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प्रज्ञा गुप्ता की कविताएँ



तुम्हारे प्रेम में


तुम्हारे प्रेम में
मैं नदी सी बहती रहूँ,
तुम पूरबी पवन-सा
साथ चलना

तुम्हारे प्रेम में 
मैं वृक्ष बनूँ,
तुम पहाड़ -सा
सीना लिए
बादलों को रोकना

तुम्हारे प्रेम में
मैं आँधी बनूँ,
हवा की रफ्तार बन 
तुम साथ  चलना

तुम्हारे प्रेम में
मैं फसल बनूँ,
तो तुम धूप बन
मुझ पर चमकना!



बैजनी रंग 

हवा बन जाऊंगी
पानी बन जाऊंगी 
इसी माटी में 
समाऊंगी,
मर कर कहाँ जाऊंगी?
आलू की क्यारियों में,
झूमूँगी फूल बन,
तुम बैंजनी रंग बन
मुझ पर चमकना!


जो छूट गया

आँख की कोर में
बचे हुए 
काजल की तरह
छूट गया
वह मुझमें !


प्रेम क्यों किया

हमने प्रेम किया
प्रेम में कुछ इच्छाएँ थीं कि 
अपने गांव की पगडंडी पर
हम दूर तक साथ-साथ चलते 
अब मेरे हाथों में है तुम्हारा हाथ
हम हैं अब भी साथ-साथ 
पर वह पगडंडी छूट गई ।

हमने प्रेम किया 
प्रेम में कुछ कामनाएँ थीं
कि दूर पहाड़ी के पीछे
फूले हुए पलाश के नीचे 
तुम मेरी खोंपा में खोंसते फूल
मैं गुनगुनाती कोई गीत 
हम अब भी हैं साथ-साथ 
बस पलाश का वह पेड़ नहीं है!

हमने प्रेम किया
प्रेम में कुछ आकांक्षाएँ थी कि
मैं नदी के किनारे- किनारे 
दूर तक जाती वन पाखी-सी 
तुम घने छाँव में बैठ 
बांसुरी बजाते
हम अब भी हैं साथ-साथ
बस अब वह नदी नहीं है!

हमने प्रेम किया 
वहीं कहीं, जहाँ थे हम साथ-साथ
हमारा प्रेम छूट गया 
किसी पेड़ की छाँव में 
विश्राम करता,
किसी राह में 
हम भटकते हुए
दूर निकल आए 
मंजिल की तलाश में

अब ना प्रेम है,
ना प्रेम की छाँव!
एक एकाकी मैना
जोर-जोर से गाती है
विरह के गीत 
पहाड़ से छूटने का दर्द 
अब है उसका जीवन राग
अब वह गाती है
हमने प्रेम क्यों किया?


हे मेरी कविता!

हे मेरी कविता
जड़ें पकड़ना
ऊँचाई लेना,
पेड़-सा होना
तुम्हारी छाँव में
कलेवा कर सके
कोई थका पथिक,
विश्राम कर सकें
पशु-पक्षी;
दुपहरिया में 
ठाँव धर सकें
श्रमिक;
हे मेरी कविता
छायादार होना!


किसने धरा है?

किसने धरा है
राजा का भेष?
सुनो मेरे देश
बचा लो, अपना परिवेश!
अपनी माटी में 
बचा लो पानी!
 बच्चों की कहानी में
 नाना और नानी
सुनो मेरे देश,
किसने धरा है
राजा का भेष?

पेड़ तो कट रहे
कम से कम बचा लो
अपनी भाषा में जंगल 
नहीं रहे जंगल तो
माटी में नहीं बचेगा पानी
फिर कैसे बचेगा
तुम्हारी देह में?
अब तो उतर ही चुका 
आँखों का पानी!

काँप रही धरती की देह!
थरथरा रहे पहाड़ 
जंगल में शेर नहीं;
है बस 
डायनामाइट की दहाड़!
पहाड़ रो रहा,
तो तुम कैसे रहोगे खुश  
पहाड़ का दुख
सुनो मेरे देश,
बचा लो अपना परिवेश!
किसने धरा है
राजा  का भेष!


अकारथ

एक कवि  क्या कर सकता है?
कुछ शब्द, संवेदना और कल्पना से
रचता है एक पंक्ति ,
जब तक रची जाती है एक पंक्ति 
धरती से काट दिया जाता है 
एक हरा -भरा पेड़
जब तक पूरी होती है कविता
एक पहाड़ टूट रहा होता है 
बार-बार अनगिनत प्रहारों से
जब तक तैयार होती है कविता 
वाचन के लिए किसी मंच पर 
तब तक उठा ली जाती है 
लड़की, बीच सड़क से 
जब तक कविता समझाती है अपना अर्थ 
तब तक हो जाता है सब कुछ व्यर्थ 
शब्द, संवेदना, कल्पना और कवि अकारथ!


मनमीत

उसने मुझे याद किया बारिश की पहली बूँद की तरह
उसने मुझे याद किया शरद की शीत की तरह
उसने मुझे याद किया किसी मधुर गीत की तरह
जब मैंने उसे याद किया मनमीत की तरह,
तो उसने मुझे भुला दिया किसी लोकगीत की तरह।


आँखें 

वाकई तुम्हारी वो
पनियायी आँखें 
अब तक पीछा कर रही हैं 
जो मिली थीं विदा के वक्त।
अब भी 
चुभ रही हैं 
उन आँखों की हँसी
जिसने हमारे 
बिछड़ने की
नियति बनाई।
 
साथी की 
आश्वासन भरी आँखें 
अब भी याद हैं
जिसने मुझे अपना
हाथ दिया। 
 
भयंकर समय में
कुछ आँखों ने
इशारा किया 
चुपचाप बैठे रहने का;
कुछ आँखों ने ठेल कर 
चढ़ा दिया हमें
समय की चलती ट्रेन में।
 
जो हँस कर मिली थीं 
उन आँखों की हँसी
अब भी याद है
जाने कैसी तो
खनकती हुईं मिली थीं।
 
एक माँ की आँखें हैं 
जो आवाज बनकर 
गूँज रही हैं 
ज़ेहन में ।
पिता की आँखें तो
दे रही दें अब भी
पीठ को सहारा
गिरने से बचा रही हैं।
 

आँखें थीं कि
 दरिया,
 जिसमें दिख रही थी 
 छवि अपनी;
 वे आँखें जो 
 भरी सभा में माँग रही थीं 
 सहारा
 बेबस
 भकुआई खड़ी रह गई थीं
 हमारी आँखें
 हाय! उन आँखों की बेबसी
 उनको याद कर कलप रहीं हैं
हमारी आँखें। 











प्रज्ञा गुप्ता
• विभिन्न पत्रिकाओं - वागर्थ, परिकथा ,बयां, समसामयिक सृजन, गुंजन ,दोआबा, समकालीन जनमत, अनहद, लहक में कविताएँ प्रकाशित एवं विभिन्न पुस्तकों एवं पत्र- पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित।
• प्रकाशित पुस्तक- “ नागार्जुन के काव्य में प्रेम और प्रकृति”
• संपादित पुस्तक- “साहित्य, समाज, योग और विज्ञान”, “झारखंड का हिंदी कथा-साहित्य”
"काँस के फूलों ने कहा जोहार!"- काव्य संग्रह प्रकाशित।
• संप्रति - विभागाध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग ,राँची वीमेंस कॉलेज ,राँची ।
ई-मेल- prajnagupta2019@gmail.com

टिप्पणियाँ

  1. इन कविताओं को पढ़कर महसूस हुआ कि कवयित्री का रचनात्मक संसार लोकजीवन और ग्रामीण संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है।यह जुड़ाव उनकी भाषा और बिंबों को माटी की सोंधी गंध देता है। अच्छी कविताओं के लिए हार्दिक बधाई!

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  2. ये कविताएँ बताती हैं कि प्रेम केवल निजी भावना नहीं, बल्कि जीवन और प्रकृति के साथ एकाकार होने का अनुभव है।

    जवाब देंहटाएं
  3. थरथरा रहे पहाड़
    जंगल में शेर नहीं;
    है बस डायनामाइट की दहाड़"
    शेर की दहाड़ की जगह डायनामाइट की आवाज़ आना इस बात का प्रतीक है कि इंसान ने प्राकृतिक जीवन को पीछे छोड़ दिया है और विनाश को आगे बढ़ा दिया है।
    संदेश अत्यंत मार्मिक, सार्थक और जागरूकता पैदा करने वाला है। वह सरल शब्दों में एक गहरी सच्चाई को सामने लाती हैं।

    जवाब देंहटाएं
  4. भावनाएँ अत्यंत सूक्ष्म, आत्मीय और अंतरंग हैं।

    जवाब देंहटाएं

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