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कार्तिकेय शुक्ल की कविताएँ

 



उसे जानने के क्रम में 

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उसे मैंने जाना किंतु वहाँ- वहाँ नहीं
जहाँ-जहाँ वह थी
उसे जाना वहाँ-वहाँ, जहाँ-जहाँ वह न थी

उसे जानने के क्रम में मैंने धरती को जाना 
आकाश को भी थोड़ा-बहुत

उसके साथ जागते हुए सारी रात 
पक्षियों को जाना और उनके कलरव को भी

उस मद्धिम से लौ को भी
जो दूर बहुत दूर से किरणों के रूप में आ रही थी

गुज़रती रेलगाड़ी के उस हॉर्न को भी
जो रोटी के लिए मुसाफ़िरों को 
एक शहर से दूसरे शहर पहुँचा रही थी

उसे जानने के क्रम में 
मंदिर के उन घंटियों को भी जाना
जिन्हें पुजारिनें बजा रही थीं।

एक रंग - सी लड़की

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भाषा की आखिरी सीमा पर
जहाँ शब्द थककर अपना अर्थ खो देते हैं
वह वहाँ मुझे मिली

किसी दृश्य में नहीं
किसी गीत में नहीं 
बल्कि तब जब आँखें बंद होती थीं
 
एक ऐसे अनजाने रंग-सी
 जिसे अभी भी नाम दिया जाना था बाक़ी

उसका सौंदर्य किसी मूरत जैसी नहीं 
बल्कि हड्डियों के भीतर की छुपी हुई उस आग जैसी 
जो तब सुलगती है जब वह बिना छुए गुज़रती है

चेहरे की बनावट फूलों-सी
जिस्म की तराश पेड़ों-सी
जैसे शून्य के सीने पर किसी ने खींच दी हो एक लकीर 

उसे कविता कहूँ तो ग़लत साबित हो जाऊँ 
वह तो दो पंक्तियों के बीच की उस खाली स्थान-सी थी
जहाँ पहुँच अनजान पथिक को भी मिल सकती थी विश्रांति 

उसका होना ऐसे
जैसे सदियों पुरानी इमारत की दरार से 
दुनिया को साबित करता हुआ बौना
फूट आया हो पीपल का कोई पौधा

उसका चेहरा मेरे जीवन के
ऊबड़-खाबड़ भूगोल की बन गई सुंदर तस्वीर

सौंदर्य की पुरानी परिभाषाओं को झुठलाती 
पहाड़ों से उतरती उस नदी के जैसे था उसका व्यक्तित्व 
जिससे जीव-जगत की आत्मा होती थी तृप्त

जहाँ ज़िंदगी किसी झंझट से ज़्यादा कुछ न थी
वहाँ वह जाड़े के रात की अलाव-सी आई

जब-जब जीवन के रंगमंच से हारा 
लौटा एक बनजारे की तरह
वह मुझ कोरे काग़ज़ पर रंग भरने 
किसी अनकही प्रार्थना के उत्तर की तरह आई।


जो भी कहो धीरे कहो

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जो भी कहो धीरे कहो
नहीं तो कोई सुन लेगा
और सुन लेगा तो ढूँढ लेगा

तुम नहीं जानते 
शायद सुनने का मतलब
सुन लेगा तो धुन देगा

बहुत आसान है यहाँ ढूँढना 
और ढूँढ कर धुनना 

सिर्फ़ गद्दे और रजाई की ही नहीं होती धुनाई
आदमी की भी होती है खिंचाई 

जिसने कहा कुछ ऐसा
जो उसे लगे न ख़ुद के जैसा
तो फिर पीतल से मुँह मूँद देगा


धर्म 

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जिन्हें जाने की तमन्ना है 
वे लाख रोके भी नहीं रुक सकते
इसलिए उन्हें जाने देना चाहिए 

किंतु जो ठहरना चाहते हैं 
उनके लिए पलकों को बिछाने में देर नहीं करना चाहिए

थके हुए राही को छाया देना ही पेड़ का धर्म है


वह 

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मैं जीवित हूँ
तो इसलिए नहीं कि मैं जीवट से भरा हूँ

इसलिए कि वह मुझे 
अपनी ज़िंदगी की क़ुर्बानी देकर
ज़िन्दा रखे हुए है 

मैं जितनी बार मरा
उतनी बार वह दौड़ी चली आई मेरे साथ 
मेरे प्राण तत्त्व को छिन लाई 
यम के हाथों से बार - बार

मैं जितनी बार घिरा डर से
वह उतनी बार करती रही प्यार

अब भी जब मैं थक कर हो जाता हूँ चूर - चूर 
वह प्रियतमा से बन जाती है माँ


तराशना

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तराशो ख़ुद को ऐसे
जैसे तराशती हैं चिड़ियाँ 
घोंसला बनाने के लिए तिनकों को।

समुंदर की गहराई में डूबने से ही मौत नहीं आती
मौत किसी निर्दोष को दोषी ठहराने से भी आ सकती है।

एक - एक बातें
जो अनकही रह जाती हैं 
वे कभी न कभी कही गई होंगी
या कही जाएंगी।

जो करो
ख़ुद को सामने रख कर करो
जो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं 
वह क्या दूसरे के लिए सही रहेगा?


रंग

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एक ऐसा रंग बनाने की जुगत में लगा हूँ
जो ज़्यादा चटक भले न हो
किंतु गहरा ज़रूर हो

एक बार चढ़े तो चढ़ा ही रहे
जैसे कोई दिल ओ दिमाग़ की साफ़ लड़की 
किसी भोले लड़के के मानस पर चढ़ती है 

अगर ऐसा रंग बना तो
सराबोर करना चाहूँगा उन सभी को 
जिन्हें ज़िंदगी ने दुनियादारी की पाठ नहीं पढ़ाई 

जो अभी भी इस इंतज़ार में हैं 
कि उन्हें उन्हीं के जैसे कोई मिलेगा
जो थामेगा हाथ और ताउम्र साथ चलेगा


चीज़ों को छोड़ना

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चीज़ें छूटी नहीं
मैंने जान बूझ कर उन्हें छोड़ दिया 

पंछी भी तो पहला घोंसला छोड़ते समय
दूसरा घोंसला बनाते तो हैं पर पहला तोड़ते नहीं

जैसे नदियाँ निकलती हैं सागर से मिलने के लिए 
फिर भी मुहाने से मुँह तो नहीं मोड़तीं

छोड़ देनी चाहिए
पुरानी चीज़ों को ठीक वैसे ही 
जैसे नई वे मिली थीं

इसीलिए तुम्हें भी ठीक वैसे ही छोड़ रहा हूँ 
ताकि फिर कभी वापस लौटूँ तो तुम वैसे ही मिलो



गोबर का गुड़ 

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एक कवि ने ख़ुद को 
एक कवि से यह लिखवाया 
कि मुझको कवि लिखो।

सिर्फ़ कवि ही नहीं 
सबसे प्रखर और कालजयी कवि लिखो।

मेरी कविताओं का ज़िक्र 
अपनी कविताओं में ख़ूब करो।

मैं बड़ा हूँ
उम्र में, जाति में, नस्ल में, रूप और रंग में 
मुझको देखो और रचो।

दूसरे कवि ने वही किया
जो - जो लिखा
सब पहले के मार्फ़त लिखा
नाम दे - देकर लिखा।

अच्छा कवि था
इसलिए गोबर को गुड़ लिखा।

तुम्हारा शहर 

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तुम्हारे शहर को तुमसे जाना था 
इतना ही उससे राब्ता रहा 

जब तुम थी साथ तो जाता था 
अब तुम नहीं तो नहीं

बस इतना ही जान पाया
तुम्हारे शहर के बारे में कि तुम्हारा शहर
तुमसे ज़्यादा समय लिया रंग बदलने में

कहीं या किसी से अब भी
तुम्हारे शहर का ज़िक्र सुनता हूँ
तो तुम याद आती उससे पहले
तुम्हारा रंग बदलना याद आता है

तुम्हारा शहर क्या लोगों को 
सिर्फ़ बेमौत की ही सज़ा देना जानता है


आवाज़ों की छवि

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आजकल डर-डर जाता हूँ
और तो और एक पत्ते के खड़खड़ाने से भी सहम जाता हूँ 

किंतु इधर मेरे कान कुछ ज़्यादा ही तेज़ सुनने लगे हैं 
जितनी आँखें न देख पातीं उनसे भी ज़्यादा

अभी कल ही की बात है 
दिनदहाड़े मेरे गाँव के कुछ लोग
एक स्त्री के साथ ज़बरदस्ती कर रहे थे 
उसे पकड़े हुए घसीट रहे थे 

लेकिन मुझे नहीं दिखा
शायद जिन्हें दिखा उनकी आवाज़ चली गई 
इसलिए वे बोल न सके

हाँ मगर कानों को ज़रूर कुछ सुनाई दिया
किसी के रोने की आवाज़ 
किसी के कुछ - कुछ कहने की आवाज़ 
किसी के हँसने की आवाज़ 

बस इन्हीं आवाज़ों के आधार पर 
एक छवि बनी
एक स्त्री जिसका पति है परदेश 
वह रोती रही फिर भी उसकी इज़्ज़त लूटी गई


भीड़ प्रिय आदमी 

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मैं इसलिए अकेले नहीं रहता 
कि मुझे लोग पसंद नहीं 
दरअसल इसके पीछे एक और कारण है 
और वह यह कि 
हिन्दी के एक पुरखे ने कहा था 
"भीड़ प्रिय आदमी कभी किसी का अपना नहीं होता।"

बस इसीलिए मैं चाह कर भी
कभी किसी के क़रीब नहीं जा पाता
न किसी को आने ही देता।

अब तुम जो भी सोचो
मुझे कुछ न कहना
बस मुझे डर लगता है 
और इसलिए नहीं कि मैं डरता हूँ
इसलिए कि मैं तुम्हारे साथ आया 
तो तुम्हारा अपना न रह पाऊँगा।

परित्यक्त उपमाएं 

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यात्रा हो या निष्कासन 
वनवास हो या महाभिनिष्क्रमण 

सवाल तो उसी पे उठेगा
जिस पर उठता आया है 

राम और सीता के वनवास का प्रश्न हो
या मीरा अथवा बुद्ध के बहिर्गमन का

सीता की ही होगी अग्निपरीक्षा 
राम तो राजा से मर्यादा पुरुषोत्तम बन जाएंगे 

मीरा को मिलेंगी परित्यक्त उपमाएं 
बुद्ध महात्मा कहलाएंगे

देह के दुःख से ज़्यादा दर्द देता है 
हृदय का दुःख 

इनकार उतना असहनीय नहीं लगता
जितना सुन कर चुप्पी साध लेना

गहरी नदी घाटियाँ ही बता सकती हैं 
कि क्या महसूस करते होंगे वे लोग
जिन्हें न कोई सुनने वाला है 
और न रोते वक़्त चुप कराने वाला

अभी भी वे क़िताबें लिखी जानी बाक़ी हैं 
जिनमें इन दर्दों के दवाओं का ज़िक्र हो

जाना सिर्फ़ जाना नहीं होता 

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बहुत आसान होता है छोड़ कर जाना 
और बाद में उसे एक उद्देश्य से जोड़ देना।

शायद यूँ ही गए होंगे, बुद्ध!

यशोधरा को बिन बताए
बिना कोई दिलासा दिलाए।

आज भी चले जाते हैं बुद्ध
अपनी यशोधराओं को छोड़ कर।

कभी - कभार...
रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाओं के ख़ातिर 
तो कभी - कभार दूसरी यशोधराओं के ख़ातिर।

वैसे अब यशोधराएँ भी जाने लगी हैं
वे भी देर से ही सही
आज के बुद्धों को समझाने लगी हैं 
कि जाना क्या - क्या लेकर जाता है!

जाना सिर्फ़ जाना नहीं होता
महज़ घर ही सूना नहीं होता जाने से 
अंदर भी बहुत कुछ टूट जाता है।



  
कार्तिकेय हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, तेलंगाना से हिन्दी में पी-एच. डी. कर रहे हैं। उनसे इस नंबर पर बात हो सकती है - 6388366322

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