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मौसी का गांव : सन्नाटे में कोलाहल की तलाश

बिभाश कुमार




आंचलिक उपन्यास की अपनी कुछ निर्धारित कसौटियाँ भी हैं। केवल किसी गांव का नाम, खेत-खलिहान, नदी-पहाड़ अथवा ग्रामीण पात्रों की उपस्थिति किसी उपन्यास को आंचलिक नहीं बना देती। अंचल की मिट्टी जब पात्रों के स्वभाव में उतरती है, उसकी संस्कृति जब उनके व्यवहार में दिखाई देती है, उसकी बोली जब संवादों में सांस लेती है, उसकी लोक आस्था और विश्वास जब कथा के भीतर अपना स्वतंत्र संसार रचते हैं तथा उसकी सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियां जब कथा के संघर्ष का आधार बनती हैं, तभी आंचलिकता अपनी पूर्णता को प्राप्त करती है। इस दृष्टि से 'मौसी का गांव' को देखने पर महुलबनी केवल एक गांव नहीं रह जाता बल्कि अपने समय और समाज की अनेक परतों को अपने भीतर समेटे हुए एक जीवंत अंचल बन जाता है।
       वस्तुतः आंचलिकता का संबंध केवल भौगोलिक सीमा से नहीं बल्कि उस भूगोल में रहने वाले मनुष्य की सामूहिक स्मृति और जीवनानुभव से है। इस उपन्यास में कोयलांचल की जमीन, वहाँ का सामाजिक जीवन, जातीय संरचना, आर्थिक विषमता, राजनीतिक गतिविधियाँ और बदलते हुए ग्रामीण संस्कार एक दूसरे से अलग-अलग नहीं हैं बल्कि एक दूसरे में गुंथे हुए हैं। यही गुंथाव 'मौसी का गांव' को केवल गांव की कहानी न बनाकर एक अंचल की कथा बनाता है। यहाँ अंचल अपनी समस्याओं के साथ बोलता है, चुप होता है, संघर्ष करता है और परिवर्तन की प्रतीक्षा भी करता है।
       उपन्यास 'मौसी का गांव' में ग्रामीण और नगरीय जीवन पद्धति के साथ जाति प्रथा के सूक्ष्म और जटिल रूपों का तथा सभ्यता और संस्कृति में उलझती परिस्थितियों का सांगोपांग चित्रण करते हुए लेखक प्रह्लाद चंद्र दास इससे उत्पन्न समस्याओं का निदान भी अपने स्तर से करते हुए कथा की तारतम्यता निर्मित करते हैं। उपन्यास की कथा में ग्रामीण जीवन का विशद और सूक्ष्म चित्रण तो है परन्तु रेणु और प्रेमचंद की दर्दीली आत्मा की चीत्कार नहीं है ,परंतु आत्मा की पुकार इतनी मद्धिम भी नहीं है कि इसे आंचलिकता की श्रेणी से अलग रखा जाए।
वस्तुतः लेखक प्रह्लाद चंद्र दास रेणु और प्रेमचंद की परंपराओं से खुद को बचाते हुए दलित त्रासदी की ऐसी व्यथा दर्ज करते हैं जो ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों के विभिन्न रूपों में दीखता है, हरदम, हरसमय।
       आंचलिकता के संदर्भ में फणीश्वरनाथ रेणु का स्मरण स्वाभाविक रूप से होता है। 'मैला आंचल' ने हिंदी उपन्यास में अंचल को जिस जीवंतता के साथ स्थापित किया, उसके बाद आंचलिक उपन्यास को देखने की दृष्टि भी कुछ बदल गई। परंतु प्रत्येक आंचलिक उपन्यास को रेणु की कसौटी पर रखकर देखना भी उचित नहीं होगा। 'मौसी का गांव' की आंचलिकता का अपना स्वभाव है। यहाँ लोकजीवन का चित्रण है, पर लेखक की दृष्टि केवल लोक-संस्कृति की सुंदरता अथवा ग्रामीण जीवन की करुणा तक सीमित नहीं रहती। उनकी दृष्टि अंचल के भीतर मौजूद जातीय, सामाजिक और राजनीतिक जकड़न पर अधिक ठहरती है।
       यही कारण है कि कोयलांचल की माटी की गंध के साथ-साथ वहाँ की सामाजिक दूषिता भी पूरे उपन्यास में उपस्थित रहती है। रेणु के यहाँ अंचल का लोकजीवन अनेक रंगों में खिलता है तो 'मौसी का गांव' में अंचल अपने भीतर के अंतर्विरोधों के साथ पाठक के सामने आता है। यहाँ सन्नाटा भी है और उस सन्नाटे के भीतर परिवर्तन का कोलाहल भी। शायद इसी कारण इस उपन्यास को पढ़ते हुए आंचलिकता की अनुभूति के साथ एक बेचैनी भी लगातार बनी रहती है।
        नगरीय जीवन के साथ कथा बढ़ाने के क्रम में नगरीय वातावरण, रीति रिवाज तथा आस्थाओं एवं विश्वास को किंचित अनदेखा भी किया है परंतु मूल संवेदनाओं का साथ हरदम खड़े दिखते हैं लेखक प्रह्लाद चंद्र दास।
       आंचलिकता के संदर्भ में देखें तो यह मान्य परंपरा है कि आंचलिक उपन्यास में अंचल के रीति-रिवाज, लोक आस्था और लोक भाषा का चित्रण होना होता है जो बहुआयामी और जीवंत होता है। अंचल धनबाद के ग्रामीण क्षेत्र और बोकारो स्टील सिटी के नगरीय क्षेत्र ही इस उपन्यास की कथा का मुख्य केंद्र हैं। भाषा, बोली बानी और संस्कृति के साथ बिना कोई छेड़छाड़ किए निरंतर गतिशील। उपन्यास का मुख्य पात्र विनय बोकारो नगर में रहता है अपने माता पिता के साथ तथा उसके मौसी का गांव है- महुलबनी, कतरास धनबाद के पास का एक मौजा।विनय की मौसी का गांव सांस्कृतिक, राजनीतिक और समाजिक विषमताओं और ग्रामीण दूषित परम्पराओं में उग-डूब रहा गांव है, परन्तु विनय वहाँ पूरे उपन्यास में, जबकि उपन्यास का कालावधि लगभग 12-15 वर्षों की है, दो बार ही जाता है। एक बार अनिच्छा से तो दूसरी बार स्वेच्छा से (जबकि इसमें उसका व्यक्तिगत स्वार्थ था)।
         'मौसी के गांव' के उत्थान अथवा सामाजिक , राजनीतिक जड़ता को तोड़ने में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से भी उसका कोई योगदान नहीं है और न ही विनय के लिए कोई महत्व रखता है, सिवाय मौसी के गाँव के नाम से, जैसा कि उपन्यास में वर्णित है। इस हेतु भी विनय के नज़रिए से 'मौसी का गांव' का नामकरण अमित को उपन्यास के नायकत्व से पदच्युत कर देता है, जबकि अमित का कार्य, सोच अपने गाँव और मौजा के लिए उत्साहवर्धक और क्रन्तिकारी है। इस कारण नामकरण आधार की कसौटी से देखने पर पूर्णतः स्वाभाविक नहीं लगता है यह नाम। इस उपन्यास के समस्त पात्रों का उत्थान - पतन तथा विस्तार उपन्यास नायक पद से दूर दूर ही रहा। किसी भी पात्र को लेखक ने नायक बनने नहीं दिया अपितु 'मौसी का गांव' ही नायक के पद पर कब्जा स्थापित कर लिया,जो की स्वाभाविक ही था। पूरे उपन्यास में 'मौसी का गांव' - महुलबनी से बड़ा कोई नायक नहीं है। यहीं आंचलिक उपन्यास की एक प्रमुख विशेषता भी है।
        इसलिए 'मौसी का गांव' को आंचलिक उपन्यास की श्रेणी में रखने का सबसे बड़ा आधार उसके पात्रों की संख्या अथवा ग्रामीण घटनाओं की बहुलता नहीं बल्कि स्वयं अंचल की उपस्थिति है। महुलबनी कथा में आता-जाता है। वह कथा को प्रभावित करता है और कथा भी उसके भीतर परिवर्तन की संभावना तलाशती है। विनय का वहाँ केवल दो बार जाना भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हो जाता है कि उपन्यास का जीवन विनय पर निर्भर नहीं है। अमित आता है, बाबूलाल आता है, शशि आती है, अरुंधति आती है, श्रीकांत और अन्य पात्र आते हैं और अपने-अपने हिस्से का संघर्ष करते हैं, लेकिन महुलबनी अपनी जगह बना रहता है।
        यही वह बिंदु है जहां 'मौसी का गांव' का शीर्षक भी एक नए अर्थ में खुलता है। यह केवल विनय की मौसी का गांव नहीं है, बल्कि वह गांव है जिसमें जाति, राजनीति, धर्म, सामाजिक जड़ता, स्त्री की स्थिति, आर्थिक विषमता और परिवर्तन की आकांक्षा एक साथ निवास करती है। इसलिए शीर्षक किसी एक पात्र के नायकत्व का संकेत न होकर अंचल के सामूहिक नायकत्व की घोषणा जैसा प्रतीत होता है। मेरे लिए यही इस उपन्यास की आंचलिकता का सबसे मजबूत आधार है।
       उपन्यास में कोयलांचल एवं इस्पात नगरी, जो कि तात्कालीन बिहार और बंगाल के मिश्रित संस्कृति का भाग है, के रीति-रिवाजों, रहन-सहन, पर्व-त्यौहार, राजनीतिक गतिविधियों एवं सामाजिक छुआछूत आदि का सूक्ष्मता से वर्णन किया गया है परंतु लेखक का मन अंचल की दूषित वातावरण पर कम राजनीतिक एवं सामाजिक दूषिता पर अधिक रमा है। उपन्यास में बांग्ला, खोरठा आदि भाषाओं और बोलियों के शब्दावली का भी यथाजगह प्रयोग है, फिर भी आंचलिकता के रस में भींजता मन कुछ और की ललक के लिए उपन्यास में कुछ ढूंढता सा व्यथित है ।
        वैसे तो मौसी के गांव में पात्रों की भरमार है, फिर भी अमित, बाबूलाल, श्रीकांत, विनय, शशि और अरुंधति प्रमुख पात्र हैं परंतु कथा किसी पात्र विशेष को अधिक महत्व न देकर समस्याओं के निदान पर अधिक केंद्रित है जिससे कोई भी पात्र नायक नहीं बन पाया है। उपन्यास में जाति प्रथा प्रमुख समस्या है, यही यहाँ के ग्रामीण और नगरीय बाशिंदे को नैतिक और अनैतिक करने के लिए सदा प्रेरित करता है। जाति का संबंध अस्तित्व से मान लिया गया है अर्थात् भावनात्मकता की चरम कसौटी का प्रतिफल है जाति प्रथा।
        कथावस्तु में स्वाभाविकता, रोचकता एवं प्रवाह के गुण रहने चाहिए। 'मौसी का गांव' की कथा वस्तु दो स्तरों पर विभक्त है। ग्रामीण स्तर पर महुलबनी गांव और नगरीय स्तर पर बोकारो शहर। कथावस्तु में कहीं-कहीं एकसूत्रता का अभाव भी दिखता है तो कहीं-कही एक दूसरे से गुथे हुए अर्थात यह विश्रृंखलता उपन्यास के दोष के रूप में देखी जानी चाहिए। दो भिन्न परिवेशों की कथा है - 'मौसी का गांव', जहाँ कथा में कई उपकथाओं की योजना होने से विकास मंथर हुआ है परंतु रोचकता प्रवाहमय है, जो इस उपन्यास को सफल सिद्ध करती है। उपन्यास का कथ्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उथल-पुथल की परिधि में है जहाँ कहानियाँ गांव की पगडंडी का अनुसरण करती हुईं, शहर की चौड़ी और सपाट सड़कों तक जाती है। शहर और गांव का अंतर्द्वंद्व जातीय और राजनीतिक अंतर्द्वंद्व के बीच भटकता रहता है। साम्प्रदायिक विभाजन का अपना ताना-बाना है परंतु जीवन जड़ता को अम्बेडकर रूपी ऑक्सीजन के सहारे एका स्थापित करने की अप्रत्यक्ष कोशिश उपन्यासकार करते दिखते हैं। दलित विमर्श के सहारे नारी विमर्श भी केन्द्रीयता लिए हुए अपनी उपस्थिति से पाठकों को अवगत कराता है। धर्म से बड़ी कोई राजनीति नहीं है, शायद लेखक अपने इस वृहत कथा में इस बात को भी रेखांकित करना चाहते हैं।
        'मौसी का गांव' में दो नारी पात्र आकर्षित करते हैं - शशि और अरुंधति । एक धोबी समाज की है, दूसरी ब्राह्मण समाज की, परन्तु दोनों अपने-अपने विचारों से समृद्ध। अरुंधति का अपने ब्राह्मण समाज के प्रति वितृष्णा तथा उसके पिता जीवेश मिश्रा का उदार दृष्टिकोण आदर्शवाद की परिभाषा में आता है। लेखक यथार्थ को लिखने के क्रम में आदर्शवाद का महिमा मंडन करने लगे हैं जिसका परिणाम शशि-विनय और अरुंधति-अमित का वैवाहिक संबंधों के रूप में उद्घाटित होता है। सौदामिनी देवी भी स्त्री पात्रों में दखल रखती है। शशि तो विनय के लिए एक दिशा निर्देशक की भांति ही है, जहाँ वेदना और संघर्ष के मध्य विचारों की एक मनमोहक गलियारा तैयार करती है जिस पर विनय सरपट दौड़ता है।
        अमित और बाबूलाल बाबासाहब अम्बेडकर के विचारों को धरातल पर स्थापित करने के प्रयास करते है, जिसमें कोयला खदान के दीनदयाल राम और शशि, अरुंधति सहयोग करते है, वहीं विनय बोकारो में एक धार्मिक संगठन से जुड़कर अपने नगर में हिन्दू धर्म एकसूत्रता का कार्य करता है और कारसेवकों के लिए प्रयत्नशील है परंतु विनय के पिता श्रीकांत अपने व्यक्तिगत कार्यों के कारण अपने सीमित अधिकारों द्वारा बाबा साहब के विचारों को दिशा देने के उपक्रम में लगे हैं। उद्देश्य सभी का अलग-अलग है परंतु लेखक के द्वारा एका स्थापित करने के लिए कड़ी से कड़ी जोड़ने का प्रयास भी किया गया है परंतु अपने-अपने हित साधने में पात्रों को दिग्भ्रमित करने को भी विवश किया गया है। कहना उचित होगा कि उपन्यास के पात्रों पर लेखक थोड़ा कमजोर पड़ गया अथवा उपन्यास लेखक के हाथों से निकल कर स्वयं विस्तार पाता रहा है।
        उपन्यास में कथोपकथन उत्कृष्ट स्तर पर है, फिर भी ग्रामीण बोलचाल में प्रयुक्त होने वाले शब्दों का लगभग अकाल सा है। परंतु भाव-भंगिमा ग्रामीण बोलचाल से आप्लावित भी है। निरक्षर पात्र भी अपने संवाद में भाषा और व्याकरण तथा हिंदी के वैसे शब्दों का प्रयोग करते है, जो कि विश्वसनीय नहीं लगता है। ऐसा लगता है गांव बदल रहा है, सिक्का चमक रहा है नए सृजन के लिए।
       कथा के मूल में उपन्यासकार का कुछ न कुछ उद्देश्य या संदेश भी निहित रहता है। इस उपन्यास का मूल उद्देश्य जाति प्रथा से उपजे तथा जाति प्रथा के कारण सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक समस्याओं का निदर्शन है तथा बाबा साहब के द्वारा बताए गए सिद्धांतों को जमीन पर उतार कर समतामूलक समाज की स्थापना हेतु प्रेरित करना है। इस दृष्टि से यह एक सफल औपन्यासिक कृति है, परंतु हिंदी साहित्य के आलोचकों के लिए लेखक द्वारा जाने-अनजाने में एक बहुत बड़ा स्पेस तो दे ही दिया गया है जिसमे आलोचक अपनी मर्जी से उपन्यास का विवेचना कर सकते हैं।
       अस्तु, ऐसा नही है कि 'मौसी का गांव' हिंदी साहित्य में अपना प्रभाव नहीं छोड़ेगा, वास्तव में यह अम्बेडकरवादी/ दलित साहित्य का उपन्यास है जो कि अम्बेडकरी /दलित चेतना को विस्तृत रूप से स्वयं में समाहित किया है। डॉ. आंबेडकर के दर्शन और मिशन को रेखांकित करते हुए यह स्पष्ट है कि यह अम्बेडकरवादी/दलित साहित्य में मील का पत्थर साबित होगा।
        उपन्यास को पढ़ते हुए आपके मन में एक उबाल आएगा, ऐसा कहना सत्य से मुँह चुराना होगा परन्तु थोड़ी देर के लिए तथाकथित अछूतों की मुठ्ठियाँ कसेंगी ज़रूर परंतु तुरंत ही उंगलियां ढीली पड़ जाएंगी, ऐसा मेरा मानना है। उपन्यास में कई-कई जगह समय, वातावरण और विन्यास को लेकर चूक भी है। प्रमुख पात्र अमित के द्वारा समाज को नेतृत्वविहीन करना भी खलता है। वैसे तो सभी पात्र कमोबेश सामाजिक जड़ता को तोड़ने और एक नए जातिविहीन समाज स्थापित करने के लिए संघर्षरत हैं परंतु परिणति परिवर्तन की ओर एकटक देखने को विवश हैं। इसलिए इस उपन्यास की आंचलिकता को केवल लोकजीवन के चित्रण से नहीं बल्कि उसके भीतर छिपे सामाजिक अंतर्विरोधों से भी समझना होगा। अंचल की पहचान केवल उसकी भाषा, बोली, रहन-सहन और पर्व-त्योहार से नहीं बनती बल्कि वहाँ के मनुष्य के सुख-दुःख, संघर्ष, संबंध, जातीय अनुभव और राजनीतिक चेतना से भी बनती है। 'मौसी का गांव' में ये चीजें एक दूसरे से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। यहाँ गांव की सामाजिक जड़ता और शहर की आधुनिकता आमने-सामने खड़ी दिखाई देती है तो दूसरी ओर दोनों एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। यही अंतर्संबंध उपन्यास को आंचलिकता के व्यापक अर्थ तक ले जाता है।
        वस्तुतः यह उपन्यास बिहार झारखंड के सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक समझ तथा अंचल विशेष की सामाजिकता का कलात्मक सृजन है जहां शूल तो है पर फूल भी कम नहीं हैं। जकड़न है तो उसे तोड़ने का विकल्प भी है। कोयलांचल की माटी की गंध पूरे उपन्यास में अपनी सुगंध फैला रही है जैसे। सामाजिक जीवन संघर्ष को पुनर्परिभाषित करता यह कलात्मक उपन्यास आज़ादी के बाद दलित विमर्श और दलित राजनीति की लिखित दस्तावेज सा है, थका और प्रयत्नशील।
        अर्थात इस उपन्यास में नायक की तलाश किसी एक व्यक्ति में करने के बजाय महुलबनी की गलियों, उसके सामाजिक व्यवहार, उसके जातीय विभाजन, उसकी राजनीतिक चेतना और परिवर्तन की उसकी बेचैनी में करनी होगी। पूरे उपन्यास को पढ़ने के बाद यही महसूस होता है कि पात्र आते हैं और चले जाते हैं, विचार बदलते हैं, संबंध बनते और टूटते हैं, लेकिन अंचल अपनी पूरी जटिलता के साथ कथा के केंद्र में बना रहता है। इस अर्थ में 'मौसी का गांव' ही उपन्यास का सबसे बड़ा नायक है। और अंततः, शायद यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि 'मौसी का गांव' पढ़ते-पढ़ते पाठक को महसूस होने लगता है कि वह किसी पात्र की कहानी नहीं पढ़ रहा, बल्कि स्वयं एक गाँव को धीरे-धीरे बोलते, चुप होते, संघर्ष करते और अपने भीतर परिवर्तन की तलाश करते देख रहा है।
मौसी का गांव (उपन्यास), उपन्यासकार - प्रह्लाद चंद्र दास, प्रकाशक- रश्मि प्रकाशन, लखनऊ

बिभाश कुमार
ग्राम+पोस्ट - अंधराठाढ़ी
जिला - मधुबनी, बिहार
Mob -9931803318

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