ममता शर्मा
माँ इन दिनों शहर में है।
‘किसकी माँ ?’
हाँ, ये प्रश्न अच्छा है!
‘किसकी माँ’
वह किसी की भी माँ हो सकती है। माँ तो सार्वजनीन है…वह तो हर जगह हर काल में और हर युग में है। उसका विस्तार धरा से नभ तक है; वह किसी की भी माँ हो सकती है। मुद्दा यह है कि माँ इन दिनों शहर में है। माँ मेरे ठीक सामने वाले घर में आई है; वैसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, माँ किसी भी घर में आ सकती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि माँ शहर में है, मुझे तो ऐसा लगता है कि माँ शहर में नहीं बल्कि सारा शहर माँ में है।
मैंने सुबह-सवेरे दरवाज़ा खोला तो सामने देखा कि माँ तंग-सी बालकनी में बैठी थी। उसने दोनों हाथों से सीख़चों को थाम रखा था। मैंने देखा उसकी नज़रें नीचे सड़क पर थीं। सड़क पर आवाजाही नहीं थी मगर माँ की नज़रें फिर भी सड़क पर थीं। मुझे लगा माँ ने इसे दिनचर्या का एक ज़रूरी हिस्सा बना लिया है; किसी राहगीर के आने और किसी वाहन के चले जाने को और फिर इसके बाद सड़क के मौन हो जाने को निहारना और फिर इन दोनों यानी आने और न आने के बीच आने का इंतज़ार करना! माँ ने दरअसल वह दौर पार कर लिया था जब सोच का वृत्त काफी बड़ा होता है और उसमे बहुत सारी ज़रूरी और गैरज़रूरी चीज़ें समा जाती हैं।
मुझे शेक्सपियर याद आते हैं--
All the world's a stage,
And all the men and women merely players;
They have their exits and their entrances,
And one man in his time plays many parts,
His acts being seven ages. At first, the infant,
Mewling and puking in the nurse's arms.
Then the whining schoolboy, with his satchel
And shining morning face, creeping like snail
Unwillingly to school. And then the lover,
Sighing like furnace, with a woeful ballad
Made to his mistress' eyebrow. Then a soldier,
Full of strange oaths and bearded like the pard,
Jealous in honor, sudden and quick in quarrel,
Seeking the bubble reputation
Even in the cannon's mouth. And then the justice,
In fair round belly with good capon lined,
With eyes severe and beard of formal cut,
Full of wise saws and modern instances;
And so he plays his part. The sixth age shifts
Into the lean and slippered pantaloon,
With spectacles on nose and pouch on side;
His youthful hose, well saved, a world too wide
For his shrunk shank, and his big manly voice,
Turning again toward childish treble, pipes
And whistles in his sound. Last scene of all,
That ends this strange eventful history,
Is second childishness and mere oblivion,
Sans teeth, sans eyes, sans taste, sans everything.
विश्व वाकई एक रंगमंच है!
मैंने एक दिन वहीं बालकनी में बैठी माँ को देखकर इशारे से पूछा... ‘कैसी हो माँ ?’
वह मुस्कुराई…मुझे लगा कि बहुत सारी माएं मुस्कुरा रही हैं। मुझे लगता है कि वह जब भी मुस्कुराती है तो बहुत से लोगों को ठीक वैसा ही लगता है जैसा मुझे उस वक़्त लगा जब मैंने माँ को मुस्कुराते हुए देखा और यह भी कि माँ का शहर में होना कितना सुकूनदायक हो सकता है।
फिर मेरा एक रूटीन बन गया, मैं रोज़ सुबह सामने का दरवाज़ा खोलने लग गया जो अमूमन बंद रहा करता था। ऐसा लगता था माँ भी मेरी ही तरह दरवाज़े की ‘चीं’ जैसी आवाज़ की अभ्यस्त हो गई थी। ज्यों ही दरवाज़ा खुलता मेरी और माँ की दृष्टि लगभग एकरेखीय होती। यह बात अलग थी कि रेलिंग की सीखचों के बेहद क़रीब होने की वजह से माँ को मुझे देखने के लिए अपना सिर आड़ा-तिरछा करना पड़ जाता। फिर वह एक सही एंगल पर आकर आँखों को स्थिर कर लिया करती। मैं दरवाज़ा खोलता और माँ के वे तमाम एक्शन अपनी आंखों के कैमरे में बाख़ूबी क़ैद कर लिया करता। माँ के चेहरे पर दरवाज़ा खुलते ही एक मुस्कराहट तैर जाती और उसका बायां हाथ उठकर माथे तक चला जाता। यह सब कुछ बड़े स्वाभाविक तरीके से होता और मुझे हमेशा लगता कि माँ मुझे आशीर्वाद दे रही है; या शायद मेरे और बल्कि कहें हम सबके अवचेतन में ‘माँ’ और ‘आशीर्वाद’ दो शब्द आपस में इस तरह गुंथे हुए थे कि मैं उनके एक्शन को आशीर्वाद से बड़ी आसानी से जोड़ लेता। जब मैंने अपने इस ख़याल पर थोड़ा ग़ौर किया तो मुझे लगा कि उनके उठे हुए हाथ को हमेशा आशीर्वाद ही क्यों समझ लिया जाना चाहिए इसे कोई ज़रूरत या फिर विद्रोह क्यों नहीं समझा जाना चाहिए! जैसे किंशुक की माँ के साथ हुआ। जब उन्होंने अगरबत्ती, पीतल की एक घंटी और भगवान की एक तस्वीर के लिए हाथ उठाया था, किंशुक की पड़ोसी अनन्या चौधरी के सामने। पहली बार उन्होंने जब हाथ उठाया था तो उनके हाथ को भी आशीर्वाद का पर्याय मान और जान लिया गया था। वे लगातार कई दिनों तक एक ही समय में एक ही तरीके से अपने हाथ ऊपर करती रही थीं। फिर अनन्या चौधरी को शक हुआ तो वे किंशुक के घर आकर माँ से मिलीं और तब जाकर यह खुलासा हुआ कि दरअसल जिसे अनन्या चौधरी ने आशीर्वाद समझ लिया, वह माँ की ज़रूरत थी। उन्होंने अपनी बात अनन्या के सामने खुलकर रखी थी कि उन्हें वे सारी चीज़ें चाहिए, भगवान की एक तस्वीर, एक अगरबत्ती और एक घंटी भी। मैंने एक चीज़ और ग़ौर की, वह ये कि माँ बालकनी में तीन वक़्त आया करती, सुबह, दोपहर और शाम। सुबह जब माँ आती तो उनके पास एक कप रखा होता, जिसमें ज़ाहिर है, चाय हुआ करती जब तक उनके कप में चाय होती, माँ के दोनों हाथ चाय के कप पर कसे होते; उस दौरान वे कभी इधर- उधर नहीं देख रही होतीं। वे चाय की आख़िरी बूँद तक उसे पीतीं क्योंकि जब तक कप पूरा उलट न जाता, वे उसे छोड़ती नहीं। उस दौरान वे सड़क की हर आहट को नज़रअंदाज़ कर दिया करतीं। माँ सुबह कोई दो-एक घंटे बालकनी में दिखाई देतीं और फिर अगले चार घंटे वे ग़ायब रहतीं। उन चार गुमनाम घटों के दौरान वे क्या करती होंगी, इस पर मैंने काफी उहापोह की। शायद वे नित्य कर्म से निवृत्त होती हों या शायद ‘कुछ न करती’ हों। क्योंकि मैंने पाया था कि जब से माँ शहर में आई थीं वे ‘कुछ न करने ‘ की अवस्था को जी रही थीं। ‘कुछ नहीं करने’ की अवस्था यानि जड़ता की अवस्था लेकिन ‘Inertia is also defined as the tendency of objects to keep moving in a straight line at constant velocity.’
बात दरअसल ये है कि जिसे हम जड़ता की अवस्था समझ रहे हैं, वह असल में ‘कुछ न करने’ जैसी अवस्था नहीं है; और इसी प्रकार जिसे हम बहुत कुछ करने की अवस्था समझ रहे होते हैं, वह कुछ नहीं करने की अवस्था भी हो सकती है। लेकिन लोक कहता था कि ‘माँ अब कुछ नहीं करती हैं’ बहरहाल न करने और करने दोनों ही अवस्थाओं में माँ मेरी विचार परिधि के अंदर ही होती और मैं भरा-भरा सा महसूस कर रहा होता। मुझे लगता कि सब ठीक-ठाक हो रहा है क्योंकि माँ मेरे इर्द-गिर्द है, ठीक वैसे ही जैसे बचपन में माँ का होना किसी सुरक्षा कवच की तरह हुआ करता, ठीक वैसे ही जैसे मैं नन्हा सा उसकी बृहद काया में समा जाता, जब वह अपनी बांहों का मेरे इर्द-गिर्द एक घेरा-सा बना दिया करती और मुझे लगता कि दुनिया बड़ी सुरक्षित सी कोई जगह है। माँ का शहर में होना मुझे अब भी वैसा ही अहसास दिलाता था, भले ही उसके बाहों के घेरे मेरे इर्द-गिर्द न थे और मेरी काया भी अब विस्तारित हो गई है और माँ की काया कतिपय संकुचित। लेकिन यह सब सिर्फ भौतिक स्तर पर ही हुआ है, मानसिक स्तर पर अब भी सब कुछ वैसा ही है। मुझे यह भी लगा कि मैं बेहद स्वार्थी हो रहा हूँ और उसी प्रकार और भी बहुत से लोग बेहद स्वार्थी हो रहे हैं कि वे माँ को शहर में पाकर खुद को समृद्ध बनाने की कोशिश में लगे हैं; वे सब देख पा रहे कि माँ का शहर में होना उन्हें समृद्ध कर रहा है मगर माँ पल- पल छीज रही हैं। मैंने ग़ौर किया कि माँ ज़यादा सहज और समृद्ध हुआ करतीं जब वे ज़मीन पर होतीं और जब वे पेड़ों के इर्द-गिर्द और पहाड़ों के पास और परिंदों के क़रीब होतीं। ऐसे समयों में मुझे लगता कि बालकनी की वे सीखचें जिन्हें उसने थाम रखा है और जो सहारे का अहसास दिला रही होती हैं, असल में उसे कारावास जैसा अहसास भी दिला सकती हैं। माँ जो हमेशा से आज़ाद बिचरने की अभ्यस्त हैं, हो न हो यहाँ ज़मीन की मोहताज़ हो जाया करती होंगी; या फिर माँ जो आकाश को नीला देखने की अभ्यस्त होंगी, यहां धुंए से भरे स्लेटी आकाश को देखकर कंफ्यूज हो जाया करती होंगी। एक दिन मैंने खुद को झिड़क भी दिया था कि ‘कभी कभार माँ की तरफ से भी सोच लिया करो’। और उस दिन मैंने माँ की देह के भीतर धड़कते दिल और दरकते अहसासों को ठीक वैसे ही आर-पार देखा था, जैसे पिछले बरस टूटी हुई हड्डी को देखने के लिए डॉक्टर असद ने एक्सरे शीट को ऊपर की तरफ किया था और मेरी देह के सत्य रोशनी में उजागर हो गए थे। माँ उस दिन मुझे हाड़-मांस का चलता हुआ एक इंसान लगी थीं, अन्यथा मैं उसे हमेशा ही कुछ अलग ज़मीन से थोड़ा ऊपर उठा हुआ, भगवान जैसा कुछ समझता आया था; या फिर भगवान से भी ऊपर कुछ ऐसा, जिसे छूआ जा सके, जिससे कुछ भी मांगा जा सके, जो निराकार न हो या फिर बुत की तरह कठोर भी न हो। मुझे लगा बड़ी शिद्दत से कि 'माँ के दूध का वास्ता' या 'माँ के दूध की बत्तीस धारायें जिसका मोल ना चुकाया जा सके' जैसे शब्दजाल के मोह से बाहर निकलना बेहद ज़रूरी है, माँ की वेदनाओं में रुमानियत की तलाश बंद की जानी चाहिए और यह भी कि हमें प्रसव पीड़ा पर कवितायें करना अब बंद कर देना चाहिए और इसे उपमा की तरह इस्तेमाल करना भी !
उस दिन मैंने बड़ी शिद्दत के साथ यह भी महसूस किया कि माँ हमेशा ज़मीन पर ही रहना चाहती हैं। मैंने देखा, जब कभी भी उसे ज़मीन से ऊपर उठाने की कोशिश की जाती या फिर कहें ज़मीन अलग करने की कोशिश की जाती, वे बेचैन हो जातीं, ठीक वैसे ही जैसे किसी बच्चे को जाइंट व्हील पर ये कहकर चढ़ा दिया जाए कि ऊपर चढ़कर आनंद आएगा, दुनिया पूरी और मुकम्मल नज़र आएगी और वहां जाकर उसे महसूस हो कि ऐसा कुछ भी नहीं! बल्कि जो है, वो ख़ौफ़नाक सा कुछ है।
लेकिन बावजूद इन सबके माँ का शहर में होना मेरे लिए बंधना है। मैं हर बार जब घर लौटता और चाबी को ताले में घुमाते हुए पीछे मुड़कर देखता और माँ अगर बालकनी में दिखाई दे जाती है, तो इत्मीनान हो जाता और न भी होती है तो उसके होने के अहसास से भर जाता क्योंकि मुझे पता होता है कि वह बालकनी में नहीं तो क्या वह कमरे के अंदर है ही, बस दिखाई नहीं दे रही। मुझे महसूस होता कि यह एक सर्वव्यापी अहसास है। और हर शहर के हर उस अकेले व्यक्ति के साथ लगा हुआ है, जो अपने घर का ताला खोल रहा है।
वह एक छुट्टी का दिन था; छुट्टी के दिन मैं शहर में तफ़रीह करता; ऊँची अट्टालिकाओं को सर उठा कर देखता ताकि ख़ुद के बौनेपन से हमेशा वाकिफ़ रह सकूँ; मॉल के एस्केलेटरों से बेवजह नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे जाता ; विंडो में लगी मैनिकिन की सुडौल देह पर मुग्ध होता और फिर ‘कुछ नहीं’ करता, वैसे ही जैसे माँ इन दिनों 'कुछ नहीं' कर रही थी। ऐसे छुट्टी के दिनों में मैं शाम को घर लौटना बिलकुल पसंद नहीं करता और देर रात किसी बड़े रेस्तरां में खाना खा कर लौटता। लेकिन उस दिन की बात कुछ अलग थी; माँ शहर में थी, तो मैं रात के पहले ही लौट आया। चाबी को ताले में घुमाते हुए मैंने पलट कर देखा तो माँ वहां नहीं थी ; मैंने कलाई पर बंधी घड़ी पर नज़र डाली, ज़्यादा वक़्त तो नहीं हुआ था, ये समय तो माँ के निश्चित बालकनी में होने का था। मैं चाबी को लगातार ताले में घुमाए जा रहा था, बिना यह जाने की उस घुमाए जाने का परिणाम क्या हो रहा है। बिना यह जाने कि ताला दरअसल खुल चुका था और दरवाज़ा भी; और भी बहुत कुछ था जो खुला हुआ था, जैसे दुकानें खुली हुई थीं, रेस्तरां खुले हुए थे लेकिन सब कुछ बेकार से लग रहे थे। खुली हुई चीज़ें बंद- बंद सी लग रही थीं। मैंने दरवाज़े को यूँ ही खुला छोड़ दिया और वापिस जाकर सामने वाले घर की कालबेल दबाई जहाँ माँ थी; कुल जमा चार बार कालबेल बजने के बाद खिड़की का पर्दा सरका...
‘वापस!!’ मैं बुदबुदाया झांकते हुए चेहरे ने मेरे सवाल को पकड़ लिया था शायद
‘अनंतपुर…’
‘तो क्या वे फिर कभी…’ मेरा एक हाथ कमर पर था और दूसरा ऊपर खिड़की की तरफ;खिड़की का पर्दा वापस गिर चुका था और मेरा सवाल हवा में टंगा हुआ था।
मैं मुड़ा ही था कि पर्दा फिर हटा… शायद सवाल ऊपर खिड़की तक पहुँच चुका था।
‘वे वहां रहना पसंद करती हैं।’ जवाब मिला और पर्दा वापस गिर गया।
मेरे पास ढेर सारे सवाल थे, वापस लौटकर खुले छोड़े गए दरवाज़े से मैं अंदर बरामदे में दाख़िल हुआ; उन तमाम प्रश्नों को मैंने वहां रखी मेज़ पर रख दिया और सामने वाली कुर्सी पर बैठकर उन उन्हें निहारने लगा।
ममता शर्मा
जन्म स्थान : नासिक, महाराष्ट्र
रचनाकर्म : हंस, कथादेश, वागर्थ, कथाक्रम, परिकथा, साहित्यअमृत, शब्दयोग, ककसाड़, जनपथ, स्त्रीकाल, मलयजब्लॉगस्पॉट, बया, अक्षरपर्व, हिंदी समय डॉट कॉम, अभिनव मीमांसा , हिंदी प्रतिलिपि, अंतरंग पत्रिका, किरण वार्ता, कलमकार वार्षिक पत्रिका, कथा समवेत, नया साहित्य पत्रिका, विभोम स्वर पत्रिका, लिटरेचरपॉइंट डॉट कॉम, काव्यांजलि ई पत्रिका, हस्ताक्षर वेब पत्रिका, पुरवाईडॉटकॉम, परिंदे पत्रिका, कृति बहुमत, आजकल, अन्विति, प्रश्नचिन्ह में कहानियाँ प्रकाशित।
तीन कथा संग्रह प्रकाशित
Present Address:
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Mansarovar Road No 2
Hatia Ranchi 834003
Jharkhand
Mob: 9430734424(Whatsapp Number)
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