जन्म नवादा (बिहार) के एक गांव मिलकी के एक संयुक्त परिवार में। पिता पाँच भाई। दादी जीवित। दादा का मेरे जन्म से बहुत पहले देहांत। पूरा परिवार खेती पर आधारित। भाइयों में मेरे पिता सबसे बड़े। तीसरे चाचा स्कूल इंस्पेक्टर। गांव से दूर के शहरों में उनकी नियुक्ति और तबादला। घर में उनका आर्थिक सहयोग न के बराबर। छोटे चाचा कुछ दिन तक कलाली में मैनेजर, फिर गांव के पोस्टऑफिस में पोस्टमास्टर। मैं अकेला भाई और मेरी एक बड़ी बहन। बहन सातवीं पास। 1970 में उसकी शादी, 1600 रुपये नगद तिलक देकर एक बड़े अमीर परिवार में।
घर में चाचाओं और चाचियों में खूब गाली-गलौज और उकटा-पुरान का माहौल। सबका निशाना अक्सर बाउजी, चूँकि घर के मालिक थे वे। पूरे हिसाब-किताब और सबकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ज़िम्मेदार। आमदनी से कई गुणा खर्च। बाउजी पर चौतरफा प्रहार। सीधे इतने कि कोई मुँह पर भी गाली दे दे मगर कोई प्रतिक्रिया नहीं। नाम लालेश्वर प्रसाद, लेकिन उनके सीधापन के कारण ‘लालाजी’ का उपनाम। मैं उनका दुलारा और इकलौता बेटा। मैं भी उनसे दुलार में शैतानी कर डालता, उन्हें जली-कटी कह डालता। उनमें ज़रा-सा भी कोई गुस्सा नहीं। याद नहीं पड़ता कि प्यार से भी कभी पीठ पर एकाध धौल जमाया हो।
हर बेटा के लिए उसका बाप आदर्श होता है, लेकिन वे तो पूरे गांव और सारे सगे-संबंधियों के लिए एक उदाहरण थे। सीधा-शरी़फ होने के साथ-साथ बेहद हुनरमंद। डेढ़-दो साल भागलपुर के सिल्क मिल में रहे और खुद से चादरें बुनीं। बाद में गांव आकर उन्होंने अपने घर में ही एक खटकल लगा ली। खुद की बुनी सिल्क की एक चादर इला़के में प्रसिद्ध डॉक्टर करीम को भेंट में दी। मुझे छमाही बुखार आता था और वे मुझे देखने आते तो हर मुला़कात में इसकी चर्चा करते। साइकिल के पुर्जे-पुर्जे की खराबी बाउजी स्वयं दूर करते। जहाँ जाते पंचर बनाने के सामान और हाथ से हवा भरने वाला पंप साथ रखते। जब कभी कच्चे रास्ते वाले 10 कोस पर स्थित मेरे ननिहाल यानी अपनी ससुराल कसमारा जाते, तो साइकिल जहाँ पंचर होती, वहीं बना लेते। साइकिल के चक्के का टाल तक खुद मार लेते, टूटा हुआ चेन जोड़ना हो या बियरिंग या फ्रीविल बदलना हो। उनके लिए कोई मुश्किल नहीं।
जब गांव-गांव में खादी भंडार और अमर चरखा का सरकारी अभियान चला, तो दीदी ने चरखा चलाने और सूत काटने की ट्रेनिंग ली। एक अमर चरखा मु़फ्त में मिला। घर में चरखा आया, तो दीदी की जगह बाउजी ही सूत काटते रहे। कटे हुए सूत जमा करने पर पैसे मिलते। उनकी कारीगरी की हद तो तब हो गई, जब खादी भंडार में रूई की गाँठ का बंधन लोहे का रद्दी-पत्तर लेकर उन्होंने चूहे फँसाने वाला दो फुट लंबा और 10 इंच चौड़ा एक विशाल पिंजरा बना डाला। विज्ञान की लीवर वाली पद्धति अपनाई, जिस पर चूहा पिंजरे के अंदर हुक से लटके पके हुए अमरूद या फिर रोटी के टुकड़े के लालच में लीवर पर चढ़ता और पिंजरे के नीचे उतर जाता। फिर लीवर अपने आप उठ जाता और दरवाजा बंद हो जाता। इसी तरह एक-एक कर अनगिनत चूहे फँस जाते। एक बार में बीस-बीस मुस्टंड चूहे एक साथ फँसने का रिकॉर्ड बना। पिंजरे को गांव भर में लोग माँग-माँगकर ले जाने लगे। आगे बाउजी ने एक तोते का भी बड़ा-सा पिंजरा बना डाला। जिसमें मैंने काफी दिनों तक एक तोता पाल कर रखा।
बाउजी मेरे जीवन की पहली पाठशाला थे। बहुत कम पढ़े-लिखे थे, लेकिन हिन्दी लिखते तो जैसे कशीदा काढ़कर रख देते। अप्रेंटिस में आ जाने पर उन्होंने ‘प्रिय बबुआ जयनंदन’ कहकर दर्ज़नों चिट्ठियाँ लिखीं। उर्दू पर भी वे बहुत अच्छी पकड़ रखते थे। पढ़ने के इतने शौकीन कि गांव के सुसंपन्न मुस्लिम लड़कों से उर्दू नॉवेल या फिर उर्दू पत्रिकाएं ‘मुजरिम’ या ‘शमां’ मांग कर लाते और देर रात तक लालटेन या ढिबरी की रोशनी में पढ़ते। माँ उन्हें खूब कोसती और कुढ़ती। वे अनसुना करके अपनी धुन में लगे रहते। मंझले चाचा भी उर्दू पढ़ लेते थे। मैंने अपने घर में रामायण और महाभारत उर्दू में ही पहली बार देखी।
बाउजी अपनी दिनचर्या में एक और काम बहुत लगन से करते। वे बीड़ी पीते थे और उसे खुद बनाते थे। बीड़ी बनाने की प्रक्रिया जटिल थी, लेकिन वे इसे बहुत आसानी से निपटा लेते। अपना होम टाउन गांव के उत्तर आठ मील पर वारिसलीगंज और दक्षिण सोलह मील पर नवादा जब जाते, तो बीड़ी के लिए केंदू के पत्ते और सुक्खा (तंबाकू) खरीद कर ले आते। पत्तों को पानी में फुलाते, फिर उन्हें टिन के एक नपने (साँचे) पर रख-रखकर कैंची से काटते। फिर कटे हुए पत्तों में निहित बीच की धारियों को तेज़ चाकू से छिलते। इनमें ‘सुखा’ भर-भरकर करीने से मोड़ते और पतले नीले धागे से बीच में बाँध देते। अंत में एक कीलनुमा टकुए से बीड़ी के ऊपरी और निचले सिरे को मोड़ देते। अब उन्हें एक बंडल बनाकर बोरसी या चूल्हे के मद्धम ताप में जाली पर रखकर देर तक सिंकाई करते। गांव के कुछ लोग उनकी बनाई बीड़ी पीने के लिए लालायित रहते। लेकिन बाउजी बीड़ी देने के मामले में बहुत कृपणता दिखाते। हाँ, उनकी गैरहाजिरी में माँ कभी-कभी बीड़ी बाँटने की उदारता दिखा देती। बाउजी को यह अच्छा नहीं लगता।
मेरी दादी भी चिलम पीती थीं। बाउजी उनके लिए गीला तम्बाकू (खैनी और छोवा से कूटा हुआ) ला देते। जब दादी का तम्बाकू खत्म हो जाता, तो बाउजी से वह बीड़ी माँग लेती। दादी बेटों में सबसे ज्यादा प्यार बाउजी को और घर के बच्चों में मुझे करती थी। घर की इतनी भीड़ में भी दादी निर्वासित और अकेली-सी रहती थी। अपने बगल में वे मुझे या नहीं तो मेरी दीदी को सुलाती थी। दादी जब एकदम अशक्त हो गई और एक खाट पर ही सिमट गई तो एकदम लावारिस जैसी स्थिति हो गई। माँ और बाउजी ही उसकी कुछ सेवा-टहल कर देते। जब दादी बहुत तकली़फ झेलकर मरी तो बेड सोलिंग से उसकी पीठ में अनगिनत कीड़े रेंग रहे थे। मैं मैट्रिक पास कर गया था। जब दादी को अर्थी पर डाला जाने लगा तो उनकी हालत देखकर मैं फूट-फूट कर रोया। संझले चाचा, जो स्कूल इंस्पेक्टर थे, ने मोकामा ले जाकर गंगा किनारे दाह-संस्कार करने का निर्णय किया। जीवित दादी तो नरक में रही, मरने पर तो उन्हें स्वर्ग मिल सके।
बाउजी ने घर में एक हारमोनियम रखा था। जब कभी उनका मन होता, खूब अच्छा गाकर बजा लेते। मैं भी कभी-कभी उस पर हाथ चला लिया करता था, हालाँकि कोशिश के बाद भी मुझे बजाना नहीं आया। वे ढोलक पर भी कुछ ताल बजा लेते थे। ढोलक घर में नहीं था। तो उन्होंने तय किया कि खुद ही ढोलक बनाएंगे। माँ और घरवाले कुढ़ते थे कि यह आदमी बेमतलब के काम में समय बर्बाद करता रहता है। वे किसी की कोई परवाह नहीं करते। गांव के मुस्लिम टोले में बकरी-बकरे अक्सर कटा करते थे। उन्होंने दो खाल खरीद ली और उन्हें ज़मीन पर फैलाकर तानते हुए उसके हर सिराओं पर कीले ठोक दीं। तेज़ उस्तरे से उनके रोएं हटाकर कई दिनों तक धूप में सूखने के लिए छोड़ दिया। जब खालें पूरी तरह सूख गईं तो ढोल का खोल, बँटी हुई रस्सी और लोहे की रिंग लाकर अच्छी तरह खोल के दोनों मुँह में लगा दिया। बाएं वाली गोल कटी खाल के बीच में उन्होंने तीसी के तेल में फुली हुई खल्ली लगाकर तीन दिन छोड़ दिया। जब उसकी सतह पर गाद चिपक गई, तो उसे विधिवत रस्सी और रिंग लगाकर तान दिया। ढोलक इतना अच्छा बना कि गांव में जहाँ भी कीर्तन-भजन होता, मंडली वाले माँगकर ले जाते।
वे घर के लिए खाट भी बहुत डिज़ाइन में बुन लेते थे। खाट, जिस सुतली से बुनी जाती थी, उसे अपने ही खेतों की उपजी सनई से वे डेरा नचाकर खुद ही कात भी लेते थे। सनई से सन निकालने की विधि बड़ी विचित्र थी। उसे पाँच-छह दिनों तक पानी में डुबोकर रखना पड़ता था, फिर उसके छोटे-छोटे बंडल बनाकर पानी में पीटा जाता था। उसके छिलके उतर जाते और सन बीच की सनाठी में लिपटा हुआ उभर आता। बाद में इसे धूप में सुखाकर सनाठी से अलग कर लिया जाता। फिर सन को अच्छी तरह सोह कर लकड़ी के बने डोरे से घुमा-घुमाकर सुतली बना ली जाती। मैं देखा करता था कि दालान में गपशप चलती रहती थी और कई लोग सन को काँख में दबाकर डोरे से सुतली कातते रहते थे। बाउजी की बनाई सुतली की मोटाई एकदम समरूप होती थी। सब लोग उनकी कारीगरी पर हसरत करते थे।
वे जब खेत पटाने के लिए कुएं पर लाठा जोड़ते, तो उसे चलाना बेहद आसान होता था। चूँकि आगे की पानी वाली कुंडी और पीछे का लेदा (भार) के संतुलन पर वे खूब ध्यान देते थे। उनका काम हो जाने के बाद दूसरे कई लोग उसी लाठा से काम कर लेने के लिए लाइन लगा देते। बाउजी जब आलू की क्यारियाँ बनाते तो उसकी लाइनें वे रस्सी खींचकर सीधी बनाते। माँ कुढ़ती, क्या ज़रूरत है इतना सीधा बनाने में टाइम खराब करने की, पेड़ के नीचे जो आलू बैठेगा, वो तो टेढ़ा नहीं हो जाएगा। लेकिन माँ को कौन समझाता कि उत्तमता (परफेक्शन) बाउजी की आदतों में शामिल थी।
घर के सामने एक सार्वजनिक चापाकल था। वह अक्सर खराब होता रहता। बाउजी ने उसे ठीक करना अपने दायित्व की सूची में शामिल कर लिया था। वह ज्यों ही खराब होता, काम-धाम छोड़कर वे स्लाइड रेंच, हथौड़ी, छेनी आदि लेकर भिड़ जाते। वे जानते थे कि पूरा मोहल्ला उसी चापाकल पर आश्रित है। खराब रहने से सब के सब परेशानी में घिरे रहेंगे।
जब परिवार संयुक्त था, तो घर का ओसारा पक्का किया जाने लगा। राजमिस्त्री के साथ कढ़नी, बसुल्ली और साहुल-सूता लेकर उन्होंने खुद ही एक छोर संभाल लिया। क्या मजाल कि उनके रहते ज़रा-सा भी कोई ईंट साहुल-सूता से ज़रा-सा भी बिदक जाए।
इतने-इतने हुनर में दक्ष थे बाउजी, लेकिन किसी भी एक हुनर को उन्होंने व्यावसायिक रूप नहीं दिया और ज़िंदगी भर फटेहाली और किल्लत में रहे। वे चाहते तो कहीं भी जाकर चिकनी कमाई कर लेते। उड़ीसा और बंगाल के कई शहरों को उन्होंने टटोल भी लिया था। लेकिन दादा जब गुज़र गए, तो बड़े भाई होने के नाते चार छोटे भाइयों के लिखाने-पढ़ाने और उनकी परवरिश की ज़िम्मेवारी उन्हीं पर आ पड़ी। उन्होंने इसे ब़खूबी निभाया भी। जो जितना पढ़ सकता था, पढ़ाया। लेकिन इस किए का कोई प्रतिफल न उन्होंने कभी चाहा, न उन्हें मिला। उल्टे भाइयों ने उन्हें हमेशा शक की निगाह से देखा। अनगिनत बार उनसे मार-पीट और गाली-गलौज की गई। बाउजी की ओर से कोई जवाब नहीं। माँ उनके पक्ष में मोर्चा संभालने की असफल कोशिश करतीं। चूँकि वे जान गई थीं कि बाउजी लाख उकसाने पर भी उनसे निपटने में कभी खुद को ओछा नहीं बना सकते, इसे भले ही वे उनकी दुर्बलता समझते हों।
जब सबकी जनानियाँ आ गईं, तो उनमें मतभेद खाई का रूप लेने लगा। एक-दूसरे पर दोषारोपण और खेतारी करने की घटनाएं तूल पकड़ने लगीं। आपस की कलह बढ़ते-बढ़ते एक-दूसरे के लिए सबमें गलीज घृणा समा गई, तो घर में बँटवारा हो गया। हरेक के हिस्से में दो-दो बीघा ज़मीन आई। ये ज़मीनें छोटे-छोटे टुकड़ों में दूर-दूर फैलीं थीं। इसलिए उपजाऊ और नहर सिंचित होकर भी बहुत लाभप्रद नहीं थीं। ऊपर से बाउजी शारीरिक रूप से हमेशा दुर्बल रहे, इसलिए वे कठिन श्रम करने की स्थिति में बिल्कुल नहीं थे। लेकिन आजीविका तो खेती की निर्भरता से ही चलनी थी। लिहाजा कम ही उम्र में मुझे उनका साथ देना पड़ा। उन्हें राहत देने के लिए और समय पर काम पूरा करने के लिए मैं लाठा चलाता, कुदाल चलाता, हल जोतता, बोझा ढोता, तब कहीं जाकर किसी तरह दो जून की रोटी चल पाती।
बाउजी भूत-प्रेत, ओझा-डायन, देवी-देवता, पूजा-पाखंड में ज़रा-सा भी विश्वास नहीं करते थे। जबकि अँधेरा होते ही घर से अकेले निकलने में मेरी कंपकंपी छूट जाती थी। बाउजी एकदम उल्टा थे। रात नौ बजता, तो लोटा लेकर वे शौच के लिए निकलते। एक बार हमारे घर के दरवाज़े के सामने गली में किसी ने ‘ओम-टोम’ कर दिया। मतलब बीच रास्ते पर सिंदूर, नींबू में गुंथा हुआ मिर्च, अच्छत, एक रुपये का सिक्का, जलता हुआ दीया, बेलपत्र और धतूरे का फल आदि रख दिया। कहते हैं, ऐसा करने वाले की तकली़फ उसे लग जाती है, जो इसे सबसे पहले लांघ देता है या उस पर अपना पैर रख देता है। जनानियाँ सब सहमी हुईं-सी ऐसा करनेवाली को कोस-कोस कर गाली दे रही थीं और सांसत में थीं कि इसे रास्ते से हटाया कैसे जाए। बाउजी ने वहाँ से सबको हटाया और बैठकर उस पर पेशाब कर दिया। माँ ने इसके लिए उन्हें बहुत जली-कटी सुनाई, लेकिन उन पर कोई असर नहीं।
गांव के पूर्व ज़मींदार रऊफ साहब का एक बहुत बड़ा आम का बाग नदी किनारे श्मशान के बगल में था। आम के एक से एक उन्नत किस्म के कलमी गाछ उसमें लगे थे। फल लगने के समय दिन में अगोरने वाला बराहिल वहाँ रहा करता था। रात में वहाँ कोई नहीं रहता था, ज़रूरत भी नहीं समझी जाती थी। चूँकि वह बाग बेहद डरावना और भूतैला माना जाता था। किसी की मजाल नहीं कि रात में वहाँ पैर रख दे। बाउजी अक्सर रात में वहाँ जाते और जितना वे ढो सकते थे, बोरा में भरकर मालदह आम ले आते। माँ उन्हें ऐसा करने से बहुत मना करती, लेकिन वे भला कब मानने वाले थे। वे कहा करते थे कि जिसके पास ज़रूरत से बहुत ज्यादा है, उससे ले लेने में कोई हर्ज नहीं है।
आस-पड़ोस में कभी-कभी औरतों पर भूत भरने की सूचना प्रसारित हो जाती। माँ और चाचियाँ उसे देखने के लिए दौड़ लगा देतीं। ओझा या तांत्रिक उससे सवाल-जवाब करके भगाने के प्रयत्न में लग जाता था। हाल में मरी हुई किसी औरत या मर्द का नाम लेकर वह कहती थी कि मैं फलां हूँ। ओझा पूछता कि यहाँ क्या लेने आए हो? वह कहती कि रास्ते में पड़ गई तो मैं आ गया या आ गई। या फिर किसी खुन्नस या बदले की बात करती थी। ओझा मंत्रसिद्ध पानी छिड़क कर उसे जाने के लिए या फिर कभी ना आने के लिए धमकाता। उसके हठ करने पर वह मार-पीट करने पर उतारू हो जाता। मैं अपनी माँ के कोर से लगा हुआ सारा स्वांग देखता और बुरी तरह भयाक्रांत हो जाता।
कुछ तेज़-तर्रार पासीन और मुसहरनी साल के किसी खास दिन मंदिर में जुटतीं। पूजा-पाठ का पूरा प्रबंध किया जाता। वे लाइन से बैठकर ध्यान लगातीं, फिर वह गर्दन हिलाने लगतीं। यह लक्षण होता उन पर देवी के सवार हो जाने का। औरतें उनसे अपना दुख बतातीं और उनके कारण तथा निवारण पूछतीं। बाउजी इन सारे उपक्रमों को एक ढकोसला और नौटंकी करार देते।
शायद उनका ही असर हुआ कि मैंने भी कभी पूजा-पाठ नहीं किया। मंदिर नहीं गया। गम्हरिया में अपना घर बनाया, लेकिन गृह प्रवेश में कोई आडम्बर को जगह नहीं दी। माँ का देहान्त हुआ तो उत्तरी लेने, दशकर्म या द्वादश करने का कोई ढोंग नहीं रचाया। मरने के तीसरे दिन भोज करा दिया कि लोग यह न कहें कि खर्च बचाने के लिए मैं ऐसा कर रहा हूँ। बेटी ने इतर जाति से प्रेम विवाह किया। मुझे कोई आपत्ति नहीं हुई। शादी के पारंपरिक विधि-विधान में मेरा कोई विश्वास नहीं था, लेकिन मेरे समधी-समधिन घोर परंपरावादी हैं। उनका मन रखने के लिए उनके अनुसार मुझे कुछ ढोंग करने पड़े। भूत-प्रेत को मैं अब ढूँढ़ता रहता हूँ कि कभी तो अकेले जाते हुए रात में मुझे मिल जाएं। कई लोग कहते हैं कि सुधा डेयरी के पास रात में अक्सर भूत टहलते रहते हैं। मैं कई बार अकेले स्कूटर से रात बारह बजे, डेढ़ बजे, तीन बजे गम्हरिया के घर लौटा, भूत ने कभी दर्शन नहीं दिया। साकची के कब्रिस्तान के पास भी कहते हैं, भूत टहला करता है, मैंने कई बार कोशिश की पर आज तक भेंट नहीं हुई।
बाउजी की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। कई बार वे बीमार पड़े, कई तरह की उन्हें व्याधि हुई, लेकिन कभी मैंने उन्हें डॉक्टर के पास जाते नहीं देखा। जबकि माँ को मैंने बचपन से लेकर उनके अंत समय तक भोजन से ज्यादा दवा की चिंता में निमग्न देखा। वे एक तरह से ड्रग एडिक्ट्स हो गईं थीं। डॉक्टर और दवाइयाँ अक्सर बदले जाते रहते, लेकिन उसका निरोग होना कभी संभव नहीं हुआ। बाउजी वैद्यनाथ या डाबर की दवा सूची पढ़-पढ़कर अपने लिए औषधि खुद ही चुन लेते। कुछ छोटे हल्के रोगों के लिए अंग्रेज़ी दवा के नाम कंठस्थ रखते थे।
उन्होंने जैसे छोटे भाइयों से अपने किए का कोई प्रतिफल नहीं लिया, वैसे ही मुझसे भी उन्होंने कुछ भी नहीं लिया। मैं सतरहवें साल में टाटा स्टील में ट्रेड अप्रेन्टिस में चुन लिया गया। ट्रेनिंग खत्म होने के बाद नौकरी भी तुरंत मिल गई। कई बार मैंने उनसे कहा कि यहाँ नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा है, जमशेदपुर आइए और अपना अच्छी तरह से इलाज करा लीजिए। लेकिन वे गांव के झंझटों से फुर्सत नहीं निकाल सके। माँ दो-तीन बार आई, लेकिन उसे भी यहाँ रहना रास न आया। अनपढ़ औरत, न टीवी देखना, न अ़खबार पढ़ना, न आस-पड़ोस की महिलाओं से बातचीत कर पाना। गांव में मजमा लगा रहता था अपने घर की देहरी पर। सास-बहू और देवर-भौजाई की कहानी चलती रहती थी। माँ उसमें पंच की भूमिका में रहा करती।
मैं एक सप्ताह पहले ही गांव से आया थी कि बाउजी का निधन हो गया। पता चला कि छाती में असह्य दर्द से वे कई दिनों तक नवादा के विभिन्न डॉक्टरों के पास चक्कर काटते रहे। अंतत: पटना ले जाते हुए रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया। अंत समय में दीदी ही उनके साथ रही। उन दिनों टेलीफोन और मोबाइल का ज़माना नहीं था। मुझे तार मिला, वह भी डाक विभाग की कृपा से तीन दिन बाद। तब तक उनका दाह-संस्कार हो चुका था और मेरे एक चचेरे भाई कृष्णदेव जी उत्तरी लेने का दायित्व वहन कर रहे थे। मतलब बाउजी ने अपने इकलौते बेटे के हाथ से मुँह में अग्नि तक न ली।
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लेखक परिचय
जन्म : 26 फरवरी, 1956 नवादा (बिहार) के मिलकी गांव में। शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी)। कृतियाँ : सात उपन्यास, बाईस कहानी संग्रह, तीन नाट्य संग्रह तथा तीन वैचारिक लेखों के संकलन। कुछ कहानियों का फ्रेंच, स्पैनिश, अंग्रेजी, जर्मन, तेलुगु, मलयालम, तमिल, गुजराती, उर्दू, नेपाली, मराठी, मगही आदि भाषाओं में अनुवाद।
2022 का श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य सम्मान।
संपर्क : फ्लैट नं. - 4322, बेगोनिया, विजया गार्डेन, बारीडीह, जमशेदपुर (झारखंड) - 831017
मोबाइल : 9431328758, 8709458751
अदभुत व्यक्तित्व वाले और हुनरमंद थे पिता जी। हर प्रकार के हस्तकार्यों में निपुण और आपकी ख़ूबसूरत लेखन को नमन और सैल्यूट है।
जवाब देंहटाएंपिताजी को और आपके लेखन को सैल्यूट और नमन है।
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