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संवेदना की नई परिभाषा गढ़ती कहानियाँ

रूपेंद्र तिवारी



कहानी-संग्रह  – प्रेम एक पालतू बिल्ली
लेखक - डॉ. निधि अग्रवाल 
प्रकाशन – राजकमल प्रकाशन
डॉ. निधि अग्रवाल की कहानियाँ समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में कहानी की पारंपरिक समझ को चुनौती देती हुई दिखाई देती हैं। उनके यहाँ कथानक की प्रधानता नहीं, वरन् अनुभव, स्मृति और मनःस्थितियों की परतें अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। वे घटना को रचने के बजाय संवेदना को खोलती हैं, जिससे कहानी किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय पाठक के भीतर प्रश्नों की गूँज छोड़ जाती है। उनकी भाषा बिम्बात्मक ही नहीं, बल्कि संयमित और अर्थगर्भी भी है, जो चुप्पियों, रिक्तियों और अधूरेपन के सहारे अपना अर्थ रचती है। इस प्रक्रिया में कहानी ‘क्या कहा गया’ से अधिक ‘क्या छूट गया’ में अपना विस्तार पाती है। यही कारण है कि निधि अग्रवाल का कथा-लेखन कहानी की एक नई परिभाषा गढ़ता प्रतीत होता है, जहाँ कथा वस्तु चेतना की एक सक्रिय प्रक्रिया बन जाती है।
         निधि अग्रवाल की कहानियों की संरचना पारंपरिक कथानक-बोध को असहज करती हैं। वे सीधे मुद्दे पर पहुँचने के बजाय कहानी को टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियों से गुज़ारती हैं, जहाँ पाठक को बार-बार यह भ्रम होता है कि कथानक हाथ से फिसल रहा है। किंतु यह फिसलन वस्तुतः विघटन नहीं, बल्कि लेखकीय रणनीति है। कथानक यहाँ रेखीय न होकर संकेतों, मनोवैज्ञानिक उतार-चढ़ावों और अनुभव की परतों में छिपकर आगे बढ़ता है। लेखिका जान-बूझकर कथा के स्पष्ट केंद्र को धुंधला करती है, जिससे पाठक को घटना नहीं, प्रक्रिया में शामिल होना पड़ता है। अंततः जो बिखराव प्रतीत होता है, वही एक सघन संरचना में बदल जाता है। इस तरह निधि अग्रवाल कहानी को ‘क्या हुआ’ के स्तर से उठाकर ‘कैसे घटित हुआ’ और ‘किस तरह महसूस हुआ’ के स्तर पर ले जाती हैं, जहाँ कथानक अदृश्य होते हुए भी पूरी सक्रियता से उपस्थित रहता है।

*पाँचवें पुरुष की तलाश में*
इस धरती पर प्रेम हर मनुष्य की अनिवार्य आवश्यकता है। उसे शक्ति कहें, कमजोरी कहें या कोई और नाम दें, अंततः वह जीवन की मूल आकांक्षा के रूप में सामने आता है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या स्त्री और पुरुष का प्रेम एक-सा होता है?
        स्त्री जब अपनी रूह में झाँकती है तो पाती है कि वह स्वयं सहारा देने की क्षमता रखती है; वस्तुतः अनेक स्थितियों में वही पुरुष का संबल बनती है। फिर भी उसके भीतर बचपन से रोपी गई निर्भरता की एक सूक्ष्म ग्रंथि उसे जीवन भर कुरेदती रहती है, प्रेम की चाह, सुरक्षा की आकांक्षा और आज के समय में सामाजिक ‘स्टेटस’ की अनिवार्यता। यही वे कारण हैं जो उसे बार-बार किसी संबंध की ओर आकृष्ट करते हैं।
        कहानी की नायिका अपने जीवन में आए पुरुषों में प्रेम तलाशती है, पर उसे प्रेम नहीं, अधिकार मिलता है। संबंधों में स्नेह की जगह स्वामित्व की भावना अधिक प्रबल दिखाई देती है। वह बार-बार यह अनुभव करती है कि उसे स्वीकार तो किया गया है, पर समानता के साथ नहीं। प्रेम की जगह नियंत्रण और अपेक्षाएँ खड़ी कर दी जाती हैं।
        इसी निरंतर तलाश और भटकाव के बीच वह अंततः अपने आप तक पहुँचती है। उसे यह बोध होता है कि प्रेम किसी पुरुष का मोहताज नहीं होता; वह तो आत्मस्वीकृति और आत्मप्रेम से उपजता है। “पाँचवाँ पुरुष” दरअसल कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि उसका अपना आत्म है, जिसकी खोज में वह अनजाने ही भटकती रही। इस प्रकार कहानी प्रेम की पारंपरिक अवधारणा को प्रश्नांकित करते हुए स्त्री-चेतना को आत्मबोध की दिशा में ले जाती है। यह केवल प्रेम की तलाश नहीं, बल्कि आत्म-खोज की कथा है जहाँ भटकाव ही अंततः बोध का मार्ग बन जाता है।
"जितना वह ऊपर उठी है, उतनी ही गहरी उसकी जड़ें पहुँचती जा रही हैं या यह विपरीत क्रम में हुआ? उसने हौले से उस प्रकाश पुंज को छुआ और पाया कि अब वह सूरज पर निर्भर न रही है। धूप न तलाश रही है। वह प्रकाश पुंज आत्मचेतना का अंश है। वह आकाश को न देख अपनी बाँहों की परिधि में अठखेली करती सृष्टि को गर्व से निहार रही है। सृष्टि सखी बन गई। सारी रिक्तताएँ भर गईं। सूरजमुखी को नया नाम दो। वह अब सूरज को नहीं तकना चाहता। वह रात में भी खिलना चाहता है, बरसात में भी। वह अपनी दिशा स्वयं निर्धारित करना चाहता है। अपना सारथी स्वयं बनना चाहता है।”

*पेड़ों पर उगी प्रतीक्षित आँखें*
पहाड़ों की आपदाएँ इतनी भयावह होती हैं कि उन्हें समझने के लिए कैमरे की नहीं, मन की आँखों के व्यापक फैलाव की आवश्यकता होती है। हर साया मानो स्वयं को देखे जाने की गुहार लगाता है, पर वह किसी समाचार की सुर्खियों में दिखाई नहीं देता। उसे महसूस करने के लिए संवेदनाओं के सैलाब की आवश्यकता होती है। देखना और देखे हुए को शब्दों में दर्ज करना, दोनों ही अत्यंत दुरूह, लगभग असंभव-से कार्य हैं।
       यह कहानी पहाड़ों के क्षरण की कथा है,जहाँ पेड़ों की अनावश्यक कटाई ने सुविधा और तथाकथित आधुनिकता के नाम पर प्रकृति को आहत किया है। हर पेड़ अपनी मौन व्यथा स्वयं कहता हुआ प्रतीत होता है। प्रकृति के विनाश से उपजा यह भयावह सत्य कहानीकार की कल्पना में आकार लेकर पाठक के सामने एक तीखी चेतावनी की तरह उपस्थित होता है।
        “बारिश की बूँदों के कोमल स्पर्श से अचानक किसी की वर्षों की तन्द्रा टूट गई। पानी ने पानी का तन चीर दिया। हिंसक व्यक्ति अपनी जाति के प्रति भी असहिष्णुता से भर उठता है। एक चीत्कार वादियों में गूँज गई और जल की प्रत्येक बूँद ने विनाश के संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। बदला हवाओं में तैरने लगा। कोई भी गुनाह क्षम्य नहीं होता। दंड मिलता है। भले ही अगली पीढ़ी को। कुछ वसीयत प्रकृति गुपचुप लिखती रहती है।”

*शोकपर्व* 
शीर्षक ही अपने भीतर गहरा विरोधाभास समेटे है। शोक और पर्व, दो विपरीत अर्थों वाले शब्द, यह संकेत देते हैं कि कहानी मृत्यु को केवल दुख के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक विडंबना के रूप में प्रस्तुत करती है।
       कहानी अंधविश्वास के “धंधे” पर व्यंग्य से आरंभ होती है। बेरोजगारी की मार ऐसी है कि नास्तिक बेटा भी उसी व्यवस्था का हिस्सा बनने को विवश हो जाता है, जिसे वह भीतर से नहीं मानता। समाज भले इस कर्मकांड को हिकारत की दृष्टि से देखे, पर अपने स्वार्थ सिद्ध होने पर वही लोग उसकी शरण में पहुँचते हैं, यहीं कथा का तीखा व्यंग्य निहित है।
       पिता अपनी मृत्यु को बेटे की स्थापना का साधन बना देता है, यहीं ‘शोक’ का ‘पर्व’ में रूपांतरण होता है। अंत अत्यंत मार्मिक है, क्योंकि यह त्याग और व्यवस्था की क्रूर विडंबना, दोनों को एक साथ उजागर करता है। कहानी व्यंग्य से चलकर गंभीर सामाजिक व्यंजना में परिणत होती है।
       “आस्था का खुला व्यवसाय!" वह बड़बड़ाया था। कह बैठा था, "नियति के सताए लोगों के दुःखों का दोहन करते मन नहीं काँपता आपका?" माँ का ऊपर उठा हाथ बस काँप कर रह गया था। बाबा मौन बैठे रहे थे।
        वह निरुद्देश्य शहर और विगत की गलियों में भटकता रहा। जिन लड़कियों ने उसे तन सौंपे उनके प्रति भले ही वह ईमानदार न रहा हो पर जिन्होंने अपने दुःख सौंपे, उनसे अटूट रिश्ता बँध गया।”

*लाल जुराबों में कैद बसंत*
सामान्य परिवारों में भाई-बहन के बीच अक्सर बड़े-बुजुर्ग अनजाने में एक अदृश्य दीवार खड़ी कर देते हैं। फिर भी बड़ी बहन और छोटे भाई का संबंध कई बार माँ-बेटे जैसी आत्मीयता में ढलकर उभरता है। बहन भाई के लिए चट्टान की तरह अडिग खड़ी रहती है; किंतु कम आयु और अपरिपक्व साहस के कारण भाई हर बार उसी दृढ़ता से उसका साथ नहीं दे पाता।
        दृढ़ता, साहस और जिद, ये तीनों जब एक साथ हाथ थाम लेते हैं, तो मंज़िलें दूर नहीं रहतीं। यह कहानी एक मध्यवर्गीय परिवार की उस लड़की की है, जो अपने मन के निर्णय लेने का साहस रखती है। उसके साथ उसका भाई और माँ हैं, सहयोग, संघर्ष और स्नेह के साथ।
        कहानी में स्कूल और कॉलेज जीवन की कुछ अप्रिय घटनाओं की छाया भी है, तो उत्साह, जिजीविषा और सफलता के उजले रंग भी। संघर्षों के बीच रिश्तों की ऊष्मा और आत्मविश्वास की चमक ही इस कथा का मूल स्वर है।
        “मुझे दिन कभी पसन्द नहीं रहे। दिन में बहुत भीड़ होती है। रात में दीदी अधिक अपनी लगती है। इन दिनों दीदी देर रात तक पढ़ती है।  दादी कहती है कि मैं उनके पास सो जाया करूँ। जलती बत्ती के कारण मेरी नींद टूटेगी। बात सच होने पर भी मैंने त्वरा में गर्दन हिला असहमति जताई। दीदी भी दादी की बात से स्तब्ध दिखी। कुछ बोली नहीं लेकिन तबसे वह टेबिल लैंप जलाकर पढ़ने लगी।  ऐसे ही किसी ढलते दिन, दीदी कुछ गुनगुनाती हुई मेरे बाल सहला रही थी। मुझसे सलाह किए बगैर मेरा मन कह उठता है- "दीदी, क्या तुम मुझे कुछ ज़्यादा प्यार नहीं कर सकती?" यही नहीं। अब मैं फूट-फूट कर रो भी रहा हूँ। दीदी भौंचक उठ बैठी है। मुझे बाँहों में भींचते कह रही है, "अरे पगले, तुझे ही तो करती हूँ। तेरे सिवा और किसे करती हूँ?”

“प्रेम एक पालतू बिल्ली*
कहानी  प्रेम को किसी कोमल रोमानी भाव के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवित, स्वतंत्र सत्ता के रूप में देखती है। बिल्ली की तरह उसे सहलाया जा सकता है, पर यदि उसे सुरक्षित रखने के नाम पर उसकी प्रकृति ही काट दी जाए, तो वह केवल उपस्थिति भर रह जाती है। कहानी इसी बिंदु पर आकर ठहरती है; 'प्रेम का बधियाकरण'।
        यहाँ आधुनिकता की चमक के भीतर छिपी वह संरचना उजागर होती है जहाँ देह, इच्छा और मातृत्व तक पर नियंत्रण संभव है। सुविधा और संपत्ति की सुरक्षा में प्रेम की स्वाभाविकता कुर्बान कर दी जाती है। वह जीवित तो है, पर संपूर्ण नहीं; स्पर्श है, पर विस्तार नहीं। कथा प्रश्न करती है ,क्या हम प्रेम को पालते हैं, या उसे इस तरह विनीत बना देते हैं कि वह हमारी व्यवस्था के अनुकूल हो जाए? और यदि ऐसा है, तो क्या वह प्रेम रह भी जाता है?
“इस बात का दुख है आपको कि…”
       “नहीं, दुखी क्या होना?”  धूप अब मलिन हो चली थी। वह खड़ी होकर अपनी जैकिट पहन रही थी। उसे दस्ताने भी पहन लेने चाहिए थे। उसकी अंगुलियों को देख लगता था कि वे ठंड से लाल पड़ रही हैं, “मैंने कहा न रिश्तों से सुख- दुख कभी जोड़ा नहीं मैंने।” वापस बैठते हुए वह मुस्कराई, उजली- सी संतृप्त मुस्कान, जो प्रायः भीतरी सुख से ही उमगती है।
         मैं आश्चर्य से उसे देखता रह गया। नहीं यह कोई बड़ा रहस्य नहीं था मेरे लिए पर इसका ऐसा सहज स्वीकार बिरले ही कर पाते हैं।
        “आपको मैं स्वार्थी लग रही होऊंगी न। छोटे परिवार की महत्वाकांक्षी लड़की, अमीर लड़के को फंसाने वाली… ?” वह तंज से देर तक हंसती रही।
         मैंने मौन रहकर गुनाह स्वीकार लिया।”

*नेपथ्य से*
यह केवल कहानी नहीं, यथार्थ है, ऐसे आतंक का, जिसमें ज़िंदगियाँ ही नहीं झुलसतीं, पूरी कायनात झुलस जाती है। विश्वास के चीथड़े होते हैं, अवसाद की विजय होती है। सबसे अधिक त्रासद यह है कि वहाँ के बेगुनाह बाशिंदे अपराधी न होकर भी अपराधी बना दिए जाते हैं। संदेह की दृष्टि उनके अस्तित्व पर स्थायी धब्बा बन जाती है। आतंक केवल देहों को नहीं, सामाजिक संबंधों और मानवीय भरोसे को भी घायल करता है।
       फिर भी इस समूची अंधकार-गाथा में एक क्षीण किंतु दृढ़ प्रकाशरेखा उपस्थित है। प्रकृति अपने घाव भरना जानती है; वह विध्वंस के बाद पुनः सृजन करती है। ऋतुएँ लौटती हैं, वृक्ष पुनः पल्लवित होते हैं, नदियाँ अपना मार्ग बना लेती हैं। मनुष्य को उसका अनुसरण करना आना चाहिए। यदि प्रकृति विनाश के पश्चात भी जीवन का संगीत रच सकती है, तो मनुष्य क्यों नहीं? यही आशा इस कहानी का अंतःस्वर है कि नेपथ्य में जितना अंधकार है, उतनी ही संभावनाएँ भी छिपी हैं।
        “दुख सदा निजी होते हैं बरख़ुरदार! मैंने बेटे की अर्थी को कंधा दिया है। यह कंधे अब कभी सीधे नहीं होंगे। उन्हें यह नहीं दिखता। उन्हें ज़मीन दिखती है। सत्ता दिखती है। मुझे वो ज़मीन दो जिसकी मिट्टी का रंग लाल न हो। जिसके सीने में किसी का बच्चा दफ़न न हो। मैं बैठूँगा उस ज़मीन पर, अपने हक़ के लिए रोज़ धरने पर बैठूँगा" शफ़ी साहब ने कहा और मन ही मन अमन के हित में कोई दुआ पढ़ी। मैंने उस दुआ के रथ पर सवार हो दिलबाग को आते देखा। उन्होंने बच्चे को चूमा। वह खिलखिलाने लगा। कुम्हलाए कनेर पर बसंत उतर आया।”

*होलोकास्ट*
जीवन का नाम ही अप्रत्याशित घटनाओं की शृंखला है। जब इन घटनाओं का दबाव असहनीय होने लगता है, तो वे मानसिक विकार की भाँति जीवन भर पीछा नहीं छोड़तीं। जन्मजात विकार शायद किसी हद तक स्वीकार किए जा सकते हैं, पर वे घटनाएँ, जिनसे गहरी ग्लानि जुड़ी हो, केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहतीं; वे पूरे परिवार को अपने दायरे में ले लेने की क्षमता रखती हैं।
         कालांतर में जीवन चाहे कितना ही व्यवस्थित और सुविधाजनक क्यों न हो जाए, अप्रत्याशित का दंश भीतर कहीं जीवित रहता है। व्यक्ति अपने चारों ओर असंख्य भँवर रच लेता है और धीरे-धीरे उन्हीं में धँसता चला जाता है। अपनी ही निर्मित कैद से स्वयं को मुक्त करना सरल नहीं होता। कहानी में उल्लिखित क्रूर “होलोकास्ट” का प्रसंग इस त्रासदी को और भी मार्मिक तथा संवेदनात्मक गहराई प्रदान करता है।
         “यह 19वीं शताब्दी नहीं थी। न ही यह उस देश की घटना है जहाँ यहूदी और नाजी रहते हैं, फिर क्या कारण था कि शिविर तैयार किए जा रहे थे? देश कोई भी हो। जाति कोई भी हो। सत्य यह है की पलड़ा कभी सम पर नहीं रुकता। ऊँचे पलड़े को सदा नीचे वाले पलड़े से कोफ़्त होती है। उसे लगता है कि इसकी उपस्थिति के कारण ही  समाज की विद्रूपता है। ऊपर वाला नीचे वाले को धिक्कारता रहता है। कमतरी का एहसास कराता रहता है। जाने -अनजाने उसका अंत कर देना चाहता है।” 

*अदृश्य दरवाजे*
कभी-कभी निधि अग्रवाल की कहानियाँ परीकथा-सा आरंभ लेकर धीरे-धीरे किसी प्रेतकथा के सिहरन भरे अंत की ओर बढ़ती हैं। इस कहानी में भी एक ऐसा ही चरित्र उपस्थित है, जो शिज़ोफ्रेनिया से ग्रस्त है और अपने चारों ओर एक काल्पनिक संसार रच लेता है। उसके मतिभ्रम शब्दों के सहारे एक अलग ही कथा-विन्यास निर्मित करते हैं। यथार्थ और कल्पना की परतों के बीच झूलती यह कहानी पाठक के भीतर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव उत्पन्न करती है।
          “गोथेल की मीनार में कैद गौरांगी, खिड़की पर बैठी कोई शोकगीत गा रही है। उसे विश्वास है कि इस गीत में निहित वेदना किसी राजकुमार को खींच लाएगी। अपने जीवन के अधूरे चित्रों को पूरा करने की कूची मन के पास होती है। जीवन में पसंदीदा रंग भरने का अधिकार कौन-सी उम्र में मिलता है? रंगों में इतनी खींचतान क्यों है? गौरांगी एक चित्र की पृष्ठभूमि में गुलाबी रंग भरती है और  आस-पास सजे अन्य चित्र स्याह पड़ने लगते हैं। एक चंचल लड़की, मेरे कमरे का पर्दा खिसका कर अंदर झाँकती है। गौरांगी का हाथ उसे बाहर खींचता है। जामुनी दुपट्टे वाली लड़की अपने माथे पर तर्जनी उँगली घुमा कर सांकेतिक भाषा मे मेरा परिचय देती है। नीले स्वेटर वाली लड़की मुँह पर उँगली रख चुप रहने का इशारा करती है।”

*पूँछ पर पंख*
 सत्ता-लोलुपता का प्रतीकात्मक आख्यान
यह कहानी समकालीन राजनीति के नैतिक पतन पर तीखा और प्रतीकात्मक प्रहार करती है। यह केवल एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति की कथा नहीं, बल्कि उस मानसिकता का उद्घाटन है, जो सत्ता पाने के लिए संबंधों, संवेदनाओं और मानवीय मूल्यों को तिलांजलि दे देती है।
         कहानी का नायक राजनीतिक महत्वाकांक्षा से संचालित है। वह अपने ही लोगों के साथ छल करता है, पर सामने परोपकार और आदर्शवाद का मुखौटा ओढ़े रहता है। अपने आराध्य की मूर्ति बनवाने के नाम पर वह एक गरीब, बूढ़े मूर्तिकार की विवशता का शोषण करता है। यहाँ मूर्तिकार केवल एक पात्र नहीं, बल्कि श्रम और कला की उस दुनिया का प्रतिनिधि है, जिसे सत्ता अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करती है। अंततः धूल-धप्पड़ और अभावों में बीमार होकर उसकी मृत्यु व्यवस्था की निर्ममता को उजागर करती है।
          नायक का चरित्र-विकास दरअसल चरित्र-पतन है। वह अपने मित्र की बहन को प्रेमजाल में फँसाकर विवाह करता है, मित्र को धोखा देता है और बड़े राजनेता से साँठ-गाँठ कर चुनाव लड़ने की योजना बनाता है। मित्र को भी छलपूर्वक अपनी रणनीति में शामिल करना उसकी नैतिक गिरावट की पराकाष्ठा है।
          कहानी का सबसे सशक्त तत्व उसका प्रतीकात्मक बिंब है,  नायक की पीठ पर धीरे-धीरे उगती हुई पूँछ। यह पूँछ उसके भीतर पनपते पशुत्व, स्वार्थ और अवसरवाद का रूपक है। जैसे-जैसे उसका छल बढ़ता है, पूँछ आकार लेती जाती है और अंत में पूर्ण आकार में उभर आती है। यह रूपांतरण बाहरी नहीं, आंतरिक है ,मानव से पशु में अवनति का संकेत।
          यह कहानी सत्ता-लिप्सा की उस विडंबना को रेखांकित करती है, जहाँ व्यक्ति ऊँचा उड़ने के लिए पंख तो चाहता है, पर उसके भीतर उगती पूँछ उसके वास्तविक स्वरूप को प्रकट कर देती है।
         “पंखों की कल्पना में खोया पहले वह उन्हें कभी नीला, कभी हरा, कभी केसरिया रंगता रहा था, फिर उसने जाना की बहुरंगा होना होगा और यह भी कि सर्वाइवल के लिए अनुकूलता सबसे ज़रूरी है। जिस रंग की सत्ता हो गिरगिट की तरह उसी रंग में रंग जाने का हुनर। उहुँ…गिरगिट तो सुगला है। उसे मोर बनना है। लुभावना… चित्ताकर्षक! लेकिन मोर ऊँचा कब उड़ पाता है? ऊँचा तो बाज उड़ता है। अरे कुँवर, तुम गधे के गधे ही रहोगे! उसने लजाते हुए अपने माथे पर हाथ मारा। देवता के अवगुण कब दिखते हैं, गुण ही गुण दिखते हैं और यहाँ तो तराश उसके हाथ है। वह सब उत्तम चयन करेगा।”

*सड़क पार की खिड़कियां* 
स्त्री के अंतर्द्वंद्व और आत्मबोध की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। यहाँ ‘खिड़कियाँ’ केवल बाहरी दुनिया की नहीं, मन की उन दरारों की भी प्रतीक हैं जिनसे वह अपनत्व की रोशनी खोजती है। तलाक की प्रक्रिया, अकेली माँ का दायित्व और बेटी की मासूम आकांक्षा इन सबके बीच स्त्री अपने घर, काम और सामाजिक जीवन को साधने का प्रयास करती है, किंतु भीतर कहीं स्नेह की चाह बनी रहती है।
          कवि का आकर्षण संवेदनशीलता का भ्रम रचता है, पर उसका कल्पनालोक से बाहर न आना आभासी संबंधों की सीमाएँ उजागर करता है। स्त्री का मोहभंग पराजय नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना है। मोबाइल उठाकर ‘सारी खिड़कियाँ बंद कर देना’,यह बिंब कहानी को समकालीन संदर्भ देता है और सोशल मीडिया के आभासी रिश्तों की परत खोलता है।
          “यह सड़क अब सड़क भर नहीं है। मेरा दूसरा घर बन चुकी है। क्या हैरानी है? जिनके अपने घर नहीं होते सड़कें सदा ही से उनका घर बनी हैं। भले ही वह बुरे मौसम से आपकी रक्षा न कर पाए… भले ही किसी अनियंत्रित गाड़ी के नीचे आप कुचल दिए जाओ… भले ही अपेक्षित निजता यहाँ अप्राप्य है लेकिन हर प्रकार की दरिद्रता का विकल्प सड़कें ही हैं। सड़कों ने कभी किसी के लिए भी अपनी बाहें नहीं सिकोड़ी।”

*वारका बीच पर डॉल्फ़िन*
क्या सचमुच शारीरिक विकलांगता मनुष्य की जिजीविषा को प्रभावित करती है या मानसिक विकलांगता उससे कहीं अधिक घातक सिद्ध होती है? यही प्रश्न इस कथा की आधारभूमि है।
         समुद्र का बाहरी विस्तार यहाँ मनुष्य के भीतरी संसार के समानांतर चलता है। एक विकलांग रूममेट, जो आरंभ में लगभग अप्रासंगिक-सी प्रतीत होती है, धीरे-धीरे जीवन की पूरक बन जाती है। वह केवल साथ रहने वाली नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाली उपस्थिति है। उसमें निष्कलुष ममत्व है।
          डॉल्फ़िन देखने की आकांक्षा में समुद्र की लहरों और स्टीमर के बीच अठखेलियाँ होती हैं। वह दिखती भी है और नहीं भी। मानो जीवन की कोई अधूरी चाह, जो क्षितिज पर चमकती है पर हाथ नहीं आती। अंततः एक दिन एक विशालकाय डॉल्फ़िन का शव स्वयं किनारे पर आ जाता है। उसकी मृत देह केवल दृश्य नहीं, बल्कि अनुत्तरित प्रश्नों का प्रतीक बन जाती है, जीवन, जिजीविषा, प्रेम और अपूर्ण इच्छाओं के प्रश्न।
         “एक लंबी प्रतीक्षा में मेरे कैलेंडर से वार, त्यौहार, तारीखें सब उड़ चुकी हैं जबकि माया का हर पल नए रोमांच से भरा रहता है। जितना समाज उससे छीनता है, वह उससे दुगना वसूल लेने पर आमदा हो जाती है। उसे कोई ज़िद हो, जैसे नफा कमाने की! मेरे सारे बहिखाते नियति सील कर चुकी है। एक महीन ईर्ष्या मेरे भीतर घर बना रही है, जिससे आँख मिलाने का साहस मुझमें नहीं है। अपने खिलाफ़ मुकदमा लड़ते मैं हाँफ जा रही हूँ।”

* चंदा क ख ग नहीं चिन्ह्ती* 
शीर्षक पढ़ते ही अनायास त्रिलोचन शास्त्री की प्रसिद्ध कविता ‘चंपा काले अच्छर नहीं चिन्हती’ स्मृति में कौंध उठती है। संभव है कि इस कविता का भाव-संसार लेखिका के मन-मस्तिष्क में कहीं गहरे दर्ज रहा हो और उसी की अनुगूँज इस कहानी के रूप में आकार ले आई हो। किंतु यह कथा किसी प्रभाव की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र संवेदना और सामाजिक यथार्थ के साथ उपस्थित होती है।
         यह एक ऐसी स्त्री की कथा है, जो निरक्षर होते हुए भी जीवन का सबसे कठिन पाठ पढ़ चुकी है, आत्मसम्मान का। चंदा ‘क ख ग’ नहीं जानती, पर अपने अस्तित्व की कीमत पहचानती है। सेठानियों के यहाँ मालिश कर वह श्रम के बल पर जीवन-यापन करती है, पर अपनी देह या इज्जत का सौदा किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं करती। उसके लिए श्रम ही पूँजी है और स्वाभिमान ही उसकी असली शिक्षा। यही शिक्षा उसे भीतर से दृढ़ बनाती है।
         मीणा के प्रति उसके मन में अंकुरित प्रेम को लेखिका ने अत्यंत संयम और गरिमा के साथ चित्रित किया है। यह प्रेम आवेगपूर्ण या अवसरवादी नहीं, बल्कि विश्वास की नींव पर खड़ा है। मीणा उसकी असहायता का लाभ नहीं उठाता; यही संवेदनशीलता चंदा के मन में उसके प्रति भरोसा जगाती है। सास का इस संबंध को मौन स्वीकृति देना केवल सामाजिक व्यवस्था का निर्वाह नहीं, बल्कि एक माँ की स्वाभाविक चिंता का परिणाम है कि बहू और बच्चे का भविष्य सुरक्षित हो सके। देवर-देवरानी की लालची दृष्टि और स्वार्थपूर्ण व्यवहार के बीच यह संबंध सचमुच एक आश्रय की तरह उभरता है।
         रेल में बैठी चंदा का घबराना और मन ही मन मीणा को कोसना, उसके भीतर की असुरक्षा, संकोच और प्रेम, तीनों को एक साथ उद्घाटित करता है। यह क्षण उसके मनोविज्ञान की गहराई को छूता है। वह प्रेम करती है, पर निर्भर नहीं होना चाहती; वह साथ चाहती है, पर अपने अस्तित्व की शर्त पर।
         कहानी के अंत में नदी का बिंब अत्यंत मार्मिक और प्रतीकात्मक है। वह नदी में समा जाने की बात करती है, पर प्रतीत होता है मानो पूरी नदी ही उसके भीतर समा जाती हो। वह टूटती नहीं, डूबती नहीं; बल्कि उसका मन ही एक अथाह, अविरल और गहन नदी बन जाता है। इस बिंब के माध्यम से लेखिका ने चंदा के आंतरिक विस्तार और उसकी मौन शक्ति को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया है।
        यह कहानी पाठक के भीतर करुणा नहीं, बल्कि सम्मान जगाती है, उस स्त्री के लिए जो अक्षर नहीं पहचानती, पर जीवन की सच्चाइयों को गहराई से पहचानती है। बुंदेली में लिखे चंदा के संवाद कथा को न केवल स्वाभाविकता प्रदान करते हैं, बल्कि उसके सामाजिक परिवेश और सांस्कृतिक धरातल को भी जीवंत बना देते हैं। इस प्रकार, यह कथा निरक्षरता और अज्ञान के पार जाकर स्त्री-अस्तित्व, श्रम और स्वाभिमान की एक सशक्त गाथा बन उठती है।
         “कुठरिया के भीतर से, चंदा ने धूप की झालर पहनी बुखरिया को देखा। दुकान के खंडहर और सूखे नल को देखा। झूठे बर्तन के ढेर और गंदे कपड़ों को देखा और कल्पना में बुखरिया पर तन गए छप्पर को देखा। छाँव की कल्पना ने धूप के घाव निर्ममता से खुरच डाले।”

*जहाँ हवा को भी पढ़ना आता है*
शीर्षक स्वयं प्रतीकात्मक है। ‘हवा’ यहाँ केवल प्राकृतिक तत्व नहीं, बल्कि संवेदना की वह अदृश्य शक्ति है, जो मन के अनकहे को भी समझ लेती है।
        एक ओर सामाजिक रूप से सुरक्षित और व्यवस्थित भविष्य का प्रतीक युवक है, दूसरी ओर प्रकृति से जुड़ा वह युवक, जो मानव मन की थाह जानता है। युवती का चयन केवल आकर्षण नहीं, संवेदनात्मक सामंजस्य का चयन है। सिक्किम का प्राकृतिक परिवेश कथा में सक्रिय उपस्थिति की तरह उभरता है।
         यहाँ प्रेम निजी न रहकर पर्यावरणीय प्रतिबद्धता में रूपांतरित हो जाता है। अंत का प्रश्न, “मिलना” और “पाना” क्या एक ही है? कहानी को गहरी व्यंजना प्रदान करता है।
          “तीस्ता के जल पर सालों पहले लिखी गईं तहरीर पुनः उजागर होने लगीं। "आज नदी कितनी उदास है!' वह पानी को बेहद आहिस्ता से छूता हुआ बोला।" मानो तीस्ता की रुग्ण आत्मा को सहलाता हो।
          "उदास है?"
          "हाँ बहुत उदास।" उसके स्वर में एक अनचीन्हा शैथिल्य था।
           "उदासी का कारण?" मैंने जानना चाहा।
          "उदासी एकांत की  पूँजी है, चेतना। कारण साझा किए जाने से दरिद्रता अनावृत हो जाती है।"

*शैतानी तुरही*
यह कहानी अमानवीयता की भयावह आहटों को दर्ज करती है। धर्म, सत्ता और पाखंड के गठजोड़ में मासूम देहों का शोषण होता है। अपराध की शिकार बच्ची स्वयं को अपराधिनी मान क्षमा माँगती है। यह दृश्य भीतर तक झकझोर देता है और ऐसे अपराधियों के प्रति हृदय जुगुप्सा से भर उठता है। कहानी कहीं न कहीं घट रही निरंतर ऐसी घटनाओं की साक्षी है, जिनमें अबोध बालिकाओं का शोषण होता रहा है। चाहे देश का निठारी कांड और या एप्सटीन फाइल के खुलासे या देवदासी प्रथा का घिनौना सच।सभी प्रसंग इस कथा की पृष्ठभूमि में गूँजते प्रतीत होते हैं।
          एक अंधकार पूरी कहानी में छाया रहता है जो अपराध, अनैतिकता और घृणा का दृश्य साकार करता है। ऐसे में नीम अंधकार में नर्स का चरित्र आशा की क्षीण किंतु दृढ़ लौ की तरह उभरता है। वह जीने का साहस देती है, कीचड़ से बाहर निकलने का मार्ग दिखाती है। यही वह बिंदु है, जहाँ कथा निराशा से प्रतिरोध की ओर मुड़ती है। फिर भी, सम्पूर्ण कथा पाठक को भीतर तक झकझोर देने की अपनी शक्ति बनाए रखती है।
         “अभी रजस्वला भी न हुई इन लड़कियों को दिन-रात कई घुड़सवार रौंदते रहे और देवता अर्धउन्मीलित नैनों संग मद्धिम मुस्कान देता इस नृशंसता से अछूता बना रहा। 
          कहीं कोई शोक सभा नहीं हुई, न ही कोई निंदा प्रस्ताव पारित किया गया। केवल भंवरों ने शिकायत की कि कलियों को छलने का उनका पहला हक था, गिद्धों का नहीं। गिद्ध अपनी क्षमता पर खुद ही पीठ ठोंकते गर्वित अट्टहास करने लगे फिर कुछ मनुहार के बाद, जल्द दोनों पक्षों में समझौता हो गया, देवता का प्रसाद मिल- बांट कर खाने में कल्याण था।”

        निधि अग्रवाल की भाषा अत्यंत चित्रात्मक है। प्रत्येक दृश्य आँखों के सामने साकार हो उठता है। यह कहानियां लेखिका की वैचारिक निर्भीकता और संवेदनात्मक गहराई का प्रमाण है।
           निधि अग्रवाल का कथा-संसार प्रेम, प्रतिरोध, प्रकृति, सत्ता, स्त्री-अस्मिता और मनोवैज्ञानिक जटिलताओं का बहुआयामी संसार है। उनकी कहानियाँ पारंपरिक कथानक की सीमाओं से बाहर निकलकर संवेदना की नई परिभाषा गढ़ती हैं। वे पाठक को तैयार निष्कर्ष नहीं देतीं, बल्कि उसे सोचने, ठहरने और भीतर उतरने के लिए विवश करती हैं।

रूपेंद्र तिवारी 
एम० ए० समाजशास्त्र/ हिंदी साहित्य। एल० एल० एम ०(विधि)।
मुख्य रूप से हिन्दी, पंजाबी, छत्तीसगढ़ी में लिखती हैं। कविता, गीत, ग़ज़ल, कहानी, सामयिक विषयों पर लेख, आलेख, निबंध के अतिरिक्त विभिन्न साहित्यिक विधाओं की पुस्तकों पर समीक्षाएं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, गीत, ग़ज़ल, कहानी, समीक्षाएं आदि प्रकाशित। एक दर्जन सांझा संकलनों में कविताएं, गीत, ग़ज़ल कहानी आदि संकलित। मुक्तिबोध समग्र पर शोधकार्य कर रही हैं। रायपुर (छत्तीसगढ़) में वास।

टिप्पणियाँ

  1. बहुत-बहुत गहन समीक्षा, आदरणीय ने मन से अध्ययन किया और सारगर्भित लिखा

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