षेत्र में यह उनका पहला कदम है और विश्वास नहीं होता है कि इतना सुगठित और सहज उपन्यास पहली बार का प्रयास है। 
अपने व्यस्ततम सेवा काल में संजय अलंग को भारत के माननीय राष्ट्रपति जी द्वारा दिव्यान्ग जनों और वृद्ध जनों के लिए किये गए विशेष कार्यों के लिए पृथक-पृथक वर्षों में सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। 
          संजय अलंग की चिंताओं को समझने के लिए हमें उनकी कविताओं को भी उतना ही समझना होगा। उनके चयनित विषयों में कवि के भीतर,  पंक्ति  के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच पाने की ललक है, बेचैनी है।  संजय अलंग के पास संवेदना की अपनी अर्जित भाषा है, जिसके सहारे वह अभिव्यक्ति की चुनौतियों को स्वीकार करते हैं और ऐसे वितान रचते हैं कि साधारण से साधारण जन तक अपनी बात पहुँचा पाते हैं। 
           "चलो साथ चलें' उपन्यास यदि कोई दूसरा हिंदी लेखक लिखता तो इसे दर्द और कराह का एक मूर्त रूप बना देता किन्तु संजय अलंग, दिलो-दिमाग में छाई बेचैनियों को प्रताड़ना के लसलसे प्रवाह में नष्ट नहीं होने देते हैं बल्कि वह एक राह तलाशते जाते  हैं जिससे समस्या को समझा जा सके और उसके निदान का सहज सकारात्मक प्रयास किया जा सके। यह एक चिकित्सक के परामर्श की तरह है न कि किसी कथावाचक  के करुण रूदन की गूँज है। 
           मर्सी और नलिन के प्रथम  शिशु सन्नी के जन्म की कहानी है "चलो साथ चलें"। जब उनके परिवार को ज्ञात होता है कि उनकी बिटिया सन्नी सामान्य बच्ची नहीं है बल्कि उसे डाउन सिंड्रोम है, तब मर्सी और नलिन के जीवन में जैसे कोई अप्रत्याशित हमला सा होता है। मर्सी और नलिन के परिजन भी इस वज्रपात को झेलने की कोशिशें करते हैं। यहीं से बेचैनियों को दूर करने की राह तलाशने में लग जाते हैं। मर्सी का जन्म एक सामान्य डिलीवरी से हुआ था। हाँ, गले में नाल फंसने से डॉक्टर को फोरसेप्स की सहायता लेनी पड़ी थी। यह एक सामान्य प्रक्रिया है इससे कोई घातक रोग नहीं होता है किन्तु शुरू में मर्सी और नलिन को यही लगा कि नवजात बिटिया सन्नी के जीवन में जो असामान्यता है, उसके पीछे गले में नाल फंसने के कारण तो नहीं हुई है?
          नवजात शिशु को प्रथम बार मर्सी ने देखा तो "उसे यह रूप-रंग थोडा अलग हट कर लगा। उसने गौर किया तो फीचर भी अलहदा से लगे। गोल सी नाक, फूला और गोल चौड़ा चेहरा, मचमचाती हुई सी छोटी आँखें। मर्सी को कुछ अजीब तो लगा पर अभी वह ममत्व में डूबी अच्छा महसूस कर रही थी और मातृत्व का आनंद ले रही थी।" (पृष्ठ 21)
            मर्सी के पति नलिन के पैर में एक छोटे एक्सीडेंट के कारण प्लास्टर चढ़ा था,  मर्सी और शिशु से मिलने के लिए वह भी बेचैन थे और डॉक्टर से परामर्श लेकर जबलपुर से नागपुर आने के लिए गाडी बुक कर ली गई थी। मर्सी की सास ने जब सन्नी को देखा तो काफी प्रसन्न हुईं - "बहुत गोरी और प्यारी है." 
           लेकिन कुछ देर बाद नलिन की माँ ने कहा--"बच्ची की आँखें ज्यादा हेज़ी हैं। धुंधली सी, ब्राईट नहीं हैं। डल हैं। अलग तरह का इफेक्ट दे रही हैं। फीचर भी बहुत अलग से हैं। भारीपन तो हैं ही, आकार भी फैला सा है। नलिन तुम भी ज़रा ध्यान से देखना।"
          यहीं से शुरू होती है एक नवजात शिशु के कारण उत्पन्न हुई नई समस्या। यह समस्या इस परिवार भर की नहीं थी बल्कि यह एक ऐसी बात थी कि जिसे समाज बड़े अविश्वास से कहता रहता है -"ऐसा मेरे साथ क्यों ?" या "हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ?" यह ऐसा सवाल है जो बड़े-बड़ों के आत्मविश्वास को हिला के रख देता है। परिवार में सब्र करने का जज़्बा न हो तो फिर समस्या बड़ी विकराल हो जाती है। सन्नी मर्सी और नलिन की पहली संतान है। मर्सी और नलिन के माता-पिता ने इस पूरे समय में बड़ी शालीनता के साथ प्रसूति को सर-आँखों पर बिठाया। हर तरह के चिकित्सकीय परामर्श का अक्षरशः पालन किया, फिर ऐसा क्यों हुआ? वे इस घटना को जस्टिफाई नहीं कर पा रहे थे और एक अनोखे दुःख की गिरफ्त में फंसते चले जा रहे थे। 
           इस विषय पर उपन्यास की रचना करना एक चैलेंजिंग कार्य है। इसमें समस्या के प्रतिरूप शिशु की दयनीयता, शिशु के रिश्तेदारों का अरण्य-रूदन, समाज की नकारात्मकता  से प्रसंगों का वितान नहीं बुना गया है बल्कि संजय अलंग की लेखनी से डाउन सिंड्रोम से प्रभावित शिशु और उसके परिजनों के दुखों को तो शिद्दत से लिपिबद्ध किया है। इस जटिल स्थिति में शिशु के माता-पिता, अन्य रिश्तेदार और समाज की वास्तविकता से एक साथ कथाकार संजय अलंग भी जूझते हैं और "चलो साथ चलें" की गुहार के साथ एक नई राह खोजते जाते हैं। 
            सर्वप्रथम इस परिस्थिति में नवजात शिशु के सभी परिजन एक साथ खड़े होते हैं। बच्ची की स्थिति के लिए हिन्दुस्तान में उपलब्ध चिकित्सा और चिकित्सा पद्धति को आपसी परामर्श से तलाश करते हैं। जबलपुर, नागपुर और मुंबई तक शिशु के लिए बेहतर उपचार की जो व्यवस्था है, उसे अंगीकार करते हैं। नागपुर के डॉक्टर ने कह दिया था कि शिशु सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही है। मर्सी और नलिन ने जबलपुर के डॉ कुंडू को भी बिटिया को दिखलाया। डॉ कुंडू ने कहा- "देखिये नागपुर में भी डॉक्टर का मत सही था। सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही है।"
           फिर उन लोगों ने मेडिकल कालेज में डॉक्टर लवली मेहरा को भी दिखलाया। डॉ. मेहरा ने सामान्य चेकअप के बाद महत्वपूर्ण बात कही- "डाउन सिंड्रोम ही है। अब आप सन्नी को इसी तरह देखना प्रारंभ करें। उसके लिए आगे क्या और कैसे करना है, यह देखें। इसके साथ अनुकूल हों। शॉक और गिल्ट से आप लोगों को बाहर आना होगा। समाज में मूव्ड करें तो सहजता बढ़ेगी।"
           हिम्मत और धैर्य से काम लेने की सीख मिली। यह सच है कि समाज इसके लिए तैयार नहीं है, इसलिए मित्रों, रिश्तेदारों और आसपास के लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना ही उचित होगा। 
           दंपत्ति को जब यह खबर मिली कि मुंबई में कोई एक विदेशी डॉक्टर हैं जो इस तरह के मामलों में बेहतर दखल रखते हैं, तब नलिन और मर्सी ने सन्नी को लेकर मुंबई पहुंचे। डॉ कोसिमो ने भी बतलाया कि सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही है और वे सन्नी के इलाज के लिए योजना बना रहे हैं। काफी महँगी विदेशी दवाएं मंगवा कर सन्नी का इलाज किया गया और साथ ही फ़िजिओथेरेपी के ज़रिये मरीज़ के दिमाग और शारीर की सामान्य क्रियाओं को कुछ बेहतर एक्टिव रखने और विकसित करने के लिए विभिन्न तरह की थेरेपी की भी ज़रूरत पूरी करने के लिए डॉक्टर के परामर्श से अणिमा मुले का पता भी मिल गया। 
             "चलो साथ चलें" उपन्यास एक कथानक के अलावा डाउन सिंड्रोम से लड़ने के लिए एक पथ प्रदर्शक गाइड की तरह है। घटनाक्रम से गुज़रते हुए कई बार ऐसा लगता है कि उपन्यास में वर्णित "की वर्ड्स" को गूगल में सर्च किया जा सकता है। इतना वास्तविक वर्णन है कि संजय अलंग ने वाकई इस उपन्यास की संरचना के लिए छोटी से छोटी डिटेल को भी मिस नहीं किया है। 
             डाउन सिंड्रोम से ग्रसित बच्चे को सामाजिक मान्यता दिलाने और ऐसे अभिभावकों को भी घरों से निकालना जो अपने घरों में ऐसे बच्चों को छुपा कर रखते हैं, चुनौतीपूर्ण है। लोकलाज और मर्यादा जैसी रुढि़यों के चलते ऐसे अभिभावक बड़े शातिर तरीके से अपने डाउन सिंड्रोम ग्रसित बच्चों को मुख्यधारा से अलग रखते थे। नलिन और मर्सी के सद्प्रयासों ने ऐसे गुम किये गए बच्चों को डाउन सिंड्रोम प्रबंधन जैसी संस्थाओं की देख-रेख करने के लिए बाहर निकाला। उपन्यास का सूत्र वाक्य है --"सार्थक जीवन की आदत पड़ जाने पर सकारात्मक प्रयास भी सहज ढंग से सूझते हैं।"
             इस बीच मर्सी पुनः गर्भवती होती है। सन्नी की असामान्य दशा के कारण मर्सी चिंतित थी और वे लोग यह चाहते थे कि गर्भ में पल रहा भ्रूण कहीं डाउन सिंड्रोम का शिकार तो नहीं है? ऐसा परीक्षण मुंबई में होता है। मुंबई से रिपोर्ट आई कि स्थिति सामान्य है लेकिन गर्भावस्था के अंतिम चरण में मर्सी को गर्भपात की स्थिति से गुज़रना पड़ा जिससे वह परिवार बुरी तरह से टूट गया था। 
            जबलपुर के डॉक्टर राधा होतवानी से जब वे मिले तो उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में उनका सुझाव है कि मर्सी पुनः शीघ्र ही कंसीव करने का प्रयास करें वर्ना आगे जाकर काम्पिल्केशन बढ़ने के चांस हैं। नलिन और मर्सी ने सन्नी का प्रवेश नागपुर के सर्व-उदय विद्यालय में करा दिया। यहाँ मर्सी बच्ची के साथ विद्यालय जाने लगी और डाउन सिंड्रोम बच्चों को सिखाये जाने वाली गतिविधियाँ दोहराती और इससे सन्नू की प्रगति भी अच्छी होने लगी थी। नागपुर में मर्सी एक बार पुनः गर्भवती हो गई। इस बार उन लोगों ने गर्भस्थ शिशु का डाउन सिंड्रोम टेस्ट नहीं करवाया। 
            मर्सी ने एक स्वस्थ कन्या शिशु को जन्म दिया। उनके अन्दर एक नया उत्साह भी पैदा हुआ और दंपत्ति ने नए शिशु के साथ डाउन सिंड्रोम ग्रसित सन्नी की उत्कृष्ट देखभाल शुरू कर दी। मर्सी ने सन्नी के नाम से मिलती-जुलती एक संस्था बना ली, जिसे नाम दिया गया- "राइजिंग सन डेवलपमेंट सेंटर"। 
           डाउन सिंड्रोम ग्रसित बच्चों के सर्वांगीण विकास की राह आसान होने लगी. हिन्दुस्तान में इस तरह की गतिविधियाँ एकदम नवीन थीं और मर्सी की ज़िद ने उनकी तमाम कोशिशों को समाज के लिए सहज स्वीकार्य बना दिया था। जो अभिभावक अब तक अपने बच्चों को समाज की निगाह से छुपा कर रखने के लिए अभिशप्त थे, उनके लिए मर्सी और नलिन की ऊर्जावान पहल ने नई राह बनाई। 
             आगे जाकर सन्नी का सिंगापूर में विशेष प्रशिक्षण के लिए चयन हो गया। इसमें मर्सी को सन्नी के साथ सिंगापूर आने का प्रस्ताव भी मिला।
           "चलो साथ चलें" उपन्यास एक कथा नहीं है बल्कि डाउन सिंड्रोम से ग्रसित बच्चों के उच्च स्तरीय प्रबंधन की एक पथ प्रदर्शक भी है। 
            संजय अलंग के इस उपन्यास का स्वागत इसलिए किया जाना चाहिए क्योंकि हिंदी साहित्य में लीक से हटकर लिखी गई कथा है ये, जिसमें समावेशी सोच के साथ एक नई राह तलाशने का प्रयास किया गया है।



कृति : चलो साथ चलें   
लेखक : संजय अलंग 
पृष्ठ : 144  मूल्य : 250 रुपये
प्रकाशक : न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, C-515, बुद्धनगर, नई दिल्ली 110012


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