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वेद प्रकाश की कविताएँ


बच्चा सो रहा है

माँ कहती है
सोते हुए बच्चे
हँसते हैं 
ऐसा लगता है
वे अपनी दुनिया में
ताक-झाँक कर रहे हैं या
अपने लोगों से
वार्ता में व्यस्त हैं
जबकि सेाते हुए बच्चे
हाथ और पैर 
इस तरह चलाते हैं
जैसे दुनिया लपक लेना चाहते हों 
जैसे दुनिया उनके पैरों के नीचे है
जैसे  उनकी मुट्ठी बंद होते ही
दुनिया के रास्ते बंद हो जाते हों 
मुट्ठी  खुलते ही
दुनिया के सभी रास्ते खुल जाते हों 
मैं तो देखता हूँ
माँ और बच्चे का यह खेल 
दुनिया बदल देगा
दुनिया अब गेंद न होकर
सपाट और चौकोर
समुद्र से घिर कर
पहाड़ पर चढ़ रही होगी

माँ बच्चे को पुचकारती है
दुलारती है
प्यार में डूबी हुई माँ
बच्चे की उंगली पकड़  कर
कहती है मेरा रास्ता
अब और कहीं नहीं
इन्हीं हथेलियों में बस कर
ललाट की रेखाओं में
बदल जाती है
बच्चा रोने लगता है
माँ गोद में ले लेती है
कहती है मेरे लाल मेरे लाल
अब बस भी करो
मेरा ठिकाना नहीं बदल सकता
यह ऐसा नक्शा है
जिसे कम्पास या गूगल में
भी नहीं पाया जाता 
माँ का चेहरा लाल हो जाता है
ओठ सूर्ख, आँखें विस्फारित
धरती का मन विचलित 
और, आँचल भीग जाता है
पेड़ों में हिचकोले उठने लगते हैं
एक मीठी और नर्म वायु
बच्चे को सहला जाती है
चंदन वन होता तो
पूरा शहर ही
शीतल हो जाता
पक्षी कलरव करने लगते
बादल चाँद को छिपाते 
लेकिन, चाँद कहीं न कहीं से
झाँक ही लेता,
इस तरह बच्चे का  
मामा मिल जाता
शृंगार करना लोग भूल गए
माँ बच्चे को संवार रही है
उसका मन है बच्चे का प्रतिबिंब
बच्चा ही हो
यह एक माँ का आदर्श वाक्य है
उसके जीवन का आदर्श ऐसा नहीं
कि लोग उसे वही देखें, जो है
वह चाहती है जो है उससे अलग हो
उससे चमकीला हो 
फिर, वह नये सूरज का इंतजार करती है
पेड़ों को सूरज के गर्मी का अंदाजा था
तभी तो सूरज को उन्होंने धीरे धीरे 
धरती पर आने दिया
माँ उन कोटर को झाँकती रही
जहाँ-जहाँ से सूरज की आँखें
तन रही थीं
बच्चा आज रोज से अलग-अलग था
माँ पुलकित थी
उसकी आँख एकटक बच्चे पर
लोग अचम्भित थे
लेकिन, लोगों से क्या ही होता
माँ बच्चे को अपने में समेट लेती है
दुनिया के सभी ग्रह उसके पक्ष में
दुंदुभि बजाने लगते हैं
शहनाइयाँ गूँज उठती हैं
गौरैया खुशी से
ताल में कूद जाती है
और, इतनी तैरती है,
डूबती उतराती है कि
जैसे कल को तालाब नहीं रहेगा
जैसे यह उसका अंतिम
स्नान होगा

माँ विह्वल थी
खुश थी, 
उसकी पुतलियाँ आँसू में 
तैर रही थीं
वह समझ नही पाई
जहाँ थी वहीं पर
अपनी थाती लेकर बैठ गयी
यह समय बच्चों के लिए
बहुत ही फलदायक और
अनुकूल होता है
माँ जब खुश रहती है
हवाएँ नर्म और सुखद हो जाती हैं
गर्म सूरज का ताप
चाँद को शीतल कर देता है 
बादल करवट बदलने लगते हैं
धरती का सीना
अंखुआने को बेचैन
पानी सराबोर करने को आतुर
पीपल के गाछ
आपस में लिपटने लगने
आदमी खुश होकर
छाया की आड़ में
अपना पसीना सुखाने का
उपक्रम करने लगते।

बाजार का सँवरना

हमेशा की तरह 
आज भी बाजार में
चहल-पहल थी
लोग न चाहते हुए भी
कुछ न कुछ खरीद रहे थे
यूँ कहा जाय कि
एक पर एक 
मुफ्त पा रहे थे
लोगों के चेहरे
बहुत खुश थे
लोग यह सोचने में नाकाम थे
कि जब एक से ही काम चल जाता
तब दूसरे की क्या ही जरूरत 

किसी ने कहा
थोड़ा आगे बढ़ते तो
एक पर दो 
मुफ्त मिल जाता
इतना ही नहीं
मुफ्त देने वाला
टोपी भी पहना रहा था
टोपी जो किसी काम की न थी
फिर भी, लोगों का वहाँ इतना
जमावड़ा था कि लोग
बेकाबू थे
पुलिस बुलानी पड़ी
लाठी चार्ज हुई
लोग रोते हुए
घरों को लौट रहे थे
लोग फिर नहीं सोच पाए कि
टोपी उन्हें क्यों चाहिए थी

लोग समय से अपने बारे में सोचते
अपने को समझते
अपनों को महसूस करते
जरूरत के मुताबिक
दुकानों पर जाते 
लेकिन, सोचने का काम
लोगों ने किया ही नहीं
लोग अफवाह को आधार माने
और दौड़ पड़े 
लोगों की नीयत ही
अफवाह पर टिकी है
इसीलिए आमफहम है कि 
लोग ही भीड़ में 
हिंसा के शिकार होते हैं
रक्षा में लगे हुए लोग
किसी की रक्षा नहीं करते
वे इंतजार करते हैं
कब भीड़ बढ़े और
लाठी चार्ज करनी पड़े
जैसे इनका यही उत्सव हो

लोग भटकते हैं
लोग जान ही नहीं पाते
अपने उद्देश्य
घुटने में दर्द है
डॉक्टर ने घुटना 
ही बदल दिया                                                 
सड़क बनानी है
घरों को गिरा दिया
खेतों को उजाड़ दिया
लोग न्याय भी नहीं पाते
कोर्ट कचहरी पंचायत
सब जगह दौड़ लगाने के बाद
मंदिर मस्जिद गुरूद्वारा
चर्च का भी चक्कर काट लिया
पत्थर तो पत्थर ही होता है
यह बात लोग थकने के बाद
जान पाते हैं

लोगों को याद आते हैं भगत सिंह
समस्या यह है कि लोग चाहते हैं
भगत सिंह उनके घर न पैदा हों
लोग भगत सिंह पर 
आज उचक-उचक
भाषण देते हैं
घर जाकर बच्चे को इस तरह डाँट पिलाते
जैसे वह आज भगत सिंह हो ही गया हो
बाउण्ड्री गिरायी जा रही थी
बच्चे ने विरोध कर दिया
महकमे के लोग उसे गिरफ्तार कर लिए
चेतावनी देकर छोड़े कि
यह सब सरकारी कार्य में बाधा है
हमें आदेश है गिराने का
सो मैं तो गिराऊंगा ही
संपत्तियाँ सरकारी होती हैं
न कि व्यक्तिगत 
क्रांति करना एक सोच है
पूजा करना जीवन की गति सुधारना है
हवा के साथ बह जाना
अपने कुनबे में सिमट कर सोये रहना
राष्ट्रीयता को खाद-पानी देना है
राष्ट्रवाद को पोसना है 
अमृतकाल की अवधारणा अपनी
नाकामयाबी को छिपाना है 
एक ऐसे बाजार के बारे में सोचा जाना चाहिए
जो मुफ्त में अफीम बाँटता हो
और, लोग ऐसे दौड़ पड़ते हों
जैसे जलेबी पर मक्खी 

जहाँ आदमी ही आदमी का न हो
वहाँ आदमी कैसे जीवित है
यह उस आदमी से पूछने से पता
चल सकेगा
जो पिछले चार दिनों से
रोज बाजार में जाकर खड़ा तो होता है
लेकिन, लोग उसे ले जाना इसलिए पसंद नहीं करते
कि वह कमजोर है और काम नहीं कर पाएगा
इस ढीले तंत्र को कसना होगा
और, बताना होगा कि 
तमाम कमजोरियों के बाद भी
हम बोलना बंद नहीं कर सकते
भले ही हमारी जुबान काट डाली जाय
आप देखिएगा
इस कमजोर आदमी की आवाज
एक दिन गूँज उठेगी
और, महकमे के लोग खलबला उठेंगे...।


मजाज़ के बगल में

मजाज़ की कब्र पर
दूब अपना अधिकार 
बनाये रखना चाहती है
गाछों ने इस तरह ढक रखा है
कहीं मजाज़ उठें और चले न जाएं
पेड़ और कब्र
दोनों चुपचाप अपनी-अपनी
तहरीर लिखने में लगे हैं
मजाज़ अब लिख तो नहीं पाएंगे
लेकिन, पेड़ों ने मजाज़ की बारीकी
और खूबसूरती अपनी रंध्रों में
जज्ब कर लिया है
जैसे उन्हें कभी हिसाब देना पड़ सकता है 

पेड़ जानते हैं
लोगों को तारीख याद है
जब मजाज़ दफ्न हुए थे
पेड़ों को तारीख से कोई मतलब नहीं
पेड़ों को लगता है
मजाज़ उनकी छाया में सुरक्षित हैं
धूप जैसे ही कब्र पर आती है
एक गाछ उसे रोक देती है
जैसे वह मजाज़ की शागिर्द हो
मजाज़  कभी भी लोगों से 
दूर नहीं रहे
ऐसा लगता है
पेड़ मजाज़ की बेहतरी
से ही ताल्लुक रखते हैं
मजाज़ की कब्र और पेड़
दोनों का तालमेल ऐसा है
जैसे मजाज़ ने पेड़ को
अपने में शामिल कर लिया हो
कब्र को पेड़ आँधियों से
ओलों से, प्राकृतिक विपदाओं से
बचा रहे हैं
जैसे  कोई नज्म नष्ट होने से
बचा रहे हों 
अकादमी में आने वाले लोग
मुसाफिर होते हैं
फूल-माला चढाने के बाद
दुबारा कहाँ आ पाते हैं
लोग यह भी तो जानते हैं
मजाज़ अब बोलने लायक नहीं रहे
मजाज़ की भाषा 
अब पेड़ों की भाषा हो गई 

हवाओं ने मजाज़ को
रदीफ और कफिया में
मदद की थी
मजाज रहते हुए 
देश और दुनिया के लिए
नज्मों को सजाते रहे
ये भौरे जो गुनगुना रहे हैं
ये चिड़िया जो चहक रही है 
गाछों ने जो वितान रचा है
उसे ध्यान से देखने और
गुनने का समय चाहिए
मजाज़ कहते रहे 
हम किसी के नहीं
मजाज़ सबके होकर रह गए
मजाज़ छिपने वालों में से नहीं
धरती में रह कर भी
हरियाली को हरेपन से
नवाज दिया

मिट्टी को मजाज ने
सख्त नहीं रहने दिया
मजाज़ की यही 
खूबसूरती लोगों को
मुहब्बत में डुबो देती है
मजाज़ इंसानी रिश्तों को
पिरोना जानते थे
मजाज़ आज भी
परचम में लहरा रहे हैं
मजाज़ कल भी 
कहते थे
रोशनी का इंतजार कभी मत करना
अंधेरे में घुस जाना
वहाँ एक चराग रख कर चले आना।
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कवि परिचय



वेद प्रकाश
कविता संग्रह  : यहीं से शुरू (2003), एक उपकथा (2010), एक सुंदर लड़की चाहती है (2014) भटके हुए लोग (2021)      
लेख संग्रह  : आलोचना का तर्क (2018)
पता : गोरखनाथ मंदिर, राजेन्द्र नगर - पश्चिम, भॉटी विहार, गोरखपुर-203015
मोबाइल : 9559097457

टिप्पणियाँ

  1. बेहतरीन कवितायेँ हैं
    अंतिम कविता ऊपर कि दोनों कविताओं से ज्यादा अच्छी है मुबारकबाद

    जवाब देंहटाएं
  2. वेद जी की कविताएं मैंने पहले भी पढ़ी हैं , इनकी कविता के प्रत्येक शब्द में अर्थ छुपा हुआ होता है, उपरोक्त कविताएं भी सोचने को विवश कर देती हैं

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. उपरोक्त टिप्पणी विनय मितवा की हेयर

      हटाएं
  3. वेद प्रकाश जी की सभी रचनाएं एक से बढ़कर एक है। इनकी रचनाएं पाठक को बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती हैं।

    अरुण कुमार श्रीवास्तव उर्फ शम्स गोरखपुरी

    जवाब देंहटाएं

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