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बट माने लेकिन तो व्हाट माने क्या

रामनगीना मौर्य की कहानी



स दिन अखबार में जब यह खबर आई कि मोहनलाल की दूसरी पत्नी ने तलाक की नोटिस दी है, तो कौतूहलवश खबर को विस्तार से पढ़ने लगा। पूरी खबर पढ़ने पर पता चला कि पहली पत्नी के निधन के पश्चात् उसके एक अन्य महिला से विवाहेतर सम्बन्ध हो जाने के कारण उसने उससे दूसरी शादी कर ली थी, जिससे उसे दो बच्चे भी थे। कालान्तर में मोहनलाल की चारित्रिक-दोष सम्बन्धी आदतों से आजिज आकर उसकी दूसरी पत्नी ने तलाक की अर्जी दी थी। मोहनलाल भ्रष्ट प्रकृति का तो था ही, चरित्र का भी गिरा हुआ था, यह उसी दिन पता चला। अमूमन उम्र के साथ-साथ इंसान की यादें भी चलती रहती हैं। कुछ जेहन में उभरती, तो कुछ जेहन से उतरती रहती हैं। हमारी जिन्दगी में आये लोगों संग त्रासदी भरे, खट्टे-मीठे, सुखद, हर तरह के अनुभव होते हैं। मोहनलाल के भी कार्य, व्यवहार और आचरण से जुड़ी बहुत सारी खट्टी-मीठी दिलचस्प बातें-यादें हैं। कुछेक भूल भी रहा होऊंगा, लेकिन उससे जुडे़ इस खट्टे-कड़वे...लगभग बाइस-तेइस साल पुराने वाकये को अवश्य तफसील से साझा करना चाहूंगा।

        मुझे अच्छी तरह याद है कि मोहनलाल की पोस्टिंग जब हमारे यहां मुआवजा प्रकोष्ठ में हुई, तो उसने पहले दिन से ही वहाँ के प्रकोष्ठ प्रभारी रामआसरे जी को साध लिया था। कहते हैं न...नशा-पत्ती आदि का एक तलबी, दूसरे तलबी का साथी हो ही जाता है। बारोमास पैरों में लोकल-ब्राण्ड सैण्डिल पहनने वाले तुंदियल प्रकोष्ठ प्रभारी रामआसरे जी, जिनकी आंखों के नीचे छोटी-छोटी थैलियां सी लटकती थीं, को ऊपरी आय के साथ-साथ पान-तम्बाकू आदि खाने-चबाने की भी आदत थी। मोहनलाल भी इन्हीं आदतों, चीजों का शौकीन था। ऐसे में मोहनलाल, धीरे- धीरे मुआवजा प्रकोष्ठ के प्रभारी का पक्का मुंह लगा कार्मिक-कम-चेला हो गया।

        डील-डौल, पहनावे, ऊपरी व्यक्तित्व के नजरिये, मोहनलाल हद से ज्यादा शौकीन किस्म का छैला बाबू सरीखा, दरम्याना कद, गठीले बदन वाला गबरू नौजवान था। किसी फिल्मी हीरो के मानिन्द सिर के आगे के अपने बालों को पफदार तरीके बनाते, काढ़ता। तिरछी खत, लम्बे बाल रखता। अपने को थोड़ा हटकर दिखने की कोशिश में जाड़ा, गरमी या बरसात, कैसा भी मौसम हो, किसिम-किसिम के छींटदार कमीज और जीन्स की फेडेड पैण्ट ही पहनता। हां, जाड़ों में शर्ट के ऊपर रंग-बिरंगे जैकेट्स और  फूल-पत्तीदार टाई संग वेस्टकोट्स आदि जरूर अदल-बदलकर पहन लेता। दाहिनी कलाई में भरा-भरा कलावा, रक्षा-सूत्र। बांयी कलाई में गोल्डेन चेन, फ्रेम वाली घड़ी। दोनों हाथों की उंगलियों में विभिन्न रत्न-जड़ित सोने व चांदी की तीन-तीन अंगूठियां, तो गले में सोने की एक छोटी व दूसरी बड़ी चेन पहने रहता। कमीज का ऊपरी बटन भी अमूमन खुला ही रखता। हर वक्त मुंह में पान-मसाला दबाए, जहां-तहां दीवालों, कोनों-अंतरों में स्टाइलिश तरीके से पिचकारी मारते चलना उसका प्रिय शगल था। कानों में हर वक्त किसी सस्ते किस्म के इत्र से तर रूई के फाहे खोंसे रहता। कार्यालय से बाहर सड़क की ओर, जब कभी भी पान या गुटखा खाने-चबाने की तलब होने पर निकलता, तो आंखों पर चढ़ाये फैन्सी डिजायन वाले चश्मे को अपने माथे पर टिका लेता। क्रिकेट के एक प्रसिद्ध खिलाड़ी से मिलता-जुलता चेहरा होने के कारण वह उसका अकुंठ प्रशंसक था। गाहे-बगाहे...या फितरतन देश-दुनिया की खुराफाती खबरों पर चटखारे ले-लेकर बतियाने की वजह से सभी उसे चलता-फिरता अखबार भी कहते। लब्बोलुबाब...मोहनलाल कृत्रिम आभायुक्त व्यक्तित्व के से धज वाला, कुत्सित, अतिरंजित विचारों का व्यक्ति था।
          आगे किस्सा यूं है कि मुआवजा प्रकोष्ठ में मनोहर और शशांक की तैनाती को लगभग तीन साल हो गये थे। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि प्रकोष्ठ में अचानक मोहनलाल की तैनाती हुई। चूंकि मोहनलाल खुराफाती दिमाग था, सो मुआवजा प्रकोष्ठ में पोस्टिंग होते ही वह ऊपरी आय के जुगाड़ भिड़ाने के तिकड़म के साथ-साथ प्रकोष्ठ के महत्वपूर्ण कार्यों को भी हथियाने की कवायद में जुट गया। अपनी इसी रणनीति के तहत अगले कदम के रूप में जब उसने प्रकोष्ठ प्रभारी को कार्मिकों के मध्य कार्य-बंटवारा किये जाने का सुझाव दिया, तो प्रकोष्ठ के पूर्वस्थापित सारे समीकरण आदि बिगड़ने लगे। चूंकि प्रकोष्ठ के कार्यों का, कार्मिकों के मध्य बंटवारा करने का एकाधिकार प्रकोष्ठ प्रभारी का ही होता था। अतः ऐसे में रामआसरे जी की खुशामदी करते, उन्हें खिलाते-पिलाते, मोहनलाल ने धीरे-धीरे प्रकोष्ठ के लगभग सारे महत्वपूर्ण कार्य खुद को आवंटित करा लिये। मनोहर और शशांक के हिस्से में प्रकोष्ठ के लगभग कूड़ा कार्य ही आये।

        बताता चलूं...तत्समय विभाग में पदोन्नत कार्मिकों और भर्ती बोर्ड से सीधे चयनित होकर आये कार्मिकों के मध्य भयंकर गुटबाजी, खेमेबाजी थी। चूंकि रामआसरे जी और मोहनलाल, दोनों ही पदोन्नत प्राप्त विभागीय कार्मिक थे, अतः उनमें आपस में दांत काटी रोटी सदृश भाईचारा होना स्वाभाविक था। उल्लेखनीय है कि प्रकोष्ठ में ही कार्यरत, सीधी भर्ती बोर्ड के माध्यम से सेवा में आये मनोहर और शशांक, मोहन लाल से सीनियर थे, जबकि पूर्व से सेवारत मोहनलाल उनसे जूनियर था। इन्हीं सब कारणों से, भर्ती बोर्ड से सीधे चयनित होकर आये मनोहर और शशांक को वो पसन्द नहीं करता था।

        मोहनलाल मुंहफट, दुस्साहसी तो था ही, सहकर्मियों को भी जब-तब झिड़क देता। कभी-कभी तो वरिष्ठ सहकर्मियों संग भी अपमानजनक व्यवहार का दुस्साहस कर बैठता। उसके ऐसे ही बदमिजाज बरताव के कारण सहकर्मीगण एवं उच्चाधिकारीगण, कामकाजी अपरिहार्यता के अतिरिक्त उसे पसन्द नहीं करते। मोहनलाल की बदमिजाजी की जो वजह मनोहर और शशांक को समझ में आती, वो ये थी कि उसकी भर्ती मृतक-आश्रित कोटे में हुई थी। ज्ञातव्य हो कि मोहनलाल के पिता, इंदिरा गांधी जी की हत्या के बाद उपजे दंगों की भेंट चढ़ गये थे। मृतक-आश्रित कोटे से आसानी से नियुक्ति पा जाने और कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी एवं बेरोजगारी की विषम स्थितियों-परिस्थितियों का सामना न किये होने के कारण उसे ऐसा लगता था कि यह नौकरी उसके लिए ‘टेकेन फाॅर ग्राण्टेड’ न होकर, वही इसके लिए सर्वथा डिजर्व करता था।

        प्रकोष्ठ प्रभारी रामआसरे जी भी मोहनलाल की बातों में आकर मनोहर और शशांक को जब-तब मुश्किल में डालते रहते। बाजमौकों पर हुआ भी ऐसा। कभी, फाइल में उन दोनों की टिप्पणियों को बचकाना कहते, उनका मनोबल गिराने का प्रयास करते, तो कभी उच्च स्तर पर उनकी शिकायत कर देते। ऐसा लगता मानो मुआवजा प्रकोष्ठ में मोहनलाल की तैनाती होते ही मनोहर और शशांक का दुर्भाग्य शुरू हो गया। उनके मन-मस्तिष्क में हमेशा यह प्रश्न उमड़-घुमड़ होता रहता कि क्या वे इस लिजलिजे व्यक्तित्व वाले आततायी मोहनलाल को झेलने के लिए अभिशप्त हैं? फिर उत्तर की तलाश में उनके दिलो-दिमाग में विचार-मंथन चलता रहता।

        मुआवजा प्रकोष्ठ में असमान कार्य-आवंटन को लेकर मनोहर और शशांक ने प्रतिक्रियास्वरूप यद्यपि तत्समय असहमति जताई, लेकिन विरोध के धीमे स्वर में ही। कारण कि प्रकोष्ठ प्रभारी ही वार्षिक गोपनीय प्रविष्टि अंकित करता था। अतः भविष्य को देखते, अपने असंतोष से समझौता करते, तत्समय वे दोनों चुप्पी लगा गये। बल्कि उन दोनों ने तो अपनी देहभाषा से ऐसा दर्शाया मानो, नये कार्य-बंटवारे से उन्हें रत्ती भर भी दिक्कत नहीं है।

        नये कार्य बंटवारे पर रामआसरे जी की चिरौरी या विनती करने के बजाय मनोहर और शशांक ने इसे एक अवसर के रूप में मानते, उसे ज्यों-का-त्यों स्वीकर कर लिया। कम-अज-कम उन्होंने इसे मोहनलाल की काबिलियत ही माना। कारण कि आज का दौर हो या कोई और दौर, चापलूसी हमेशा ही एक विलक्षण कला रही है, जो सबके वश की बात नहीं होती। वैसे भी अपनी तारीफ सुनना किसे अच्छा नहीं लगता? फिर दुष्ट, कुत्सित विचारों वाले मोहनलाल के दिमाग में तो खुराफातें कूट-कूट कर भरी थीं। तिस पर उसके कमीनेपन की इंतेहा यह थी कि येन-केन-प्रकारेण वो मनोहर और शशांक के कार्यों में भी जब-तब अनेकानेक विध्न-बाधाएं पहुंचाता ही रहता। खतरा सूंघने की उसकी जबरदस्त और चमत्कारिक क्षमता से वे दोनों भली-भांति वाकिफ थे। इन्हीं सब वजहों और मोहनलाल और रामआसरे जी के दुर्व्यवहारों से त्रस्त मनोहर और शशांक ऐसी मुश्किल स्थितियों-परिस्थितियों का सम्यक् समाधान निकालने के लिए मन-कर्म-वचन, हरदम उचित अवसर की ताक में रहने लगे। सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं, की तर्ज पर उन्हें विश्वास था कि देर-सवेर हो सकती है, लेकिन कभी-न-कभी सफलता अवश्य मिलेगी।

         अब बदली हुई परिस्थितियों में मुआवजा प्रकोष्ठ में जब भी कोई नया क्लाइण्ट आता, उससे मोहनलाल ही सम्पर्क कर फाइनल डील करता। रामआसरे जी ने खासतौर यह जिम्मेदारी मोहनलाल को ही सौंप रखी थी। मोहनलाल कुछ ही महीनों के भीतर साइकिल के बजाय महंगी दुपहिया से दफ्तर आने-जाने लगा था। मोहनलाल, एक तरह से रामआसरे जी के लिए ऊपरी आय का विश्वस्त मध्यस्थ हो गया। रामआसरे जी की उम्र को देखते हुए या शायद चापलूसीवश, मोहनलाल गाहे- बगाहे उनके बच्चों के लिए छोटी - मोटी स्टेशनरीज एवं बीच - बीच में उनके लिए ईसबगोल की भूसी, दर्द निवारक मलहम, शक्तिवर्धक दवाएं और किसिम- किसिम के ब्रांड वाले च्यवनप्राश आदि भी लेकर आता रहता। देखा जाय तो मोहनलाल एक तरह से उनके लिए पीर -बावर्ची -भिश्ती- खर... सब कुछ था। वे दोनों अक्सर कैण्टीन में चाय-समोसा या सड़क उस पार पान-मसाला, चबाने-खाने साथ-साथ ही जाते थे।

         यहां यह बताना रह गया कि रामआसरे जी थोड़ा शंकालु, ईर्ष्यालु प्रवृत्ति के भी थे। शंकालु इस मायने में कि उन दिनों आज की तरह लगभग हर हाथ में मोबाइल फोन नहीं थे। प्रकोष्ठ में केवल एक लैण्डलाइन फोन था, जो प्रकोष्ठ प्रभारी की सीट पर लगा रहता। फोन पर आने वाली काॅल अमूमन प्रभारी ही अटैण्ड करते। यदि किसी अन्य की काॅल होती, तो उसे बुलाकर बात करा दिया जाता। गौरतलब है कि फोन पर जब भी कोई बात कर रहा होता, उतने समय रामआसरे जी के कान उनकी बातचीत पर ही लगे रहते। बात खत्म होने के बाद उनकी ताबड़तोड़ प्रश्न शृंखला...‘कौन था?...क्या कह रहे थे?...मेरे बारे में तो कुछ नहीं पूछ रहे थे?’...इत्यादि-इत्यादि। साथ ही ईर्ष्यालु इस मायने में कि प्रकोष्ठ में किसी का कोई परिचित रिश्तेदार या दोस्त आदि मिलने आ जाये तो भी ऐसी ही प्रश्न शृंखला...‘वो ब्राण्डेड पैण्ट-शर्ट वाला कौन था?...उसे पहले तो कभी नहीं देखा?...घड़ी तो बहुत महंगी पहन रखी थी, उसका नाम क्या था?...वो तुम्हें क्यों ढूंढ़ने आया था?’...आदि-आदि। अपनी इन्हीं सब आदतोंवश रामआसरे जी, मनोहर और शशांक को लेकर आशंकाग्रस्त भी रहते और महत्वपूर्ण कार्यों के मामले में सिर्फ मोहनलाल पर ही विश्वास करते थे। यह भी हो सकता है कि रिटायरमेंट की तिथि नजदीक होने और उनके पांचों बच्चों में से किसी के भी कामकाजी न होने, जीवन की तल्ख हकीकतों से बखूबी वाकिफ होने के कारण, मोहनलाल जैसे कर्मी का पक्ष लेना, उसे पालते-पोसते, उसके प्रति पजेसिव रहना रामआसरे जी की बाध्यता हो?

        मनोहर चूंकि, वर्तमान नौकरी के साथ-साथ दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी अपना भाग्य आजमा रहा था, अतः काम कम होने से मानो उसे मुंहमांगी मुराद मिल गई। लेकिन शशांक चैन से बैठने वालों में से नहीं था। मोहनलाल को सबक सिखाने की कोई-न-कोई योजना उसके दिमाग में चलती ही रहती। वो बस्स...उपयुक्त अवसर की तलाश में था।

       यहां इस बात का जिक्र करना प्रसंगानुकूल होगा कि मनोहर और शशांक को टंकण का ज्ञान नहीं था, जबकि मोहनलाल टंकण कार्य में माहिर था, जिसका गाहे-बगाहे उसे लाभ भी मिलता। वो पत्रावलियों में टाइप-नोट प्रस्तुत करता, जिससे उच्चाधिकारियों को उसका लिखा पठनीय होने के कारण निर्णय लेने में असुविधा नहीं होती थी, व उच्चाधिकारियों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता। इसके विपरीत मनोहर और शशांक की टिप्पणियां हस्तलिखित व संक्षिप्त होने, तो कहीं-कहीं अपठनीय भी हो जाने के कारण प्रायः उनकी पत्रावलियों में निर्णय लेने में उच्चाधिकारियों को असुविधा होती थी।

       परन्तु यहां यह बता देना भी समीचीन होगा कि मोहनलाल को विभागीय नियमों, मार्गदर्शी सिद्धान्तों आदि की पर्याप्त जानकारी न होने के कारण वह विभिन्न प्रकरणों के निस्तारण के लिए अक्सर मनोहर व शशांक या प्रकोष्ठ प्रभारी रामआसरे जी के परामर्श पर ही निर्भर रहता। इस तरह प्रकोष्ठ में कार्यरत लगभग सभी के कुछ कमजोर, तो कुछ मजबूत पक्ष थे। ऐसे में मोहनलाल कभी-कभी अज्ञानतावश या अतिउत्साह में नियमों, मार्गदर्शी सिद्धान्तों से सम्बन्धित किसी फाइल में जब अप्रासंगिक या अल्लम-गल्लम सी अनर्गल टिप्पणी कर बैठता, तो प्रकोष्ठ प्रभारी उसे डांटते तो थे ही, साथ ही ये जुमला भी उछाल देते...‘‘अमां! मोहनलाल, तुम आदमी हो या पाजामा...? तुम्हें तो ये भी नहीं मालूम कि बट माने लेकिन तो व्हाट माने क्या होगा?’’ प्रभारी महोदय के मुखारविन्द से निकला ये जुमला धीरे-धीरे कब उनका तकिया-कलाम बन गया, उन्हें खुद भी नहीं पता चला। हालांकि, रामआसरे जी की ऐसी तल्ख झिड़कियों पर मोहनलाल तिलमिला कर रह जाता। गौरतलब यह भी कि वो ये तकिया-कलाम मनोहर या शशांक के लिए कभी प्रयोग नहीं करते। कारण कि प्रकोष्ठ में ऐसी ढेरों चिट्ठियां आतीं, जो अंग्रेजी में होतीं। रामआसरे जी की अंग्रेजी इस हद तक कमजोर थी कि अंग्रेजी में लिखी सामान्य या विशिष्ट किसी भी तरह की चिट्ठी को, बिना पढ़े ही वो मनोहर या शशांक में से किसी एक के हवाले कर देते। यही कमजोरी मोहनलाल की भी थी। वह भी अंग्रेजी ज्ञान में फिसड्डी था। उसके द्वारा बाजवक्त अगड़म-बगड़म प्रयुक्त कुछ अंग्रेजी के वाक्यांशो, शब्दांशों की यादें तो जेहन में अभी भी ताजा हैं, यथाः ‘आइ यम नाॅट गो...सार्वजनिकली दिस इज अनबर्दाश्तेबुल...यू सोचिंग आइ सोचिंग आल सोचिंग...वेडन्सडे...चोलेस्ट्राॅल...बात-बात में यू कैन नाॅट रोक-टोक’...इत्यादि-इत्यादि।

       बहरहाल, कबीर वाणी...‘धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय/माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आये फल होय’...के मुरीद, देख दिनन के फेर की तर्ज पर, मनोहर और शशांक ने धैर्य बनाए रखा। उन्हें पता था कि बारह बरस में तो घूरे के दिन भी फिरते हैं, फिर वो तो इन्सान हैं। मनोहर का तो यहां तक मानना था कि जिस तरह पक्के निर्माण कार्य के दौरान वाइब्रेटर चलने से बीम, पिलर व छत की कंक्रीट ठीक से नीचे बैठ जाती हैं। ट्रेन या बस में कितनी भी भीड़ हो, उनके चलने और गति पकड़ने के साथ-साथ सभी यात्री भी देर-सवेर अपनी-अपनी जगह एडजस्ट हो जाते हैं। वैसे ही वक्त के साथ-साथ सब ठीक हो जायेगा। लेकिन शशांक इसके विपरीत सोचता था। ‘जांसोज की हालत को...जांसोज ही समझेगा...’ की तर्ज पर वह मनोहर की सोच संग उससे सहानुभूति रखते, मोहनलाल से तुरत-फुरत निबटने, उसे निबटाने की इच्छा रखता था। एक-दो बार तो लण्च-आवर में सड़क उस पार स्थित कैण्टीन में चाय पीते समय मोहनलाल और शशांक के बीच तल्ख बहस भी हो चुकी थी, लेकिन मनोहर के बीच-बचाव से मामला कहा-सुनी से हाथापाई की नौबत तक नहीं पहुंचने पाया था। परन्तु इन्सान के सोचने मात्र से ही तो सब कुछ नहीं हो जाता न!...तिस पर मनोहर उसकी हत्त्-तेरे की, धत्त्-तेरे की, जैसी किसी योजना में सहभागी भी नहीं होना चाहता था। फिर, ये बातें शशांक सबके साथ साझा भी तो नहीं कर सकता था।

        मनोहर से सहानुभूति रखने के क्रम में शशांक ने उससे एक दिन कहा भी...‘‘गांधी जी का मानना था कि ‘कोई चीज अगर अपनी जगह नहीं है, तो वह कूड़ा है।’ हमारी जगह ये नहीं है, हमारी जगह कहीं और कार्य करने की है, अन्यथा हम सिवाय कूड़ा-करकट के कुछ नहीं हैं। किसी का मुंह देखने के बजाय...हमें अपनी पोजीशन खुद के बलबूते हासिल करनी होगी, साथ ही हमें इस जुमले... बट माने लेकिन तो व्हाट माने क्या... के मायने इस रामआसरे को बताने होंगे कि...पूछने वाला पाजामा तो हम बताएं क्या?’’ वो तो अक्सर ही मनोहर को...‘जिन्दगी भीख में नहीं मिलती, जिन्दगी बढ़ कर छीनी जाती है...’ जैसे गीत गुनगुनाते, उसे ढाढस बंधाता रहता। जबकि इस प्रसंग से निष्प्रभावित भोले-भाले मनोहर को ऐसी किन्हीं भी कवायदों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वो तो सौंपे गये कार्य-दायित्वों को खामोशी से, निष्ठापूर्वक सम्पन्न करते, परिस्थितियों का सामना करते, सीनियर्स से सीखते रहने में यकीन रखता था। उसके मन में किसी के भी प्रति, किसी भी प्रकार के दुर्विचार नहीं थे। शायद इसीलिए उसे विभागीय और भर्ती बोर्ड से सीधे चयनित सभी सहकर्मीगण समान रूप से पसन्द करते थे। उसके हाव-भाव देखकर यही लगता, मानो ऊपर वाले ने उसे किसी खास उद्देश्य के लिए इस पावन धरा-धाम पर भेजा है। वह अपनी धुन में मगन रहने वाला, अपने इर्द-गिर्द घटने वाली घटनाओं से अमूमन अप्रभावित रहने वाला मनमौजी स्वभाव का था। किसी से भी वार्तालाप के समय भारतीय या पाश्चात्य दार्शनिकों के विचारों को धड़ल्ले से उद्धरित करते बातें करता। ऐसे समय उसका मनोबल, उत्साह देखते ही बनता। शशांक के विपरीत मनोहर ने इस घटना को उतनी तवज्जो भी नहीं दी थी। गैर महत्वपूर्ण कार्य मिलने से शशांक को हैरान-परेशान होते देखकर एक दिन तो मनोहर ने उससे कहा भी था...‘‘मेरे भाई, अगर काली मूंछों का स्वागत करते हो, तो बढ़ती उम्र के साथ-साथ खिचड़ी, फिर सफेद होती मूंछों का भी उसी शिद्दत से स्वागत करना चाहिए।’’

         खैर...रामआसरे जी अगले सात महीने बाद रिटायर होने वाले थे। ऐसे में मनोहर और शशांक ने सोचा कि...‘उनके बाद इस प्रकोष्ठ में जो नये प्रभारी आयेंगे, मोहनलाल कहीं उन्हें भी न साध ले, आइने में न उतार ले? अतः इस बार विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होगी...।’

         खरामां-खरामां सात महीने बीते। रामआसरे जी के रिटायरमेंट के बाद इस बार मुआवजा प्रकोष्ठ में प्रभारी के पद पर भर्ती बोर्ड से सीधे चयनित अधिकारी महेन्द्र प्रताप जी की पदस्थापना हुई। महेन्द्र प्रताप जी की मुआवजा प्रकोष्ठ में हुई पोस्टिंग, मनोहर और शशांक के लिए ऐसी थी, मानो मरूस्थल में हरियाली के लिए तरसते हुओं को कोई शाद्वल-दृश्य दिख जाये। मानो, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा हो। मनोहर और शशांक, जो इस काकतालीय-न्याय पर मन-ही-मन फूले नहीं समां रहे थे, के प्रति महेन्द्र प्रताप जी के मन में साॅफ्ट-काॅर्नर होना स्वाभाविक था। खबर सुनकर मोहनलाल की ऊपर की सांस ऊपर, नीचे की सांस नीचे हो जाना भी स्वाभाविक था। इस तरह मोहनलाल, जिसने पूर्व से ही काफी गंध मचा रखी थी, के दिन मुआवजा प्रकोष्ठ में लगभग पूरे होने को आ गये।

         फिलहाल...जहां चाह वहां राह। मनोहर और शशांक ने एक दिन मौका देखकर, प्रकोष्ठ में तैनात मोहनलाल के एकाधिकार एवं इससे उत्पन्न अपनी मूलभूत समस्या की ओर महेन्द्र प्रताप जी का ध्यान आकृष्ट करते, उनके समक्ष अपनी बातें, समस्याएं विस्तारपूर्वक रखीं। उन दोनों की बातें सुनकर हालांकि उन्होंने कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया, लेकिन ये जरूर कहा कि...‘‘मेरे अधीन किसी के भी साथ अन्याय नहीं होने पायेगा। तुम लोगों के हितों की अनदेखी नहीं होगी। लेकिन चूंकि मोहनलाल भी मेरा अधीनस्थ है, अतः उसके हितों का खयाल रखना भी मेरी ही जिम्मेदारी है।’’ महेन्द्र प्रताप जी, जो कि कम लेकिन स्पष्ट शब्दों में अपनी बात कहने के हिमायती थे, ने उन्हें अपनी ही शैली में यकीन दिलाते, ऐसे आश्वस्त किया मानो इस मसले पर दोहरी भूमिका निभाना उनकी बाध्यता हो। बहरहाल...बात आई-गई हो गई।

        यद्यपि मनोहर और शशांक, सेब और संतरे की तरह विपरीत स्वभाव के व्यक्तित्व वाले थे, लेकिन दोनों ही बड़ी प्रशासनिक सेवाओं में जाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों में लगे हुए थे, इसीलिए उन्होंने तत्काल इसे ज्यादा तूल नहीं दिया। परन्तु, मोहनलाल यदा-कदा जब अपनी काबिलियत का ढिंढोरा पीटते, अतिशयोक्तिपूर्ण बातें करते...‘‘सर! ये आजकल के फुलथरू, लबड़-धोंधों टाइप, लम्बतरानी बतियाने वाले लबार लौंडे क्या खाकर हमारी बराबरी करेंगे? जीवन में सिर्फ चन्द किताबों का ज्ञान ही काफी नहीं होता। आखिर...अनुभव भी कोई चीज है कि नहीं? वर्षों नाकों चने चबाने के बाद मैंने इस प्रकोष्ठ का काम सीखा है।’’ अक्सर पीठ पीछे महेन्द्र प्रताप जी से तंज कसते, किसिम - किसिम की काल्पनिक भाव- भंगिमाएं बनाते वह उन दोनों को चुनौती देता ही रहता। ऐसे में शशांक ने मोहनलाल को जल्दी ही कड़ा सबक सिखाने की ठान ली। मोहनलाल द्वारा अतिनाटकीय अंदाज में कुटिल मुस्कान के साथ जहर बुझी, कही गईं ऐसी अपमानजनक बातें सुनना शशांक के लिए नाकाबिलेबर्दाश्त थीं। वो उसे किसी-न-किसी जुगत मात देने, सबक सिखाने की हरचंद कोशिशों में रहने लगा। परन्तु समझ नहीं पा रहा था कि मोहनलाल को सबक सिखाने की योजना को कार्यरूप में कैसे परिणत किया जाय? ऑफ्टर-आल...मोहनलाल छुरे की नोक-सी पैनी नजर वाला अव्वल दर्जे का धूर्त और चालाक भी तो था। 

         इसी मध्य मुख्यालय से यह आदेश हुए कि कामकाज में टाइप की पुरानी मशीनों की जगह अब कम्प्यूटर का प्रयोग होगा। सभी प्रकोष्ठों में कम्प्यूटर पर ही टंकित टिप्पणियां व प्रस्ताव आदि प्रस्तुत किये जायेंगे। चूंकि मनोहर और शशांक दोनों ही टाइप नहीं जानते थे, ऐसे में शशांक ने अपनी तिकड़मी बुद्धि-विवेक का परिचय देते हुए, मौका देखकर महेन्द्र प्रताप जी के समक्ष अपनी व्यथा कहते, यह धड़ाम-धकेल आईडिया प्रस्तुत किया...‘‘हमें उम्मीद है, आप हमारी मदद अवश्य करेंगे सर। आप तो वैसे भी लाॅ-ग्रेजुएट हैं। न्याय-अन्याय को हमसे बेहतर तरीके समझ सकते हैं। सर! मोहनलाल जी टाइप जानते हैं, और हम दोनों टाइप नहीं जानते। अतः जब तक हम दोनों ठीक गति से टाइप का कार्य नहीं सीख लेते, तब तक मोहनलाल जी ही हमारी कुछ महत्वपूर्ण पत्रावलियों पर टंकित टिप्पणी प्रस्तुत कर दिया करें, बदले में विभागीय नियमों, मार्गदर्शी सिद्धान्तों आदि की जानकारी बीच-बीच में हम दोनों द्वारा उन्हें दी जाती रहेंगी। ये होगा...हर्रे लगे न फिटकारी, रंग चोखा ही चोखा। इस मध्य यदि आप चाहें तो, व्यापक कार्यहित में मोहनलाल जी के कुछ कार्य हम दोनों को भी आवंटित करने पर विचार कर सकते हैं।’’  शशांक ने गजब की कल्पना-शक्ति का प्रयोग करते हुए महेन्द्र प्रताप जी को प्रभावित करते, अपनी बात मनवाने का सफल प्रयास किया।

        शशांक के इन सद्वचनों और समझाने के तरीके का महेन्द्र प्रताप जी पर चमत्कारिक रूप से अभूतपूर्व असर हुआ और उनकी कार्य-योजना धरा पर उतर आई। यद्यपि उन्हें अपनी योजना की नाकामयाबी का भी डर था। अति-उत्साह या अधीरता के चलते योजना पर पानी भी फिर सकता था। तभी तो पर्याप्त सावधानी बरतते, अपने चेहरों पर उन्होंने किसी प्रकार का विजयी-भाव तक नहीं आने दिया था।

         खैर...प्रकोष्ठ में तत्काल नये सिरे से कार्मिकों के बीच कार्य-आवंटन हुआ। आखिर...पर्याप्त परिश्रम और सुनियोजित तरीके, शशांक और मनोहर ने इस फुल-प्रुफ स्कीम को सरंजाम जो दिया था। यद्यपि मनोहर और शशांक को इस बात का भली-भांति इल्म था कि उम्र के साथ-साथ उनके हस्तलेख संग टंकण गति में सुधार आ जायेगा। वे दोनों यह भी जानते थे कि पदोन्नति के उपरान्त पत्रावलियों में टंकित टिप्पणी प्रस्तुत करने की उनकी बाध्यता स्वतः खत्म हो जायेगी। तदन्तर यह काम उनके अधीनस्थों का होगा। बहरहाल... यूं फिरे दिन उनके। इस तरह एक परिपक्व व अनुप्रेरित कलाकार की तरह वे दोनों अपनी इस तिकड़मी योजना के क्रियान्वयन में सफल हो गये।

        ‘‘वो चिरकुट जबसे यहां आया था, तभी से हम दोनों का गुरू बनने की कोशिश में लगा था, जबकि उस बकलोल को यह मालूम नहीं कि गुणग्राहीजन की तरह हम खुद्दै अपने गुरू और अपने चेले भी हैं। सामने से देखो तो दाढ़ी वाले और उलट कर देखो तो पगड़ी वाले...सुप्रसिद्ध ‘गुरू-चेला’ की जोड़ी के मानिन्द...हें-हें-हें।’’ कैण्टीन से चटनी संग दो-दो ताजे गर्म समोसे दोने में लाकर मेज पर रखते, अपनी उंगलियां चाटते, मनोहर के सामने की सीट पर आकर बैठते, मुस्कियाते हुए शशांक ने यह जुमला उछाला।

        ‘‘पर...यार, हमेशा के विपरीत आज, मोहनलाल के बोझिल कदम, उसके चेहरे के हाव-भाव, आगे की ओर झुके कण्धे, अधखुले सूखे होठों पर चूने-कत्थे की पसरी पपड़ी,  ढीली बेल्ट, पतलून से बाहर निकली कमीज, लस्टम-पस्टम पहनावे में प्रकोष्ठ से अंदर-बाहर आते-जाते...उसके चेहरे पर वही बदहवासी, वही निरीहता दिख रही थी, जो जिबाह किये जाने हेतु ले जाये जाने वाले किसी जानवर की कातर निगाहों में दिखती है। उसकी हमेशा सीधी तनी गर्दन आज दोनों कण्धों के बीच धंसी हुई दिखी। बेचारा सुबह से ही बड़ा मायूस है। ऐसा लग रहा है कि वो पूरी तरह नंगा हो चुका है।’’ मनोहर ने मानो खुद को धिक्कारते, कन्फेशन के से मूड में, अपनी सीट के दोनों हत्थों को पकड़ते, चेहरे पर मुर्दा-सी मुस्कुराहट ओढ़ते हुए तनिक अन्यमनस्कता से कहा।

        ‘‘यार! ये हमारे अस्तित्व का भी सवाल है। अगर हम मोहनलाल रूपी च्यूंटी बराबर, छोटी सी चुनौती को सफलतापूर्वक नहीं संभाल सकते, तो आगे की बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं की हमारी तैयारी पर लानत है। ये तो तुम भी जानते होगे कि चुनौती जितनी  बड़ी होती है, उतनी ही दिलचस्प और परोक्ष रूप से बेहतरी के लिए ही होती है। ये तो कुछ भी नहीं प्यारे...। वैसे भी रामआसरे जी की निगेहबानी में अब तलक वह टाॅप गियर में चल रहा था। आज के हालात में उसके निचले गियर में शिफ्ट हो जाने पर स्पीड में थोड़ी-बहुत कमी का आ जाना तो स्वाभाविक भी है। सुना होगा...किस्मत के धनी की भी किस्मत बार-बार साथ नहीं देती। क्यूं भूलते हो कि ऐसी बातें, खबरें समय के साथ-साथ बासी हो जाती हैं। अगर आसमान या दीवार पर लिखी इबारत को, तजुर्बेदार और दूरदर्शी मोहनलाल समय रहते नहीं पढ़ सका, तो ऐसी हालत और हालात के लिए हम नहीं, वह स्वयं जिम्मेदार है। फिर, जो दंद-फंद, षडयंत्र आदि वो अब तक हमारे खिलाफ रचता रहा, उसके मद्देनजर तो अब सुलह-सफाई की गुंजायश भी नहीं रही। समय की चाबुक तो उस पर पड़नी ही थी। मैंने हाल ही में पढ़ा है कि...जो ज़माने के साथ नहीं चलते, वे चाहें तो ज़माने की नैतिकता-अनैतिकता पर ठलुआ-चिन्तन टाइप बहस करते, अपना बहुमूल्य समय खुशी-नाखुशी से व्यतीत कर सकते हैं। किसी भी प्रसंग या घटना को हम आधे भरे  गिलास के रूप में देखें या आधा खाली, यह पूरी तरह हमारे नजरिये, हमारी नीयत पर निर्भर करता है। फिर, यह तो मानव स्वभाव है...‘क्षणे रूष्टा क्षणे तुष्टा, रूष्टा-तुष्टा क्षणे-क्षणे’...बहरहाल...जो भी होता है, अच्छे के लिए होता है। यह हुनर, साधना, संयोग और बड़े सपने देखने का कमाल है। तूफान गुजर चुका है। वैसे भी तूफान से पहले की शान्ति हो या बाद की, हमें शान्ति का स्वागत करने, उसका लुत्फ उठाना आना ही चाहिए। ताकि आगे आने वाले कैसे भी तूफानों का धीरोद्धत नायक के बजाय धीरोदात्त नायक की भांति मन-कर्म-वचन से सामना किया जा सके। फिलहाल तो...तूफान के बाद की शान्ति का लुत्फ लो प्यारे। यह समय सोगवार का नहीं, बल्कि जश्न मनाने का है। दो-दो समोसे के साथ मलाई मार के...दो-दो ठो चाय पीने का है। समझे कि नहीं समझे?...हें-हें-हें।’’ कहते हुए शशांक बहुत उत्तेजित था। साथ ही उसके हाव-भाव से ऐसा लग रहा था मानो उसने खुद को भी सांत्वना देने का प्रयास किया हो।

         ‘‘यार, तुम तो आला दर्जे के काउंसलर हो सकते हो...हें-हें-हें।’’ अब मनोहर तनिक मजाहिया, हल्के मूड में आ गया था।

         ‘‘जर्रानवाजी के लिए शुक्रिया जनाब...हें-हें-हें।’’ चूंकि मनोहर, शशांक की  कार्य-आवंटन सम्बंधी योजना के सफल क्रियान्वयन से ज्यादा उत्साहित नहीं था। ऐसे में उसका उत्साहवर्धन करने के तईं, शशांक ने उसे अपनी ही स्टायल में समझाते, शीशे में उतारते, उसे ग्लानि-बोध से बाहर निकालने, विषयान्तर का पुरजोर प्रयास किया था।

         अब मोहनलाल दिन-भर चुप्पी साधे मनोहर और शशांक की फाइलों पर टिप्पणियां टंकित करता रहता और वे दोनों उससे, बोल-बोलकर टिप्पणियां टाइप करवाते रहते। उल्लेखनीय है कि टाइप में यदि कभी-कभार कोई गलती आदि हो जाती तो खींझते-झुंझलाते महेन्द्र प्रताप जी अपने सामने की मेज पर जोर से मुक्का मारते, आंखें तरेरते, मोहनलाल को ही पास बुलाकर तल्ख स्वर में डांटते...‘‘अमां! मोहनलाल, तुम ठीक से यह साधारण सी एक स्पेलिंग भी टाइप नहीं कर पाते?...‘सरकम्सटांसेज, सिग्निफिकेण्ट, एम्बुलेन्स, कमेटी, डिसीप्लीन, सिस्टमैटिक, क्लाॅसिफिकेशन, बजट’ आदि...तो रोजमर्रा में प्रयुक्त होने वाले सामान्य से शब्द हैं। हिन्दी पर भी तुम्हारी पकड़ अच्छी नहीं है। बड़ी ‘ई’ छोटी ‘इ’, बड़ा ‘ऊ’ छोटा ‘उ’ में तुम्हें कुछ फर्क ही नहीं पता? ‘आशीर्वाद’ की जगह ‘आर्शिवाद’ लिखे हो। ‘उपलब्ध’ की जगह ‘उपल्बध’ टाइप किये हो। पता नहीं तुम्हें किस महान आत्मा ने...धुप्पलबाजी में नौकरी दे दी? लगता है...तुमने इतने वर्षों से नौकरी नहीं की, सिर्फ घास छीली है। अमां! तुम आदमी हो या पाजामा? तुम तो आज तक यही नहीं जान पाए कि...बट माने लेकिन तो व्हाट माने क्या? देखो! एक ही पेज में कितनी सारी स्पेलिंग-मिस्टेक्स हैं?’’ कहते, बाजदफे वे पुराने प्रभारी रामआसरे जी का ही तकिया-कलाम उछाल देते।

         अब एक तरफ जहां महेन्द्र प्रताप जी के प्रति मनोहर और शशांक की भावना प्रशंसात्मक व कृतज्ञता भरी होती, वहीं दूसरी तरफ मोहनलाल मन-ही-मन उन तीनों से चिढ़ता, कुढ़ता...छत्तीस कोण के मुंह बनाता, बिचकाता चुपचाप टंकण कार्य करता रहता। यह उसके हाव-भाव से भी जब-तब परिलक्षित होता रहता। इस तरह देखा जाय तो  मोहनलाल पूरी तरह शशांक की अतिशयोक्तियों और मनोहर की न्यूनोक्तियों के मकड़जाल में चकरघिन्नी बनकर रह गया।

         विदित हो कि महेन्द्र प्रताप जी के शब्दरूपी पिटारे से इस तकिया-कलाम...‘अमां! तुम आदमी हो या पाजामा?’... 'बट माने लेकिन तो व्हाट माने क्या?' के साथ-साथ अन्य जुमले भी जब-तब निकलते रहते यथाः...‘लेकिन फिर भी...कोई खास बात नहीं...बस ऐसे ही...सब चलता है...एक्चुवॅली...दैट इज ह्वाइ...ह्वाॅट आय मीन टु से...मेरे खयाल से...मुझे तो ऐसा लगता है’...आदि-आदि।

         मनोहर कभी नहीं जान पाया कि मोहनलाल के बारे में पूर्व प्रकोष्ठ प्रभारी रामआसरे जी के तकिया-कलाम की जानकारी महेन्द्र प्रताप जी को कैसे और किस माध्यम हुई? वैसे, दोनों ही प्रकोष्ठ प्रभारियों द्वारा हस्बेमामूल सी की गई यह वक्रोक्तिपूर्ण टिप्पणियां...‘अमां! तुुम आदमी हो या पाजामा... बट माने लेकिन तो व्हाट माने क्या...?’ मोहनलाल पर माकूल बैठती थी या नहीं, ठीक-ठीक कह नहीं सकते।

        है न! दिलचस्प किरदार...यह मोहनलाल? अभी पढ़ी ‘मार्केज’ की कही बात याद आती है...‘‘एक अच्छे बुढ़ापे का रहस्य बस एकांत के साथ एक सम्मानजनक समझौता है।’’ परन्तु अखबार की यह खबर पढ़कर तो ऐसा लग रहा है कि रिटायरमेंट के बाद मोहनलाल अब बुढ़ौती में तलाक का मुकदमा झेलने को अभिशप्त है। पता नहीं, इस उम्र में ऐसी अप्रत्याशित स्थिति का सामना करने के लिए वह तैयार भी होगा या नहीं? देखिये न, बातों-बातों में वक्त का पता ही नहीं चला। अब आप सुधीजन इस घटनाक्रम में आये विवरणों के कुछ भी मनोनुकूल मायने निकालने...बट माने लेकिन तो व्हाट माने क्या...को डेसिफर आदि करने के लिए स्वतंत्र हैं। साथ ही इस अफसाने के लेखक को, मोहनलाल को छोड़कर मनोहर, शशांक, रामआसरे, महेन्द्र प्रताप या कोई अन्य मनमुआफिक स्वतंत्र किरदार भी समझ सकते हैं। खबर पढ़ते-पढ़ते बस यूं ही याद आ गया, तो आप सभी से यह प्रसंग साझा कर बैठा। अब मुझे इजाजत दीजिए।

   सम्पर्क                      
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लखनऊ - 226010, उत्तर प्रदेश,
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लेखक परिचय

रामनगीना मौर्य

रचनात्मक उपलब्धियां-   

1- प्रकाशन- साहित्य जगत की लगभग सभी लब्धप्रतिष्ठ पत्र-पत्रिकाओं में समय- समय पर कहानियां, कविताएं, व्यंग्य, समीक्षाएं व निबन्ध आदि रचनाएं प्रकाशित। 
कई साझा संकलनों में भी कहानियां, कविताएं, व्यंग्य आदि रचनाएं प्रकाशित। अब तक निम्न नौ कहानी संग्रह/ पुस्तकें प्रकाशितः- (1)-आखिरी गेंद, (2)-आप कैमरे की निगाह में हैं, (3)-साॅफ्ट काॅर्नर, (4)-यात्रीगण कृपया ध्यान दें, (5)-मन बोहेमियन, (6)-आगे से फटा जूता, (7)-रामनगीना मौर्य की 23 चयनित कहानियां, (8)-खूबसूरत मोड़, (9)-ठलुआ चिन्तन,
2- पुरस्कार व सम्मान-
(1)-राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान, उत्तर प्रदेश, द्वारा वर्ष 2016-17 में सतत साहित्य साधना के लिए ‘साहित्य गौरव सम्मान’। 2)- राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान, उत्तर प्रदेश, द्वारा हिन्दी भाषा गद्य की मौलिक कृति, कहानी संग्रह ‘‘आखिरी गेंद’’, वर्ष 2017-18 के लिए  ‘‘डाॅ0 विद्यानिवास मिश्र’’ पुरस्कार (रू. 1,00,000/-)। (3)- कहानी संग्रह, ‘‘आखिरी गेंद’’, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, द्वारा वर्ष- 2017 में रूपये 75 हजार के अन्तर्गत ‘‘यशपाल पुरस्कार’’ । (4)- अखिल हिन्दी साहित्य सभा (अहिसास), नासिक- महाराष्ट्र द्वारा ‘‘राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य सम्मान- 2019’’ के अन्तर्गत, कहानी संग्रह ‘‘आप कैमरे की निगाह में हैं’’ को ‘‘साहित्य शिरोमणि सम्मान’’ (रूपये, 5100/-)। (5)- साहित्य के क्षेत्र में समर्पण एवं उत्कृष्ट सेवा के लिए ‘साहित्य श्रेणी’ में प्रतिष्ठित ‘‘लोकमत सम्मान-2020’’ से सम्मानित। (6)- अदबी उड़ान 5 वें राष्ट्रीय पुरस्कार एवं सम्मान- 2020 के अन्तर्गत कहानी विधा में ‘अदबी उड़ान कहानी साहित्यकार सम्मान’ प्रशस्ति-पत्र। (7)- ‘‘गया प्रसाद खरे स्मृति साहित्य, कला एवं खेल संवर्द्धन मंच-भोपाल’’ द्वारा ‘‘शान्ति-गया सम्मान समारोह-2020’’ में कहानी संग्रह ‘‘साॅफ्ट काॅर्नर’’ के लिए ‘‘प्रो0 श्यामनारायण लाल स्मृति सम्मान’’ से अलंकृत। (8)- ‘‘मैत्रेय ग्लोबल फाउण्डेशन-अमेठी, उत्तर प्रदेश’’ द्वारा ‘‘इसराजी देवी साहित्य शिरोमणि सम्मान-2022’’ से अलंकृत। (9)- साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक उन्नयन हेतु अग्रणी संस्था ‘‘युगधारा फाउण्डेशन-लखनऊ, उत्तर प्रदेश’’ द्वारा दिनांक 08 मई, 2022 को ‘‘पं. प्रताप नारायण मिश्र सम्मान’’ (रूपये, 5100/-) से अलंकृत। (10)- ‘‘टाइम इंडिया न्यूज व आक्सीटी’’ के संयुक्त तत्वावधान में साहित्यिक क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिनांक 03 जुलाई 2022 को ‘‘भारत गौरव सम्मान- 2022’’ से अलंकृत। (11)-‘‘गुफ्तगू साहित्यिक संस्था, पब्लिकेशन एवं त्रैमासिक पत्रिका- प्रयागराज’’ द्वारा लेखनी से देश और समाज को सजग करने के लिए दिनांक 13 नवम्बर 2022 को ‘‘कैलाश गौतम सम्मान-2022’’ से सम्मानित। (12)- जयपुर साहित्य संगीति संस्था- जयपुर द्वारा सर्वोत्कृष्ट साहित्य कृति सम्मान ‘‘जयपुर सम्मान- 2024’’। (13)- कथारंग कहानी प्रतियोगिता- 2023, के अन्तर्गत ‘‘कथारंग सृजन सम्मान’’ के लिए कहानी चयनित।
सम्प्रति-   राजकीय सेवारत (उत्तर प्रदेश सचिवालय, लखनऊ में विशेष सचिव के पद पर कार्यरत।)


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