डायरी अंश
ललन चतुर्वेदी
दिनांक : 19 फरवरी 2026
पराजित योद्धा की अनंत यात्रा और विजेता का जुलूस
पुरजोर कोशिशों के बावजूद पराजित होकर लौटना- इससे भी कोई बड़ी पीड़ा हो सकती है? एक ऐसा युद्ध जिसमें सामने कोई सैनिक खड़ा नहीं था. स्वयं से लड़ना था. तैयारी भी खूब की. रणनीतियां भी बनाई. युद्ध विषयक साहित्य का अध्ययन किया. अनेक विजेता और पराजित योद्धाओं से परामर्श भी लिया लेकिन अन्त्ततः चक्रव्यूह में फंस ही गया. इस चक्रव्यूह को किसी दुश्मन ने नहीं रचा था .स्वयं कुआं खोदा क्योंकि शीतल जल की तलाश थी. लम्बे समय तक भूखे-प्यासे जगत पर बैठा रहा. राहगीर देखते और हँस कर चलते बनते थे. एक भ्रम है कि जल हमारी प्यास बुझाता है. सुनने में यह पागलों की बात लग सकती है लेकिन ऐसा ही है. जल प्यास का तात्कालिक समाधान है. फिर ऐसा भी तो हो सकता है कि पानी ही पानी चारों ओर हो लेकिन पीने के लिए एक बूँद भी नहीं हो . मैंने कभी दो पंक्तियाँ पढ़ी थी-
Water-water every where
But not a drop to drink.
वर्षों तक इन पंक्तियों का अर्थ समझ नहीं पाया. यह दूसरी बात है कि जिस माँ को अक्षर ज्ञान नहीं हो वह अपने दैनिक कार्य-व्यवहार में कुछ जीवनोपयोगी मंत्र और जीवन-दर्शन भी समझा जाती है. मेरी माँ कहा करती थी- जो न मोरा राम के, सो कवना काम के. कबीर भी चेतना के स्तर पर इसी बात को कहते हैं-जल बीच मीन प्यासी. लोग तो इन बातों को सुनकर हँसेंगे ही. बात समझने के लिए आमने-सामने एक ही धरातल पर बैठना होता है. पानी है लेकिन इतने कारण होंगे और ऐसी परिस्थतियाँ होंगी कि आप पी नहीं सकेंगे. पानी का प्रबंध आपने ही किया है. ठीक है. पर उस पर आपका सर्वाधिकार नहीं है लेकिन प्यास बुझाने भर हक़ तो बनता ही है. याद रखने योग्य है कि ये सारी बातें भावनात्मक हैं और इसमें दैहिक तत्वों की तलाश करने का कोई औचित्य नहीं है. सो इस अतृप्ति के दुःख, इसकी पीड़ा की अकथ कहानी है. अपने विकारों को पी-पीकर इस प्यास को बुझाना है. इसके दुष्प्रभाव अर्थात साइड इफेक्ट तो होने ही होने है. भावनात्मक उर्जा के अभाव में यात्रा छोटी हो जाती है. इससे औरों को क्या फर्क पड़ता है. कहने को सहयात्री है लेकिन आप किसी स्टेशन पर उतर जाएँ, वह आपको ढूंढेगा नहीं. लोग पूछेंगे- आप ही के साथ थे. कहाँ रह गए ? जवाब हाजिर रहेगा- केवल मैं ही उनके साथ थोड़े था. उनके साथ सारी जमात थी. कहीं उतर कर चल गए होंगे. दुनिया अपने-अपने ढंग से इसका अर्थ लगाएगी. इस बीच यात्री अनंत की यात्रा पर जा चुका होगा. लोग विजेता के जुलूस में जश्न मना रहे होंगे.
डू द बेस्ट एंड लीव द रेस्ट
जब लिखने बैठता हूँ तो एक आशंका अवश्य होती है कि कोई इसे डायरी क्यों कहेगा. फिर मेरे इस लेखन से किसी को क्या मिलेगा. परन्तु इन बातों पर ध्यान दिए बगैर मुझे अपना काम करना है. भले ही इनमें डायरी का तत्व नहीं हो लेकिन दैनिक जीवन प्रसंगों से निकला सत्व तो है ही. इसका लिखना ही उद्देश्य है,संतुष्टि है. गंभीरता से विचार करें तो इस दुनिया को बनाने में उनलोगों का सर्वाधिक योगदान है जिन्हें कभी याद नहीं किया जाता है. मेरी दृष्टि में जिन्हें बार-बार याद किया जाये उनसे कहीं अधिक वे महत्वपूर्ण हैं जिन्हें भुला दिया गया है. वे सूक्ष्म रूप में मौजूद हैं. मेरे यहाँ एक कहावत है- थोड़ कईलन गांधीजी, बहुत कइलक लोगवा. जो सूचीबद्ध नहीं हुए या जो इत्यादि शब्द में समेट दिए गए,असल में वे ही नायक हैं. जैसे आज ही मैं संयोगवश बोले भारत पोर्टल पर गिरीन्द्रनाथ झा द्वारा 256 वर्षीय पूर्णिया जिले के बारे में पढ़ रहा था. भारत में सती-प्रथा आन्दोलन के पहले डुकरैल नामक एक अंग्रेज ने एक विधवा को सती होने से बचाया था. यह पावन कार्य करते समय उनके मन यह ध्यान नहीं आया होगा कि लोग उन्हें याद करे. पूर्णिया अनेक हिंदी और हिंदीतर भाषी साहित्यकारों की भूमि रही है जिन्हें विस्मृति के गर्त में धकेल दिया गया है अपने देश या पूरे विश्व में ऐसे अनेक लोग और स्थल हैं जिन्हें हम नहीं जानते. आशय यह कि हम जहाँ भी हों हमें अपने हिस्से का काम करना है. मेरा मानना है कि दुनिया में कुछ भी निरर्थक नहीं है.
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अच्छे को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है
कृष्ण मुझे बार-बार याद आते हैं. भूलते ही नहीं है. हल्का सा परिचय हुआ है.इतना भी नहीं कि बेसुध होकर नाचने लगूं. आधुनिक समय में कृष्ण को जिन गिने-चुने लोगों ने कृष्ण को पहचाना उनमें रसखान का नाम अग्रगण्य है. रसखान अर्थात -रस की खान. जीवन में कृष्ण उतर जाएँ तो रस ही रस है. रसखान हँस रहे है. क्यों? क्योंकि वह देख रहे हैं कि कृष्ण को अहीर की छोरियां छछिया भर छाछ पर नाच नचा रही हैं. आप जानते ही है अपने समय में कृष्ण का कितना विरोध हुआ था. उन पर तरह-तरह के लांछन लगाये गए. आखिर ऐसा क्यों? यह आज भी हो रहा है. घर,परिवार,पड़ोस ,समाज और देश, चतुर्दिक उन्हीं का विरोध होता है जो कुछ अलग सोचते हैं,कुछ अलग करते हैं. विडंबना यह है कि हर आदमी दूसरे को अनुकूलित करना चाहता है. यह कंडिशनिंग सारी बीमारियों की जड़ है. हम यह समझ ही नहीं पाते कि तू पसंद है किसी और की,तुझे चाहता कोई और है. गहराई से विचार करता हूँ तो लगता है कि हम सचमुच पागल हैं. हम उसके पीछे भाग रहे हैं जो दूसरे के पीछे भाग रहा है. वह भाग रहा है और हम उसके पीछे दौड़ रहे हैं. इतना दौड़ रहे हैं कि सांस फूल रही है. है न यह पागलपन! जिस दिन यह दौड़ रुके, उस दिन असली जीवन शुरू होगा. याद रखने योग्य है कि जिसके पीछे हम दौड़ रहे हैं वह पीछे मुड़कर एक बार देखना भी पसंद नहीं करता. लेकिन मन है कि मानता ही नहीं. बहुत दूर जाकर रुक जाता हूँ- इसलिए रुका रहा कि वह एक बार पुकार लो . वह नहीं पुकारेगा. तुम्हारे जैसे कितने प्रेमियों को दुनिया पागल घोषित कर चुकी है. अच्छे को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है. कृष्ण का जीवन दर्शन त्याग का जीवन दर्शन है. जगह हो या प्रेमी से प्रेमी मनुष्य- कृष्ण किसी के साथ बंधते नहीं हैं. जिसे छोड़ दिया,उसे छोड़ ही दिया. प्रेम मुक्ति का पाठ पढ़ाता है और हमें बंधना अच्छा लगता है. तोते की तरह हम अपना पिंजरा अपनी ही चोंच से बंद कर लेते हैं.
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दिनांक: 19.02.2026
दिनकर और बच्चन की याद
मेरे लिए सुबह का समय खूब उर्वर रहता है. विचार आते रहते हैं. चिंतन चलता रहता है. द्वंद्व भी होता है. मेरे एक शिक्षक दिनकर कृत द्वंद्व गीत पढ़ाते थे. द्वंद्व गीत की रुबाइयाँ मुझे बहुत पसंद है. यहाँ दर्शन और प्रेम का मणिकांचन संयोग है. कहते थे कि द्वंद्व का कवि कमजोर होता है. जो भी हो, एक रचनाकार प्रायः द्वंद्व में होता है और इसी से रास्ते भी निकलते हैं. इस पर बहस हो सकती है. इस बीच मैं यह जरूर कहूँगा कि अनूठे गद्य का आस्वाद लेना हो तो दिनकर का गद्य और बच्चन की आत्मकथा अवश्य पढ़नी चाहिए. कविता की रचना-प्रक्रिया और उद्देश्य आदि पर दिनकर जी के लिखे को इस क्षेत्र में उतरने और काम करने वाले लोगों को अवश्य पढ़ना चाहिए. आजकल मैं गंभीरता से सोच रहा हूँ कि मुझे पढ़ने में सेलेक्टिव होना चाहिए. कुछ भी पढ़ने की ललक से समय नष्ट होता है. बहुत समय बीत चुका है. एक सजग पाठक को समय की सार्थकता की समझ आवश्यक है. आज भी कुछ लेखकों का अध्ययन हमें हैरत में डाल देता है. बच्चन की आत्मकथा पढ़ते हुए मैं कई बार रोया. हिंदी आलोचना की बार-बार क्या आलोचना करूँ. दुःख होता है. बच्चन की कविताओं का वास्तविक अर्थ उनकी आत्मकथा पढ़ने के बाद खुलता है.
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लिखना जरूरी है
लिखते समय अब मुझे कोई द्वंद्व नहीं रहता. यह ध्यान में नहीं रहता कि कौन पढ़ेगा या कौन सी पत्रिका में छपेगी या अस्वीकृत होगी. मेरे लिए लेखन एक आंतरिक दबाव है. मैं अभिव्यक्त किए बिना नहीं रह सकता. यह अन्तःप्रेरणा है. मैं समझ नहीं पाता यह कहाँ से आती है. यह जहाँ से भी आए, इसे मैं सौभाग्य मानता हूँ. अकसर मेरे मुंह से यह बात निकलती है कि वह व्यक्ति भाग्यवान है जिसके हाथ में कलम है और जिसे बैठने के लिए एक अच्छी कुर्सी भी मिली हुई है. लेखक के पास तो केवल कलम ही है. कलम और कुर्सी का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए. इनका दुरूपयोग होते देख अपार दुःख होता है. काश, कलम पकड़ते यह बात उनके ध्यान में रहती. लेखन स्वतः स्फूर्त प्रक्रिया है. घनानंद वाली बात याद आती है- मोहि तो मोरे कवित्त बनावत. ऐसा भी हुआ कि महीनों बीत जाते हैं और एक अक्षर नहीं लिख पाता .कभी एक दिन में ही दो-तीन कविताएँ या एक व्यंग्य लिख लेता हूँ. विषय स्वयं दस्तक देते हैं. मैं कौन होता हूँ चयन करने वाला. जैसे, आज मन में यह बात आयी कि यदि वेदव्यास, वाल्मीकि या तुलसीदास ने नहीं लिखा होता तो क्या हमारा देश जैसा आज है, वैसा ही होता. इनकी कृतियों पर भक्ति काव्य का ठप्पा लगाकर हम छोड़ नहीं सकते. हमारी पीढ़ी को इन ग्रंथों का पारायण अवश्य करना चाहिए. हिंदुत्व आदि तक इन्हें सीमित कर देखना उचित और तर्कसंगत नहीं है. जिसने इन्हें समझा, वे धन्य हैं. हम आलोचना करें लेकिन हमें यह मानना ही होगा कि ग्रियर्सन और बुल्के ने तुलसीदास को ठीक से समझा. हिंदी के कुछ आलोचकों ने भी समझा . कुतर्क करने वाले को कौन रोक सकता है? राजनीति के चश्मे से महान रचनाकारों को नहीं देखा जाना चाहिए. ये हमारे ऐसे लेखक-कवि हैं जिनकी आभा कभी मलीन नहीं हो पायेगी.
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हमारे पास असंतुष्ट होने से कहीं अधिक संतुष्ट रहने के ठोस कारण हैं. इस डिजिटल युग ने अनेक गुमनाम और उपेक्षित लोगों को नवजीवन प्रदान किया है. आज नहीं तो कल हमारी रचनाएँ पढ़ी जायेंगी. हम बार-बार जीवन ग्रहण करेंगे. हमारे लेखन की अर्थवत्ता साबित होगी. इसलिए क्यों निराश हुआ जाए ? दूसरी बात यह कि बिना लिखे-पढ़े रह ही नहीं सकता. ऐसी आदत ही बन गयी है. लिखना किसी के लिए सामूहिक संवाद का जरिया है. प्रेमचंद लेखन को सही ही मजदूरी मानते थे. मेरा यह नियमित काम है जो मुझे अपरिमित खुशी प्रदान करता है. जैसे आज दो कविताएँ आ गयीं. एक कवि के लिए इससे इतर कोई शुभ दिन हो सकता है. आज अंचित(पटना) की एक शानदार कविता पढ़ी. जब तक स्वास्थ साथ दे यह कामना है कि इन नेत्रों की ज्योति बनी रहे ताकि पढ़ सकूं. ये अंगुलियाँ सही-सलामत रहें ताकि लिख सकूं. धूमिल मेरे प्रिय कवि ने आखिरी सांस लेने के पहले एक कविता बोलकर लिखवाई. यह होती है लेखक की प्रतिबद्धता. एक ईमानदार लेखक किसी वाद के प्रति नहीं, अपने लेखन के लिए प्रतिबद्ध होता है.
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लेखक की दुनिया
किसी लेखक की दुनिया स्वतः निर्मित हो जाती है. स्थिति उसके लिए सुखद या दुखद रहे वह अपनी दुनिया में रच-बसकर वह खुश रहता है. हाँ,वह यह जरूर चाहता है कि उसके सपनों का संसार जरूर बने-बसे. इसीलिए वह उन मुद्दों को बार-बार उठता है जिन पर ध्यान दिया जाना उसे अनिवार्य लगता है. उसकी प्राथमिकता में मनुष्य का होना स्वाभाविक है. सच्चे लेखक के यहाँ कोई दुराव-छिपाव नहीं है. यदि वह दुःख,पीड़ा और बेचैनी में है तो उन्हीं चीजों को लिखेगा. वह दूसरों का दुःख भी तो जीता है. दर्द ख़त्म हो जाने पर उसके मन में टीस बनी रहती है. लेखक यदि अपनी रचनाओं में अनावृत होता है तो उसकी बेचैनी समझे जाने योग्य है. यह केवल आत्मालाप नहीं है. लेखक का मनोजगत कोई मॉल नहीं है कि एक छत के नीचे सारी सामग्रियां मिल जाएं. वहाँ चकाचौंध की दुनिया नहीं है. वहां चमत्कार नहीं है. वहां मिट्टी की खुशबू और खुरदुरापन है. वहां सांत्वना के कुछ शब्द अवश्य हैं. लेखक थोड़ी देर के लिए धैर्य और सांत्वना जरूर प्रदान करेगा. लेखक किसी को संतुष्ट भले ही न करे पर निराश नहीं करेगा. जिस रचना से कोई पाठक बिलकुल खाली हाथ लौटे वह रचना हो ही नहीं सकती. मेरा लेखन एक अत्यंत छोटा विनम्र प्रयास है. इसे देखकर कोई भी आसानी से कह सकता है-पाव भर धनिया गोरखपुर दुकान. मैं इसमें क्या कर सकता हूँ. इस बात को एक उदाहरण से समझाने के लिए प्रयास करता हूँ. मेरे घर के सामने मुख्य सड़क पर एक बुजुर्ग दूकानदार तीन-चार दर्जन अंडे लेकर बैठता है . शाम में टहल कर आते हुए एक सज्जन ने पूछा-"आज कुछ बिका?" उसने कहा-"आज तो बोहनी तक नहीं हुई." माना कि उसके अंडे नहीं बिकते लेकिन वह अपना दुकान लगाना बंद नहीं करता. मेरा लेखन भी कुछ वैसा ही है. जैसे दुकान लगाना ही उसके लिए तसल्ली का कारण है, वैसे ही मेरे लिए लेखन भी है. मैं अपना समय और श्रम लगाता हूँ. मैं शब्दों की खेती करता हूँ. शब्द बीज हैं. इनसे शब्द उपजते हैं. ये मेरे लिए हीरे-मोती से कहीं अधिक मूल्यवान हैं. सोना उछलता है,चांदी टूटता है और शेयर लुढ़कता है. मुझे संतोष है कि शब्द नहीं फिसलते. इनका अर्थ बना रहता है. यह अर्थ बना रहे. इतना ही पर्याप्त है.
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ललन चतुर्वेदी
(मूल नाम-ललन कुमार चौबे)
वास्तविक जन्म तिथि : 10 मई, 1966
मुजफ्फरपुर(बिहार) के पश्चिमी इलाके में
नारायणी नदी के तट पर स्थित बैजलपुर ग्राम में
शिक्षा: एम.ए.(हिन्दी), बी एड.,विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की नेट जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण
प्रकाशित कृतियाँ : प्रश्नकाल का दौर , बुद्धिजीवी और गधे (दो व्यंग्य संकलन), ईश्वर की डायरी , यह देवताओं का सोने का समय है एवं आवाज घर (तीन कविता संग्रह) तथा साहित्य की स्तरीय पत्रिकाओं तथा प्रतिष्ठित वेब पोर्टलों पर कविताएं एवं व्यंग्य प्रकाशित।
संपर्क :
ललन चतुर्वेदी
202,असीमलता अपार्टमेंट
मानसरोवर एन्क्लेव,हटिया
रांची-834003
मोबाइल न. 9431582801
ईमेल: lalancsb@gmail.com
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