उसे जानने के क्रम में
___________________उसे मैंने जाना किंतु वहाँ- वहाँ नहीं
जहाँ-जहाँ वह थी
उसे जाना वहाँ-वहाँ, जहाँ-जहाँ वह न थी
उसे जानने के क्रम में मैंने धरती को जाना
आकाश को भी थोड़ा-बहुत
आकाश को भी थोड़ा-बहुत
उसके साथ जागते हुए सारी रात
पक्षियों को जाना और उनके कलरव को भी
पक्षियों को जाना और उनके कलरव को भी
उस मद्धिम से लौ को भी
जो दूर बहुत दूर से किरणों के रूप में आ रही थी
जो दूर बहुत दूर से किरणों के रूप में आ रही थी
गुज़रती रेलगाड़ी के उस हॉर्न को भी
जो रोटी के लिए मुसाफ़िरों को
एक शहर से दूसरे शहर पहुँचा रही थी
जो रोटी के लिए मुसाफ़िरों को
एक शहर से दूसरे शहर पहुँचा रही थी
उसे जानने के क्रम में
मंदिर के उन घंटियों को भी जाना
जिन्हें पुजारिनें बजा रही थीं।
भाषा की आखिरी सीमा पर
जहाँ शब्द थककर अपना अर्थ खो देते हैं
वह वहाँ मुझे मिली
मंदिर के उन घंटियों को भी जाना
जिन्हें पुजारिनें बजा रही थीं।
एक रंग - सी लड़की
___________________भाषा की आखिरी सीमा पर
जहाँ शब्द थककर अपना अर्थ खो देते हैं
वह वहाँ मुझे मिली
किसी दृश्य में नहीं
किसी गीत में नहीं
बल्कि तब जब आँखें बंद होती थीं
किसी गीत में नहीं
बल्कि तब जब आँखें बंद होती थीं
एक ऐसे अनजाने रंग-सी
जिसे अभी भी नाम दिया जाना था बाक़ी
जिसे अभी भी नाम दिया जाना था बाक़ी
उसका सौंदर्य किसी मूरत जैसी नहीं
बल्कि हड्डियों के भीतर की छुपी हुई उस आग जैसी
जो तब सुलगती है जब वह बिना छुए गुज़रती है
बल्कि हड्डियों के भीतर की छुपी हुई उस आग जैसी
जो तब सुलगती है जब वह बिना छुए गुज़रती है
चेहरे की बनावट फूलों-सी
जिस्म की तराश पेड़ों-सी
जैसे शून्य के सीने पर किसी ने खींच दी हो एक लकीर
जिस्म की तराश पेड़ों-सी
जैसे शून्य के सीने पर किसी ने खींच दी हो एक लकीर
उसे कविता कहूँ तो ग़लत साबित हो जाऊँ
वह तो दो पंक्तियों के बीच की उस खाली स्थान-सी थी
जहाँ पहुँच अनजान पथिक को भी मिल सकती थी विश्रांति
वह तो दो पंक्तियों के बीच की उस खाली स्थान-सी थी
जहाँ पहुँच अनजान पथिक को भी मिल सकती थी विश्रांति
उसका होना ऐसे
जैसे सदियों पुरानी इमारत की दरार से
दुनिया को साबित करता हुआ बौना
फूट आया हो पीपल का कोई पौधा
जैसे सदियों पुरानी इमारत की दरार से
दुनिया को साबित करता हुआ बौना
फूट आया हो पीपल का कोई पौधा
उसका चेहरा मेरे जीवन के
ऊबड़-खाबड़ भूगोल की बन गई सुंदर तस्वीर
ऊबड़-खाबड़ भूगोल की बन गई सुंदर तस्वीर
सौंदर्य की पुरानी परिभाषाओं को झुठलाती
पहाड़ों से उतरती उस नदी के जैसे था उसका व्यक्तित्व
जिससे जीव-जगत की आत्मा होती थी तृप्त
पहाड़ों से उतरती उस नदी के जैसे था उसका व्यक्तित्व
जिससे जीव-जगत की आत्मा होती थी तृप्त
जहाँ ज़िंदगी किसी झंझट से ज़्यादा कुछ न थी
वहाँ वह जाड़े के रात की अलाव-सी आई
वहाँ वह जाड़े के रात की अलाव-सी आई
जब-जब जीवन के रंगमंच से हारा
लौटा एक बनजारे की तरह
वह मुझ कोरे काग़ज़ पर रंग भरने
किसी अनकही प्रार्थना के उत्तर की तरह आई।
जो भी कहो धीरे कहो
नहीं तो कोई सुन लेगा
और सुन लेगा तो ढूँढ लेगा
लौटा एक बनजारे की तरह
वह मुझ कोरे काग़ज़ पर रंग भरने
किसी अनकही प्रार्थना के उत्तर की तरह आई।
जो भी कहो धीरे कहो
___________________जो भी कहो धीरे कहो
नहीं तो कोई सुन लेगा
और सुन लेगा तो ढूँढ लेगा
तुम नहीं जानते
शायद सुनने का मतलब
सुन लेगा तो धुन देगा
शायद सुनने का मतलब
सुन लेगा तो धुन देगा
बहुत आसान है यहाँ ढूँढना
और ढूँढ कर धुनना
और ढूँढ कर धुनना
सिर्फ़ गद्दे और रजाई की ही नहीं होती धुनाई
आदमी की भी होती है खिंचाई
आदमी की भी होती है खिंचाई
जिसने कहा कुछ ऐसा
जो उसे लगे न ख़ुद के जैसा
तो फिर पीतल से मुँह मूँद देगा
जिन्हें जाने की तमन्ना है
वे लाख रोके भी नहीं रुक सकते
इसलिए उन्हें जाने देना चाहिए
जो उसे लगे न ख़ुद के जैसा
तो फिर पीतल से मुँह मूँद देगा
धर्म
___________________जिन्हें जाने की तमन्ना है
वे लाख रोके भी नहीं रुक सकते
इसलिए उन्हें जाने देना चाहिए
किंतु जो ठहरना चाहते हैं
उनके लिए पलकों को बिछाने में देर नहीं करना चाहिए
उनके लिए पलकों को बिछाने में देर नहीं करना चाहिए
थके हुए राही को छाया देना ही पेड़ का धर्म है
मैं जीवित हूँ
तो इसलिए नहीं कि मैं जीवट से भरा हूँ
वह
___________________मैं जीवित हूँ
तो इसलिए नहीं कि मैं जीवट से भरा हूँ
इसलिए कि वह मुझे
अपनी ज़िंदगी की क़ुर्बानी देकर
ज़िन्दा रखे हुए है
अपनी ज़िंदगी की क़ुर्बानी देकर
ज़िन्दा रखे हुए है
मैं जितनी बार मरा
उतनी बार वह दौड़ी चली आई मेरे साथ
मेरे प्राण तत्त्व को छिन लाई
यम के हाथों से बार - बार
उतनी बार वह दौड़ी चली आई मेरे साथ
मेरे प्राण तत्त्व को छिन लाई
यम के हाथों से बार - बार
मैं जितनी बार घिरा डर से
वह उतनी बार करती रही प्यार
वह उतनी बार करती रही प्यार
अब भी जब मैं थक कर हो जाता हूँ चूर - चूर
वह प्रियतमा से बन जाती है माँ
तराशो ख़ुद को ऐसे
जैसे तराशती हैं चिड़ियाँ
घोंसला बनाने के लिए तिनकों को।
वह प्रियतमा से बन जाती है माँ
तराशना
___________________तराशो ख़ुद को ऐसे
जैसे तराशती हैं चिड़ियाँ
घोंसला बनाने के लिए तिनकों को।
समुंदर की गहराई में डूबने से ही मौत नहीं आती
मौत किसी निर्दोष को दोषी ठहराने से भी आ सकती है।
मौत किसी निर्दोष को दोषी ठहराने से भी आ सकती है।
एक - एक बातें
जो अनकही रह जाती हैं
वे कभी न कभी कही गई होंगी
या कही जाएंगी।
जो अनकही रह जाती हैं
वे कभी न कभी कही गई होंगी
या कही जाएंगी।
जो करो
ख़ुद को सामने रख कर करो
जो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं
वह क्या दूसरे के लिए सही रहेगा?
एक ऐसा रंग बनाने की जुगत में लगा हूँ
जो ज़्यादा चटक भले न हो
किंतु गहरा ज़रूर हो
ख़ुद को सामने रख कर करो
जो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं
वह क्या दूसरे के लिए सही रहेगा?
रंग
___________________एक ऐसा रंग बनाने की जुगत में लगा हूँ
जो ज़्यादा चटक भले न हो
किंतु गहरा ज़रूर हो
एक बार चढ़े तो चढ़ा ही रहे
जैसे कोई दिल ओ दिमाग़ की साफ़ लड़की
किसी भोले लड़के के मानस पर चढ़ती है
जैसे कोई दिल ओ दिमाग़ की साफ़ लड़की
किसी भोले लड़के के मानस पर चढ़ती है
अगर ऐसा रंग बना तो
सराबोर करना चाहूँगा उन सभी को
जिन्हें ज़िंदगी ने दुनियादारी की पाठ नहीं पढ़ाई
सराबोर करना चाहूँगा उन सभी को
जिन्हें ज़िंदगी ने दुनियादारी की पाठ नहीं पढ़ाई
जो अभी भी इस इंतज़ार में हैं
कि उन्हें उन्हीं के जैसे कोई मिलेगा
जो थामेगा हाथ और ताउम्र साथ चलेगा
चीज़ें छूटी नहीं
मैंने जान बूझ कर उन्हें छोड़ दिया
कि उन्हें उन्हीं के जैसे कोई मिलेगा
जो थामेगा हाथ और ताउम्र साथ चलेगा
चीज़ों को छोड़ना
___________________चीज़ें छूटी नहीं
मैंने जान बूझ कर उन्हें छोड़ दिया
पंछी भी तो पहला घोंसला छोड़ते समय
दूसरा घोंसला बनाते तो हैं पर पहला तोड़ते नहीं
दूसरा घोंसला बनाते तो हैं पर पहला तोड़ते नहीं
जैसे नदियाँ निकलती हैं सागर से मिलने के लिए
फिर भी मुहाने से मुँह तो नहीं मोड़तीं
फिर भी मुहाने से मुँह तो नहीं मोड़तीं
छोड़ देनी चाहिए
पुरानी चीज़ों को ठीक वैसे ही
जैसे नई वे मिली थीं
पुरानी चीज़ों को ठीक वैसे ही
जैसे नई वे मिली थीं
इसीलिए तुम्हें भी ठीक वैसे ही छोड़ रहा हूँ
ताकि फिर कभी वापस लौटूँ तो तुम वैसे ही मिलो
ताकि फिर कभी वापस लौटूँ तो तुम वैसे ही मिलो
गोबर का गुड़
___________________एक कवि ने ख़ुद को
एक कवि से यह लिखवाया
कि मुझको कवि लिखो।
सिर्फ़ कवि ही नहीं
सबसे प्रखर और कालजयी कवि लिखो।
सबसे प्रखर और कालजयी कवि लिखो।
मेरी कविताओं का ज़िक्र
अपनी कविताओं में ख़ूब करो।
अपनी कविताओं में ख़ूब करो।
मैं बड़ा हूँ
उम्र में, जाति में, नस्ल में, रूप और रंग में
मुझको देखो और रचो।
उम्र में, जाति में, नस्ल में, रूप और रंग में
मुझको देखो और रचो।
दूसरे कवि ने वही किया
जो - जो लिखा
सब पहले के मार्फ़त लिखा
नाम दे - देकर लिखा।
जो - जो लिखा
सब पहले के मार्फ़त लिखा
नाम दे - देकर लिखा।
अच्छा कवि था
इसलिए गोबर को गुड़ लिखा।
तुम्हारे शहर को तुमसे जाना था
इतना ही उससे राब्ता रहा
इसलिए गोबर को गुड़ लिखा।
तुम्हारा शहर
___________________तुम्हारे शहर को तुमसे जाना था
इतना ही उससे राब्ता रहा
जब तुम थी साथ तो जाता था
अब तुम नहीं तो नहीं
अब तुम नहीं तो नहीं
बस इतना ही जान पाया
तुम्हारे शहर के बारे में कि तुम्हारा शहर
तुमसे ज़्यादा समय लिया रंग बदलने में
तुम्हारे शहर के बारे में कि तुम्हारा शहर
तुमसे ज़्यादा समय लिया रंग बदलने में
कहीं या किसी से अब भी
तुम्हारे शहर का ज़िक्र सुनता हूँ
तो तुम याद आती उससे पहले
तुम्हारा रंग बदलना याद आता है
तुम्हारे शहर का ज़िक्र सुनता हूँ
तो तुम याद आती उससे पहले
तुम्हारा रंग बदलना याद आता है
तुम्हारा शहर क्या लोगों को
सिर्फ़ बेमौत की ही सज़ा देना जानता है
आजकल डर-डर जाता हूँ
और तो और एक पत्ते के खड़खड़ाने से भी सहम जाता हूँ
सिर्फ़ बेमौत की ही सज़ा देना जानता है
आवाज़ों की छवि
___________________आजकल डर-डर जाता हूँ
और तो और एक पत्ते के खड़खड़ाने से भी सहम जाता हूँ
किंतु इधर मेरे कान कुछ ज़्यादा ही तेज़ सुनने लगे हैं
जितनी आँखें न देख पातीं उनसे भी ज़्यादा
जितनी आँखें न देख पातीं उनसे भी ज़्यादा
अभी कल ही की बात है
दिनदहाड़े मेरे गाँव के कुछ लोग
एक स्त्री के साथ ज़बरदस्ती कर रहे थे
उसे पकड़े हुए घसीट रहे थे
दिनदहाड़े मेरे गाँव के कुछ लोग
एक स्त्री के साथ ज़बरदस्ती कर रहे थे
उसे पकड़े हुए घसीट रहे थे
लेकिन मुझे नहीं दिखा
शायद जिन्हें दिखा उनकी आवाज़ चली गई
इसलिए वे बोल न सके
शायद जिन्हें दिखा उनकी आवाज़ चली गई
इसलिए वे बोल न सके
हाँ मगर कानों को ज़रूर कुछ सुनाई दिया
किसी के रोने की आवाज़
किसी के कुछ - कुछ कहने की आवाज़
किसी के हँसने की आवाज़
किसी के रोने की आवाज़
किसी के कुछ - कुछ कहने की आवाज़
किसी के हँसने की आवाज़
बस इन्हीं आवाज़ों के आधार पर
एक छवि बनी
एक स्त्री जिसका पति है परदेश
वह रोती रही फिर भी उसकी इज़्ज़त लूटी गई
मैं इसलिए अकेले नहीं रहता
कि मुझे लोग पसंद नहीं
दरअसल इसके पीछे एक और कारण है
और वह यह कि
हिन्दी के एक पुरखे ने कहा था
"भीड़ प्रिय आदमी कभी किसी का अपना नहीं होता।"
एक छवि बनी
एक स्त्री जिसका पति है परदेश
वह रोती रही फिर भी उसकी इज़्ज़त लूटी गई
भीड़ प्रिय आदमी
___________________मैं इसलिए अकेले नहीं रहता
कि मुझे लोग पसंद नहीं
दरअसल इसके पीछे एक और कारण है
और वह यह कि
हिन्दी के एक पुरखे ने कहा था
"भीड़ प्रिय आदमी कभी किसी का अपना नहीं होता।"
बस इसीलिए मैं चाह कर भी
कभी किसी के क़रीब नहीं जा पाता
न किसी को आने ही देता।
कभी किसी के क़रीब नहीं जा पाता
न किसी को आने ही देता।
अब तुम जो भी सोचो
मुझे कुछ न कहना
बस मुझे डर लगता है
और इसलिए नहीं कि मैं डरता हूँ
इसलिए कि मैं तुम्हारे साथ आया
तो तुम्हारा अपना न रह पाऊँगा।
यात्रा हो या निष्कासन
वनवास हो या महाभिनिष्क्रमण
मुझे कुछ न कहना
बस मुझे डर लगता है
और इसलिए नहीं कि मैं डरता हूँ
इसलिए कि मैं तुम्हारे साथ आया
तो तुम्हारा अपना न रह पाऊँगा।
परित्यक्त उपमाएं
___________________यात्रा हो या निष्कासन
वनवास हो या महाभिनिष्क्रमण
सवाल तो उसी पे उठेगा
जिस पर उठता आया है
जिस पर उठता आया है
राम और सीता के वनवास का प्रश्न हो
या मीरा अथवा बुद्ध के बहिर्गमन का
या मीरा अथवा बुद्ध के बहिर्गमन का
सीता की ही होगी अग्निपरीक्षा
राम तो राजा से मर्यादा पुरुषोत्तम बन जाएंगे
राम तो राजा से मर्यादा पुरुषोत्तम बन जाएंगे
मीरा को मिलेंगी परित्यक्त उपमाएं
बुद्ध महात्मा कहलाएंगे
देह के दुःख से ज़्यादा दर्द देता है
हृदय का दुःख
बुद्ध महात्मा कहलाएंगे
देह के दुःख से ज़्यादा दर्द देता है
हृदय का दुःख
इनकार उतना असहनीय नहीं लगता
जितना सुन कर चुप्पी साध लेना
जितना सुन कर चुप्पी साध लेना
गहरी नदी घाटियाँ ही बता सकती हैं
कि क्या महसूस करते होंगे वे लोग
जिन्हें न कोई सुनने वाला है
और न रोते वक़्त चुप कराने वाला
कि क्या महसूस करते होंगे वे लोग
जिन्हें न कोई सुनने वाला है
और न रोते वक़्त चुप कराने वाला
अभी भी वे क़िताबें लिखी जानी बाक़ी हैं
जिनमें इन दर्दों के दवाओं का ज़िक्र हो
बहुत आसान होता है छोड़ कर जाना
और बाद में उसे एक उद्देश्य से जोड़ देना।
जिनमें इन दर्दों के दवाओं का ज़िक्र हो
जाना सिर्फ़ जाना नहीं होता
___________________बहुत आसान होता है छोड़ कर जाना
और बाद में उसे एक उद्देश्य से जोड़ देना।
शायद यूँ ही गए होंगे, बुद्ध!
यशोधरा को बिन बताए
बिना कोई दिलासा दिलाए।
बिना कोई दिलासा दिलाए।
आज भी चले जाते हैं बुद्ध
अपनी यशोधराओं को छोड़ कर।
अपनी यशोधराओं को छोड़ कर।
कभी - कभार...
रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाओं के ख़ातिर
तो कभी - कभार दूसरी यशोधराओं के ख़ातिर।
रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाओं के ख़ातिर
तो कभी - कभार दूसरी यशोधराओं के ख़ातिर।
वैसे अब यशोधराएँ भी जाने लगी हैं
वे भी देर से ही सही
आज के बुद्धों को समझाने लगी हैं
कि जाना क्या - क्या लेकर जाता है!
वे भी देर से ही सही
आज के बुद्धों को समझाने लगी हैं
कि जाना क्या - क्या लेकर जाता है!
कार्तिकेय हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, तेलंगाना से हिन्दी में पी-एच. डी. कर रहे हैं। उनसे इस नंबर पर बात हो सकती है - 6388366322


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