शशिकांत तिवारी
कन्नड़ लेखक ‘यू. आर. अनंतमूर्ति’ द्वारा लिखित विभिन्न साहित्यिक रचनाओं में सबसे ख्यातिलब्ध रचना ‘संस्कार’ का रचना वर्ष 1965 है तथा हिंदी में अनुवादित वर्ष 1977 है। संस्कार अपने समय के साहित्यिक जगत में बड़ी उथल-पुथल करने वाली रचना मानी जाती है। इस रचना की पूर्वपीठिका अनंतमूर्ति अपनी दसवीं कक्षा में लिखित एक कहानी को बताते हैं, जिसका कथानक है कि उनके स्वयं के गांव में आए प्लेग महामारी की अवस्था में कुछ भेदभावमूलक दृश्य उनके सामने से गुजरते हैं। उस प्रक्रिया ने उनके बाल मन को गहरा आघात दिया, जिस कारण वह उसे एक अमर कथानाक का रूप देते हैं ।
‘संस्कार’ का वास्तविक रूप में एक कहानी का विस्तार है ,जिसने कई कोनों के बिंदु को जोड़कर एक आकार प्राप्त किया है। तो एक प्रश्न यह भी है कि ‘संस्कार’ एक औपन्यासिक कृति है भी या नहीं? उपन्यास बहुआयामी तत्वों का एक अनौपचारिक गठजोड़ होता है जिसमें संस्कृति, भाषा तथा कालखंड जैसे प्रमुख तत्वों को समेटना होता है। हिंदी के प्रख्यात अनुवादक एवं आलोचक मदन सोनी ने ऑनलाइन वेबसाइट ‘हिंदी समय’ पर लिखे अपने लेख ‘हिंदी उपन्यास की अल्पता पर कुछ ऊहापोह’ में उपन्यास के संदर्भ में व्यापकता और भारतीयता की मांग करते हुए कहते हैं , कि “क्या हमारे पास साहित्य की कोई ऐसी विधा है जिसके माध्यम से हम ‘आधुनिक’ भारतीय मनुष्य की अवस्था को समूची जटिलता, संश्लिष्टि और रंगतों में सम्यक और मूर्त ढंग से अनुभव कर सकें जिसके माध्यम से हम ‘आधुनिक’ भारतीय मनुष्य की अस्तित्वपरक अवस्थिति का अपने और अपने से इतर सत्ताओं के साथ उसके रिश्तों का, उसकी जीवनदृष्टि और विश्वदृष्टि का पता पा सकें,ऐसी विधा जो इतिहास प्रकृति या स्वयं इस मनुष्य द्वारा निर्मित परिस्थितियों और आकस्मिक संयोगों के बीच जीवन के रणस्थल के ठीक बीचोबीच इस मनुष्य की सांसत या धर्म संकट का, उसकी दुविधाओं, अंतर्विरोधों और विरोधाभासों का संकेत दे सकती हो, जिसके भीतर हम इस मनुष्य के चेतन और अवचेतन मानस तथा उसके दुर्निवार सांसारिक आकर्षणों और नैतिक अन्तश्चेतना के बीच के द्वंद्वों का, उसके संकल्पों और कृत्यों के बीच की दूरी का, उसकी सामर्थ्य और लाचारियों का, उसकी अनंत संभावनाओं और विफलताओं का, उसकी सत्यनिष्ठा, प्रेम और करुणा का, उसके झूठ, घृणा और हिंसा का, उसकी न्यायप्रियता और उसके अन्याय का, उसकी अंकिंचनता और दंभ का जायजा ले सकें। ऐसी विधा जिसमें यह सब सूक्ष्म विवरणों से भरी एक ऐसी विश्वसनीय जीवन -लीला में चरितार्थ हो, जो सिर्फ हमारी तर्कबुद्धि को नहीं बल्कि उससे पहले हमारे ऐन्द्रिक संवेदनों को स्पर्श करती हो, ऐसी विधा जो इस सब के साथ इस मनुष्य की आत्मकल्पना की सामर्थ्य का परिचय भी देती हो। ये सारी अपेक्षाएं अपनी समग्रता में जिस विधा की ओर इशारा करती हैं, वह जाहिर है, उपन्यास है।”1.
उपर्युक्त विभिन्न औपन्यासिक आयामों पर 'संस्कार' खरा उतरता है। यह दुविधाओं और अंतर्विरोधों को समेटता हुआ, सत्यनिष्ठा और न्यायप्रियता के एक छोर से पाप और अनैतिकता के मरुस्थल तक की यात्रा को अपनी कोख में भरे हुए आगे बढ़ता है। इस प्रकार ‘संस्कार’ को हम उपन्यास की संज्ञा के प्रश्न से बढ़कर इसके अन्य पक्षों की समीक्षा की ओर आगे बढ़ते हैं।
उपन्यास की तह में उतरने से पहले ही मन में एक स्वाभाविक सा प्रश्न उठता है, इसके नाम को लेकर कि इसका नाम ‘संस्कार’ ही क्यों ? 'संस्कार' शब्द भारतीय समाज में गहरे तक पैठ बनाए हुए है। इसे दो परिप्रेक्ष्यों में लिया जाता है, पहला, समाज में पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों के प्रति ‘प्रवृत्तिगत निष्ठा’ को मापने के एक सफल औजार के रूप में। दूसरा, ‘वेद और स्मृतियों’ में व्यक्ति के जीवन की शुरुआत से मृत्यु तक सोलह संस्कार की विधियाँ वर्णित हैं, उस परिप्रेक्ष्य में। संस्कार उपन्यास व्यक्तिगत और सामाजिक विधियों के प्रति प्रतिबद्ध होने का मिला-जुला रूप है। वेदों में वर्णित विधियों के माध्यम से नारणप्पा का अंतिम संस्कार करने को अग्रहार के आचार्य प्राणेशाचर्य उसी विधि से प्रेरित होकर कहते हैं “ धर्मशास्त्र के कथनानुसार ही काम होगा, इसका मैं निश्चय कर चुका हूँ।” 2.
दूसरी ओर प्राणेशाचार्य के व्यक्तिगत मूल्य उन्हें एक ऐसे ऊहापोह में डाल देते हैं, जिससे व्यथित होकर वे जीवन के इस संकट से पलायन का मार्ग चुनते हैं, “ एक बार ईश्वर से नाता तोड़ लेने के बाद पुराने सब ऋणों से - गुरु-ऋण, पितृ-ऋण, देव-ऋण इन सबसे अपने को मुक्त मान लेना चाहिए तथा सब सामाजिक बंधन काटकर रहना चाहिए। इसीलिए यह निर्णय ठीक और उचित है कि जिधर पाँव ले चले, चलते रहना चाहिए। इस पथहीन वन में इसी तरह आगे बढ़ना चाहिए।” 3. पृष्ठ 106
इस तरह उपन्यास का नामकरण ‘संस्कार’ सामाजिक-सांस्कृतिक और व्यक्तिगत मूल्य के सम्मिश्रण से हुआ, जिसके पीछे एक गहरी योजना प्रतीत होती है, जो कि सफल कही जा सकती है। ‘संस्कार’ जैसी रचना अपने नामकरण में जिस यथार्थ का बोध कराती है तथा नैतिकता जैसे प्रश्नों का जैसा असरदार द्वंद्व खड़ा करती है, अपने राजनीतिक परिप्रेक्ष्यों को समेटने में उससे तनिक भी कम नहीं आंकी जा सकती है।
उपन्यास गांधी के गांधीवाद का उसी प्रकार शल्य परीक्षण करता है, जिस प्रकार यशपाल जी ने अपनी किताब ‘गांधीवाद की शव परीक्षा’ में किया है, वह इस पुस्तक में तीखे लहज़े में कहते हैं कि -”गांधीवाद का मार्ग त्याग का है। वह शक्तिहीनता से शांति, आसमर्थ्य से संतोष और अभाव से समता लाना चाहता है। संसार से विमुख होकर वह संसार में जीवन बिताना चाहता है ।” 4. पृष्ठ 14 (विप्लव कार्यालय, लखनऊ)
यशपाल को गांधीवाद में भारत का राजनैतिक भविष्य ख़तरे में दिखाई देता है वह इसे अनावश्यक अनिवार्यता समझते हैं, इसी प्रकार ‘संस्कार’ के प्राणेशाचार्य जो परंपराओं और धर्म के अनुपालन में मर्यादा का सदैव ख्याल रखने वाले हैं, वह गांधी की वैचारिकी से तैयार मनुष्य की तरह दिखते हैं, जिसमें त्याग और आत्मसंयम से मर्यादा की उच्चता तक पहुँचने का प्रयास है, वे बार-बार काशी में विद्याध्ययन से प्राप्त अनुशासन तथा सनातन में गहरी प्रतिबद्धता के कारण सभी विकट परिस्थितियों में उसी ओर को समाधान की खोज में लौटते हैं, जहाँ गहरी आस्था है, कि सब कुछ यहीं से मिलेगा, इस प्रकार गांधी जी को ‘गीता माता’ में पूर्णता का आभास और अहिंसा में विजय घोष का स्वर सुनाई देता था, ठीक उसी प्रकार प्राणेशाचार्य को ‘धर्म’ में पूर्णता का आभास होता था।
“काश! कि इसका असमंजस की स्थिति में ईश्वर उन्हें समझने की शक्ति दे। एकाएक प्राणेशाचार्य को लगा कि जैसे उन्हें कहीं से कोई अव्यक्त संकेत मिला है; उनके मन में एक विचार कौंधा और वे रोमांचित हो उठे। अगले दिन बहुत प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर उन्हें हनुमान जी के मंदिर में जाना चाहिए और पूछना चाहिए की हे वायु पुत्र ! संशय की स्थिति में क्या करना उचित है ?”5. पृष्ठ 58
इस प्रकार प्राणेशाचार्य का धर्म और कर्मकांड की ओर विचलन की उस स्थिति में बार-बार लौटना गांधीवाद का स्पष्ट प्रभाव कहा जा सकता है, लेखक का स्वयं का नज़रिया वैचारिकी के उस खेमे से ताल्लुक रखता है, जिसमें गांधी के आत्मसंयम और त्याग से महान बनने की उस प्रक्रिया को हमेशा कठघरे मे खडा किया जाता रहा है?
'संस्कार' उपन्यास में नैतिकता के दो फांक हैं, धार्मिक नैतिकता और मानवीय, सहज या सामाजिक नैतिकता। उपन्यास का प्रश्न भी मुख्यतः यही है कि क्या नैतिकता बिना धर्म के संभव है? या फिर क्या धार्मिक होकर ही नैतिक हुआ जा सकता है? इन प्रश्नों का उत्तर तलाशने की प्रक्रिया में उपन्यास में नायक के निर्धारण का भी कठिन प्रतिप्रश्न उठता है जिसके उत्तर में प्राणेशाचार्य और नारणप्पा के जीवन के अंतर्विरोध और समानताएं एक बाधक तत्त्व हैं, जिस कारण बारीक से बारीक निगाह भी नायक तय करने में असफल होती है और द्वंद्व में छूट जाती है और कहीं न कहीं उपन्यास में पाठक की अपनी वैचारिकी ही नायकत्व के निर्धारण में केंद्रीय भूमिका में आ जाती है, यह लेखक की चातुर्यपूर्ण और स्वाभाविक जीत है। इस तरह पाठक रचना को समझने का द्वंद्व झेलते हुए निर्णय की प्रक्रिया में सार्थक रूप से भागीदार बन जाता है।
अब बात नैतिकता के पक्षों की - नैतिकता की नींव धर्म में है या धर्म के बिना भी नैतिकता संभव है? इस प्रश्न पर भारतीय और पश्चिमी दोनों दर्शनों में बहुत उच्च कोटि के बहस - मुबाहिसे दर्ज हैं, जैसे पश्चिम विचारकों में नीत्शे और दोस्तोवस्की ने इस विषय पर विस्तार से विचार किया है और भारतीय दर्शन में नैतिकता धर्म से जुड़ी हुई है किन्तु ईश्वर केंद्रित न होकर आत्मकेंद्रित है और नैतिकता का यह पक्ष गीता में 'स्वधर्म' और 'निष्काम कर्म योग' है, वहीं जैन और बौद्ध धर्म में करुणा, अहिंसा और आत्मसंयम के रूप में उपस्थित है।
पश्चिम में नीत्शे के अनुसार सच्ची नैतिकता समाज द्वारा थोपी हुई नहीं है बल्कि व्यक्ति के भीतर के अनुभव से अर्जित की गई है। नैतिकता के सब पक्ष उपन्यास में प्राणेशाचार्य के भीतर उधेड़बुन के रूप में तब दिखते हैं जब वह नारणप्पा की वैश्या पत्नी चंद्री के साथ संसर्ग करते हैं और तत्पश्चात आत्मग्लानि और मलीनता से पीड़ित होते हैं और अपनी रूग्णा पत्नी भागीरथी को देखते हुए भीतर से शंकाकुल होकर अपने गृहस्थ जीवन के पच्चीस वर्षों के संपूर्ण क्रियाकलाप पर विचार करते हैं - “निर्जीव समान बिस्तर पर पड़ी एक दीन भिक्षुणी सी बनी पत्नी की रक्षा के लिए ही क्या उन्होंने इस कर्तव्य, इस धर्म को अब तक कस के पकड़ कर रखा था या कि पूर्व जन्म के कर्म और संस्कारों की वजह से धर्म ही उंगली पकड़कर इस मार्ग पर चलता आया है?” 6. पृष्ठ -88
प्राणेशाचार्य समाज के 'एक पत्नी' जैसे मूल्य के पैमाने पर अनैतिक हो जाते हैं, जहाँ यह प्रतीत होता है कि धर्म नैतिकता का साधक है भी और नहीं भी। कदाचित लगता है कि यह नैतिकता करुणा, विवेक तथा समाज के बोध से आती है चूंकि प्राणेशाचार्य जिस व्यक्तित्व से समाज में समादृत हैं और जिन नियमों के समानांतर चल रहे थे, वहाँ नैतिकता की सामाजिक व्याख्या से इस प्रकार विचलन धर्म की या धार्मिक होने की विभिन्न व्याख्याओं को कठघरे में खड़ा करती है जिसमें लेखक की व्यक्तिगत प्रतिबद्धता भी झलकती है।
उपन्यास जिस तरीके से वैचारिकी में पाठक वर्ग के सामने प्रस्तुत होता है, उसी प्रकार व्यवस्था पर हुए कटाक्ष में भी तीव्रता और गहराई से सीधे दिलो दिमाग पर असर करने में सफल होता है।
समाज में अनाथ बच्चों की स्थिति खराब होना एक कटु सत्य है, किंतु बच्चों में बच्ची (लड़की) होना एक अभिशाप है, हमने अपने आस-पास देखा है, खासकर जो ग्रामीण पृष्ठभूमि से वास्ता रखते हैं। कि किस प्रकार बाल विधवा या अनाथ बच्चे समाज के ढांचे में फिट न होने पर दुर्दशा का शिकार होते हैं। लक्ष्मीदेवम्मा ऐसी ही महिला है जिन पर बहुत कम ध्यान गया है- "उसके पिता की मृत्यु पर गरुड़ाचार्य के हाथ में जायदाद की कुल देखभाल आ गई थी। गरुड़ाचार्य की पत्नी बड़ी कंजूस थी, कभी किसी को खाने के लिए पेट भर भोजन नहीं देती थी। लक्ष्मीदेव अम्मा और उसके बीच अक्सर झगड़ा हुआ करता था और कभी-कभी हाथापाई तक की नौबत पहुँच जाती, फिर पति-पत्नी दोनों ने लक्ष्मीदेवम्मा को निकाल बाहर कर दिया और उसे पति के पुराने टूटे-फूटे वीरान घर में धकेल दिया।”7.
इस प्रकार का चरित्र समाज के यथार्थ को उधेड़ कर रख देता है जिसमें स्वार्थ और लालच की हद न होने के कारण किसी के जीवन के रास्ते ही बंद कर देता है। ऐसे चरित्रों का होना ही समाज की संवेदनहीनता को दर्शाता है।एक क्षण के लिए इस चरित्र की अनिवार्यता पर प्रश्न उठता है किंतु अग्रहरों के बीच इनकी उपस्थिति एक गहरा व्यंग्य है जहां नारणप्पा की लाश पर इतने विचार कि क्या नैतिक क्या अनैतिक, वहाँ एक स्त्री का सब कुछ लुटकर जिंदा लाश बन जाने पर कोई विचार ही नहीं कर रहा?
उपन्यास जैसे-जैसे आगे बढ़ता है समाजविज्ञानियों के लिए एक प्रश्न वहाँ जरूर उठाता है, जहाँ पद्मावती का परिचय होता है--" पुट्ट ने ऊंची आवाज़ में पुकारा- पद्मावती! प्राणेशाचार्य को जो वहाँ बिछी एक चटाई पर बैठ गए थे, एक नारी के मधुर कंठ का उत्तर सुनाई दिया -आई !
आवाज में एक स्निग्ध आकर्षण था।”8.
क्या चंद्री और पद्मावती का होना समाज की वैवाहिक संस्थाओं के स्वस्थ और अहर्निश चलने की जो प्रक्रिया है, उसका यह एक अनिवार्य अंग कहा जा सकता है?
सामाजिकता में जो एक उथलापन अर्थात दोष उपस्थित होने पर भी मौन होने का जो भाव है, 'संस्कार' उपन्यास उस पर गहरा कटाक्ष करता है। जैसे नारणप्पा के संस्कार पर व्यथित अग्रहार तथाकथित निम्न जाति की 'बेल्ली' के गांव में हो रही मौतों पर चुप्पी साधे रखता है। यह चेतना शून्यता समाज को एक पतन की ओर ले जाती है। इस पतन को भांप लेने पर किंतु उसे रोक न पाने की जो व्यग्रता होती है, वह व्यग्रता अनंतमूर्ति में दिखाई पड़ती है जिसका सार्थक परिणाम 'संस्कार' जैसी रचना है।
अनंतमूर्ति अपनी एक और प्रसिद्ध पुस्तक- ' किस प्रकार की है यह भारतीयता' की भूमिका में कहते हैं- "मैं अपने आभ्यंतर का आलोचक हूँ, अपनी संस्कृति को अपनी दृष्टि से देखना, अनुमान करना हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हमारी परंपरा का विकास इसी कारण हुआ है। वेद की परंपरा आई, बुद्ध ने इस पर प्रश्न किया। मैं भी उसी परंपरा का हूँ, साहित्य का हूँ, साहित्य में भी बसवण्णा, कनक दास, कुमार व्यास, नवोदय लेखक, नव्य लेखकों की परंपरा का। कालानुक्रम में इसी साहित्यिक परंपरा से प्रश्न करते, धक्का देते हुए, उसका विकास करते हुए हम आए हैं ।" 9.
इसी परंपरा के निर्वाह की भारतीय संस्कृति को आवश्यकता है, जहाँ संवाद नए तत्वों के जन्म की पूर्ण स्वतंत्रता देता हो और 'संस्कार ' ऐसा ही एक सार्थक संवाद है जिसमें पंरपरा बनाम आधुनिकता तथा आदर्श बना यथार्थ और धर्म बनाम नैतिकता का विचारोत्तेजक संवाद विद्यमान है।
संदर्भ एवं टिप्पणियां:
1. मदन सोनी , हिंदी उपन्यास की अल्पता पर कुछ ऊहापोह, ऑनलाइन वेबसाइट - (हिंदी समय)
2. यू. आर. अनंतमूर्ति, संस्कार, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि., दिल्ली, पेपरबैक संस्करण (2023),
3. यू. आर. अनंतमूर्ति, संस्कार, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि., दिल्ली, पेपरबैक संस्करण (2023), पृष्ठ - 106
4. यशपाल, गांधीवाद की शव परीक्षा , (विप्लव कार्यालय, लखनऊ) इंटरनेट आर्काइव,पृष्ठ 14
5. यू. आर. अनंतमूर्ति, संस्कार, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि., दिल्ली, पेपरबैक संस्करण (2023), पृष्ठ - 58
6. यू. आर. अनंतमूर्ति, संस्कार, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि., दिल्ली, पेपरबैक संस्करण (2023), पृष्ठ - 88
7. यू. आर. अनंतमूर्ति, संस्कार, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि., दिल्ली, पेपरबैक संस्करण (2023), पृष्ठ -52
8. यू. आर. अनंतमूर्ति, संस्कार, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि., दिल्ली, पेपरबैक संस्करण (2023), पृष्ठ - 141
9. यू. आर. अनंतमूर्ति, किस प्रकार की है यह भारतीयता - (संकलन व सम्पादन : नंदकुमार हेगड़े, प्रो. नूरजहाँ बेगम), राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि., दिल्ली, संस्करण (2004), पृ. X (भूमिका).
शोधार्थी
दिल्ली विश्वविद्यालय,
संपर्क : 7518140601
ईमेल : shashikant2002tiwari@gmail.Com
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