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मशहूर-आलम जंत्री पढ़ते हुए तुम कौन-सा भविष्य बाँचते थे पिता!

सुधीर विद्यार्थी




अच्छी बात नहीं है
पिताओं के बारे में सोचना                                                                                                    
अपनी कलई खुल जाती है
                               -अज्ञेय

  

पिता के बारे में आज सोच रहा हूँ। सोचा पहले भी था। उनके न रहने के सत्रह वर्षों में हजारों बार उस शख़्स के बारे में विचार किया है, जिन्हें मैंने कभी ‘पिता’ कह कर नहीं पुकारा था, पर मरते दम तक वह मेरे पिता ही थे। ऊँचा, भारी-भरकम क़द। जैसा रईसों और बड़े आदमियों का होता है। जहाँ खड़े होते, वह जगह संपन्न हो उठती। कुर्सी पर बैठते तो उसका कोना-कोना भर जाता। कमजोर चारपाई उनके भार से लचकने लगती। लहडू पर बिराजते तो दूसरे किसी के समाने के लिए जगह शेष नहीं रहती। उनके पूरे वजूद को एकबारगी याद करता हूँ, तो भारतीय राजनीति के पुरोधा पं. गोविन्द बल्लभ पंत मेरे सामने आ खड़े होते हैं। वही रंग, वैसा ही चेहरा, मूँछें और टोपी भी ठीक उसी तरह। उतनी ही ऊँचाई और शरीर का भारीपन। उत्तर प्रदेश विधान भवन के सामने पहुँचकर मैं एक बार ज़रूर पंत जी की प्रतिमा निहारता हूँ। लगता है कि मैं अपने पिता के सम्मुख खड़ा हूँ और उन्हें अभी ‘बड़े चाचा’ कहकर हल्के-से पुकारूँगा।

      पिता के सामने जोर से बोलने का कभी मेरा साहस नहीं हुआ। वह पिताओं से डरने का समय था। वे घर के बाहर होते तो हम भाई-बहन भीतर हुल्लड़ मचाते। दरवाज़े दो थे। एक सहन पर खुलता, तो दूसरा उस घेर में जिधर जानवर बंधते। वे अंदर घुसते, तो हम दूसरे रास्ते बाहर खिसक जाते। कभी आमना-सामना हो जाता, तो जान निकल जाती- बाप रे, बाप! 

      याद नहीं आता कि मेरे बचपन में भी पिता ने कभी मुझे स्पर्श करके प्यार किया हो। क्या उन्होंने मुझे अपने कंधे पर झुलाया होगा? रोने से चुप कराते होंगे पिता मुझे? आख़िर वे भी दूसरे हजारों-करोड़ों पिताओं की भांति पिता ही थे और मैं उनकी पहली औलाद। मुझसे बड़ी संतान दूसरी माँ से थी और उन दोनों के मौत होने के बाद पिता ने मेरी माँ से विवाह किया था। ऐसे में मेरी पैदाइश पर वे पहले बेटे को खोने के दुख से ज़रूर कुछ उबरे होंगे। हो सकता है कि मेरा चेहरा देखकर उन्हें अपने पहले वाले बेटे की याद आई हो या मेरे नाक-नक्श में बार-बार दिवंगत बेटे को तलाश करने की कोशिश करते रहे हों वे। पर मैं तीन का हुआ तो अपनी माँ और उनसे दूर हो गया। जन्म मेरा माँ की ननिहाल में हुआ था, जहाँ की ज़मीन-जायदाद के मालिक बन कर पिता उसी गांव में रहने लग गए थे। मुझे उन्होंने इतनी कम उम्र में अपने पैतृक घर मेरे चाचा के पास रहने भेज दिया। यह तब की बात है, जब मुझसे दो वर्ष छोटी बहन का जन्म हो चुका था। अक्सर सोचता हूँ कि पिता मुझे किस तरह दूर रख पाए होंगे। इस तरह अलग रहते हुए पिता से मेरा संवाद और लगाव कम होता चला गया, लेकिन पिता ने कभी इसकी परवाह नहीं की। वे दो-तीन महीने में एक बार बैलगाड़ी से मेरे पास आते और जाते समय मुझे कुछ पैसे थमाकर लौट जाते। तब मैंने उन्हें कभी उदास होते नहीं देखा, जिस तरह मैं अपने जवान हो चुके बच्चों को कुछ समय के लिए छोड़कर कहीं जाते समय बेचैन हो जाता हूँ। पिता ऐसे क्यों थे? उन्होंने कभी नहीं कहा कि उन्हें मेरी याद आती है। ऐसा सच भी था? क्या वे उन दिनों अपनी खेती-बाड़ी और राब के पैसे-रसूख वाले व्यवसाय में डूबे हुए थे? दरवाज़े पर नौकर-चाकर। बैल-भैंसें। चबूतरे पर बड़ा तख़्त पड़ा होता और उस पर विराज कर वे गांव-देहात के लोगों से बात करते हुए बेहद निश्चिंत दिखाई देते। ज़मींदारी का रौब-दाब अभी बरकरार था। एक बार गांव में नए मकान की दीवार उठाते हुए बूढ़े मिस्त्री ने मेरे और पिता के बीच पसरी इस भयंकर चुप्पी को ताड़ लिया। पिता से बोला था वह - ‘‘ये आपका बड़ा लड़का है? आप इससे बिल्कुल बात नहीं करते, क्यों?’’ पिता फिर भी खामोश बने रहे थे। उनका यह मौन उस क्षण बहुत डरावना था। अपने को बाहर निकाल पाना, उन लम्हों में उनके लिए संभव नहीं हुुआ।    

      कहा जाता है कि पिता की गोद से बड़ा कोई सिंहासन नहीं होता। मुझे याद नहीं कि मैं कभी अपने पिता की गोद में बैठा होऊँ। मैंने उन्हें चरण स्पर्श करने के अलावा कभी छुआ नहीं। हाँ, एक-दो बार वे नहाते समय मुझे बुलाते और पीठ पर साबुन मलने को कहते। उनके कंधे बहुत विशाल और छाती खूब चौड़ी थी और उस पर घने बाल थे। पीठ पर हाथ फेरते हुए वे मुझे बहुत बलशाली लगते। सोचता यदि मुझे मारने लगें, तो मैं चूरमा बन जाऊँ। सो मैं बहुत भयभीत रहता उनसे। पिता ने मेरे भीतर का वह डर निकालने का कभी प्रयास नहीं किया। मुझे हर समय लगता कि पिता मुझसे बहुत दूर हैं। एक जैविक रिश्ता ही मुझे महसूस होता उनसे। पिता ने कभी यह भी ध्यान नहीं दिया कि मैं बेहद दुबला-पतला और बीमार-सा रहता हूँ। ग्यारह की उम्र में मेरे बड़ी माता (चेचक) निकली। आँखों की पलकें तक बतासे की मानिंद फफोलों से दब गईं। बहुत बुरा हाल था। फिर भी पिता मुझे देखने एक-दो बार ही आए। लोग कहते थे कि तब मेरा नया जन्म हुआ था।   

      क्या मेरे पिता भी अपने पिता के बारे में मेरी ही तरह सोचते थे। यह जानने के लिए अब मेरे पास कोई ज़रिया नहीं है। अपने पिता को वे ‘लाला’ कहते थे और माँ को ‘जिया’। मैंने उनके लाला को नहीं देखा। वे पहले ही मर चुके थे और जिया को अकेला छोड़ गए थे। जिया बहुत सुंदर और सभ्य महिला थीं। पता नहीं किस मौज़ में आकर पिता ने एक बार बताया था कि वे लाला से छिपाकर बीड़ी पीने लग गए थे। तब धोती पहनने का चलन था और वे गर्मी की दुपहरी में नहा-खाकर बिना कुर्ता-बनियान पहने बाहर उस नीम के नीचे आ खड़े हुए, जहाँ लाला बैठे थे। पीछे धोती की फेंट में बंडल और माचिस खुंसा था, जिसे लाला ने देख लिया। इस पर वे ख़ूब पिटे। लाला की कोई और बात उनसे मुझे कभी सुनने को नहीं मिली। ऐसे में अपने बाबा की कोई तस्वीर बनाने के लिए तलाश करने पर भी मुझे रंग-रेखाएं नहीं मिल पाईं। 

      मैं बचपन से ही बहुत ज़िद्दी था। पिता से कभी खुल ही नहीं पाया, न नज़दीकी महसूस की। पैतृक घर में आठवें तक पढ़ाई के दौरान छुट्टियों में अम्मा-पिता के पास अपने जन्म के गांव आता तो मुझे लगता कि ये मेरा घर नहीं है। कई बार नाराज़ होकर मैं वापस चाचा के पास चले जाने को होता, तब मुझे दौड़कर पकड़ा जाता। उन दिनों नए कपड़े होली के त्योहार पर ही बनने का रिवाज था। पिता मेरे सभी भाइयों के लिए एक थान में से इकट्ठा कपड़ा ले आते और कमीजों को कुछ लंबा सिलवा देते ताकि शरीर की बढ़वार में वे ओछी न पड़ जाएं। तब ऐसा ही चलन था और एक जैसे कपड़े पहनने पर बाहरी व्यक्ति भी सगे भाइयों की शिनाख्त कर लिया करते थे। 

      बड़ी सीर के मालिक होने के बाद भी पिता नहीं चाहते थे कि मैं बड़ा होकर खेती करूँ। उन्होंने पड़ोस के थोड़े पढ़े-लिखे एक आदमी के कहने से मुझे साइंस में दाख़िला करा दिया। विज्ञान की पढ़ाई में मेरी रूचि नहीं थी, सो मैं फिसड्डी साबित हुआ और पीएमटी परीक्षा उत्तीर्ण कराकर डॉक्टर बनाने का उनका सपना पूरा नहीं हो पाया। बोले थे एक रोज़ - ‘‘तुम पढ़-लिखकर मेड़ों पर ही घूमते रहोगे? जानते हो कि कायस्थ किसानी का काम नहीं कर सकते।’’ मैंने कोई तर्क नहीं किया और न ही पढ़ाई में मन लगाया। उन्होंने अच्छे अंक लाने के लिए ट्यूशन की भी व्यवस्था की। पर सब बेकार। मुझे साइंस के न्यूमेरीकल समझ में आते, न केमिस्ट्री। सब कुछ सिर के ऊपर से निकल जाता। मेरी रूचि कला, साहित्य या फिर खेती-किसानी और राजनीति में थी। लेकिन पिता को यह पसंद नहीं था। चाल्र्स डार्विन से भी उनके पिता ने एक बार कहा था - ‘‘निशानेबाजी, कुत्तों और चूहों को पकड़ने के अलावा तुम किसी चीज़ पर ध्यान नहीं देते हो। तुम स्वयं अपने लिए और साथ ही सारे परिवार के लिए कलंक बन जाओगे।’’

      मेरी स्थिति देखकर पिता ने अब मेरी तरफ ध्यान देना और कम कर दिया। लगता कि वे किसी तरह जैविक पिता होने भर की ज़िम्मेदारी निभा रहे थे। उन्होंने समझ लिया था कि मैं कुछ कर-धर नहीं पाऊँगा। सो उन्होंने एक तरह से ढील देकर मुझे नियति के भरोसे छोड़ दिया। मैं सबसे ज्यादा आहत उस रोज़ हुआ, जब सामने वाले घर के मेरे हमउम्र एक लड़के के बारे में उसका नाम लेकर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा- ‘‘मेरा लड़का उसकी तरह का होता।’’ सुनकर मैं पीड़ा से भर गया। मैं आज तक पिता को इसके लिए माफ़ नहीं कर पाया। 

      पढ़ाई छोड़कर मैं खेती करने लग गया। पिता ने निराश होकर मेरा विवाह कर दिया। खेत जोतने के लिए पहली बार मुँह अँधेरे में निकला। चबूतरे पर बैलों को जुए में जोता और उस पर हल रख कर मैंने रस्सी लपेट दी। इतने में पिता आ धमके। देखा तो कुढ़ कर बोले- ‘‘कंधे पर हल रखकर ले जाते शर्म आती है, तो खेती नहीं कर सकते।’’ मैंने कुछ न कह कर हल को खोल कर कंधे पर रख लिया और खेत पर चला गया।  

      खेती करते कुछ समय हो चला था। हल तीन थे, इसलिए दो नौकर भी साथ में रहते। एक रोज़ मैं भैंसे का हल जोत रहा था। दुपहरी तेज़ हो गई थी। खेत में एक हरैया बाकी थी, जिसे मैं निकालना चाहता था। पर सिर के ठीक ऊपर सूरज चढ़ आने से भैंसे हाँफने लग गए थे। दो-तीन पैने जड़ते ही वे भाग खड़े हुए। रोकने की कोशिश व्यर्थ। अब मैं हल को हाथों से उठाए उनके साथ भागने लगा, तभी एक भैंसे के पैर में हल का फल जा घुसा। भैंसे थम गए। पिता दूर खड़े यह सब देख रहे थे। एकाएक वे बेहद नाराज़ हो उठे। घायल हो चुका भैंसा अब उनकी चिंता और गुस्से का कारण बन चुका था। वे मुझे निरा अनाड़ी और बेवकूफ बताकर चीखे- ‘‘निकल जाओ मेरे खेत से।’’ 

      मेरी ज़िंदगी कुछ और रास्ता देख रही थी। हल को वहीं छोड़कर मैं चल पड़ा। घर आकर मैंने डिग्री कहे जाने वाले का़गज़ समेटे और बिना सोचे-समझे साइकिल से शहर की ओर चल दिया। माँ ने मेरा गुस्सा देखा और यह सोच कर कि मैं अब रूकूँगा नहीं, उन्होंने चार पराठे धनिए की चटनी समेत मेरे झोले में ठूंस दिए। 

      गांव के किनारे से शहर जाने वाली सड़क उस धूप में मुझे और भी काली लग रही थी। मेरी जेब में कोई पैसा नहीं था। एक दिन पहले नदी पार के क्रेशर पर लढ़िया से खुद गन्ना डालकर आया था। बाद में होने वाले जिसके भुगतान की, अस्सी रुपये की पर्ची मेरे पास थी। उस क्षण मैंने एक बार भारी मन से पलट कर अपने गांव की सरहद और खेत देखे। मेरी आँखें छलक आईं। मुझे नहीं पता था कि मैं कहाँ और क्यों जा रहा हूँ। शहर जाकर क्या करूँगा? कहाँ ठहरूँगा? क्या खाऊँगा? कोई काम मिलेगा भी तो कैसे? पर मेरी रूलाई अब थम चुकी थी। साइकिल तेज़ी से उस शहर की ओर दौड़ने लग गई थी, जहाँ से मैं डिग्री के दूसरे वर्ष से पढ़ाई छोड़कर खेती करने घर आ गया था। मैंने दो घंटे में उस सीमा को छू लिया, जिसे शहर का नया अशफाक नगर मुहल्ला कहा जाता है। दो-चार दिन का वह घर मेरा ठिकाना बना, जिसमें मैं किराये पर रहा करता था। मकान मालिक के लड़के का सवाल था- ‘‘तुम नौकरी करोगे? इतनी ज़मीन-जायदाद। तुम्हारी ख़्वाहिश तो राजनीति में जाने की थी।’’ मैंने अपनी विवशता प्रकट की। वह बोला- ‘‘ग्राम सेवक के पदों के लिए अर्जियाँ लग रही हैं और न्याय विभाग में भी।’’ मैंने दोनों जगह दरख़्वास्त दे दी।    

      जल्दी ही परीक्षाएं हुईं, जिनमें मेरा चयन हो गया। पहले में बाहर जाकर ट्रेनिंग करने का प्रावधान था, इसलिए उसे छोड़ना ही मैंने उचित समझा। मुझे पैसे की तुरंत आवश्यकता थी, सो मैंने अदालत में किरानी का पद स्वीकार कर लिया। पहले दिन पूरे वक्त मेरी आँखें डबडबाई रहीं। मेरा एक ही सपना था कि कभी नौकरी नहीं करूँगा। उसे ध्वस्त होते देखना मेरे लिए बहुत पीड़ादायक था। इसके बाद कई महीने बीते, तब गांव की ओर रूख किया। पत्नी की कोई खास प्रतिक्रिया नहीं थी। पिता से आमना-सामना हुआ, पर संवाद नहीं। दूसरे दिन चलने लगा तो बाहर चबूतरे पर आकर पिता ने मेरा हाथ थाम लिया। बोले- ‘‘नौकरी छोड़ दो। तुम कर नहीं पाओगे। यहाँ सारा काम चौपट हुआ जा रहा है।’’ इतना कह कर वे मेरे कंधे पर सिर रख कर रोने लगे। 

      मेरे पास शब्द ही नहीं थे। क्या कहता। उनके आँसू देखता रहा। पोंछने का साहस भी नहीं हुआ। थोड़ी देर उनके पास रुक कर ज़िंदगी का आगा-पीछा सोचने लगा। अपने और उनके बीच की डोर को पकड़ता, तो कभी वह हाथ से छूट-छूट जाती। दो घंटे बाद मैंने कहा - ‘‘आज जाता हूँ। कुछ ठहरकर आपको बताऊँगा।’’ पिता चुप मार गए। 

      शहर पहुुँचकर मैंने नौकरी न छोड़ने का ही फ़ैसला किया। मैं पिता के प्रभाव से मुक्त होना चाहता था। लेखन की तरफ मेरा झुकाव हो चला था। मुझे लगा कि शहर में रहकर मैं अपनी इस नई राह पर ठीक से चल सकूँगा। अरसे बाद मैंने अपनी पहली पुस्तक ‘अशफाकउल्ला और उनका युग’ की प्रति पिता के हाथों में थमाई, तब भी उनकी प्रतिक्रिया का मुझे अनुमान नहीं हुआ। बाद में पता लगा कि वे आने-जाने वाले हर व्यक्ति से मेरी तारी़फ करते और कई लोगों कोे पुस्तक दिखाते और पढ़ने को देते। उन्हें लगा कि मैं किसी एक ठीक-ठाक रास्ते पर चल निकला हूँ। अब उनके चेहरे पर संतोष का भाव था और वे मुझे उम्मीद की नज़रों से देखने लगे थे। एक बार बोले - ‘‘हमारे मामा अम्बा सहाय आज़ादी की लड़ाई में जेल गए थे। उनसे मिलो तुम।’’ पर वह मुला़कात टलती रही और फिर एक रोज़ सुना कि उनका निधन हो गया। उनका एक चित्र मेरे पास आज भी सुरक्षित है, जिसमें वे गले में फूल-मालाएं डाले जेल की ओर प्रस्थान कर रहे हैं।

      सूबे के एक बड़े कर्मचारी आंदोलन में पिता को मेरे जेल जाने की सूचना मिली। उस रात वे देर तक सोए नहीं। सबेरे किसी से कहा- ‘‘इसके बचपन की बात है, तब एक ज्योतिषी ने बताया था कि ये लड़का डकैत बनेगा। डकैत नहीं बना, लेकिन जेल तो चला गया।’’

      छूटने पर मेरे स्वागत में शहर में बड़ी सभा। मैं मंच पर। एकाएक पीछे मुड़कर देखा कि पिता बैठे हैं। मेरे चेहरे की रंगत बदल गई। वे किसी को साथ लेकर वहाँ आ गए थे। उनकी उपस्थिति में मैं बहुत संकोच के साथ अपना भाषण दे सका। 

      पिता शहर उस दिन भी आए थे, जब मैंने बड़े पैमाने पर देशभर के रचनाकारों और संस्कृतिकर्मियों को जोड़कर साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन आयोजित किया जिसकी अध्यक्षता निरंकार देव सेवक ने की और उसमें रामकुमार कृषक, बल्लीसिंह चीमा, अनिल सिन्हा, नीलाभ, अजय सिंह, शम्सुल इस्लाम, उदय, पंकज के अलावा पुराने कामरेड रमेश सिन्हा ने भी हिस्सेदारी की थी। ‘दस्ता’ और ‘निशांत नाट्य मंच’ की टीमें भी वहाँ मौज़ूद थीं। उसी समारोह में घुस कर साम्प्रदायिक ताकतों ने मुझे जान से मार देने की धमकियाँ दीं। पिता ने वह सब अपनी आँखों से देखा था। पर वे घबराए नहीं, न मुझे समझाया या रोका। कार्यक्रम समाप्त होने पर उन्होंने मुझे कुछ पैसे सम्मेलन में खर्चे के लिए दिये। 

      मैंने पिता के कुछ और रूप देखे, जिनके प्रति मेरा गहरा आदर भाव है। पर मैं इसे कभी उनके सामने प्रकट नहीं कर पाया। पिता अपने विवाह के बाद जिस गांव में आकर रहने लग गए थे, वह मेरी माँ की ननिहाल थी और यहाँ की सीर उन्हें मिल गई थी। एक तरह से वे घर-जमाई हो गए थे। मेरा जन्म इसी छोटी गंवई बस्ती में हुआ था। इस गांव में कुछेक घरों में नल थे पर कुआँ सि़र्फ एक था। पुराना। दूसरे कुएं नहीं बनाए जा रहे थे। कहा जाता था कि जो कुआँ बनवाता है, उसकी मृत्यु हो जाती है। पिता ने रहट लगवाने के लिए अपने बाग में कुआँ बनवाना तय किया। लोगों ने ऐसा न करने के लिए समझाया, पर वे नहीं माने। दाहला खुदते ही उसमें पानी फूट पड़ा। मज़दूर भाग खड़े हुए। फिर भी पिता ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने गड्ढे में मिट्टी डलवाई और कुएं की ईंटें जुड़वाना शुरू कर दिया। कुछ दिनों में जब रहट की डोलचियों से पानी निकला, तो पिता बहुत खुश थे। उस रोज़ पूरा गांव उनके साहस की प्रशंसा कर रहा था। पिता के चेहरे पर एक अंधविश्वास को ध्वस्त करने की जीत चमक रही थी। 

उनके जीवन की एक और घटना याद आती है। गांव के नज़दीक ही हमारे एक खेत में मरघट बना लिए गए थे। वह ज़मीन हमारे खेत-बाग की थी। पिता मरघट को वहाँ से हटवाने के लिए कटिबद्ध थे। नौकरों से कहा उन्होंने - ‘‘यहाँ सफ़ाई करके जुताई कर दो।’’ पर इस काम के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। सब कहने लगते - ‘‘चिटकाने हैं, हम नहीं जोतेंगे। भूत बाधा होती है।’’

      लोगों ने देखा कि एक रोज़ पिता ने एक नौकर के हाथ से हल लेकर पूरे मरघट को दो घंटे में जोत दिया। पिता के जीवट को सब दूर खड़े देखते रहे। 

      उनके जीवन की एक और स्मृृति अक्सर मेरा पीछा करती है। हमारे पड़ोस दक्खिन में जाटवों की बस्ती, जिसे चमरौधा कहा जाता है, उसमें आधी रात को एक जाटव के घर में आग लग गई। कहा गया कि टोले के ही किसी आदमी ने रंज़िश में उसे फूंक दिया। पूरा मकान लपटों से घिर चुका था। सब दूर खड़े देख रहे थे कि पिता अपनी धोती को ऊपर खोंस कर दरवाज़े से भीतर जा घुसे। एक बूढ़ी औरत और उसके कुछ सामान को उन्होंने बचा लिया। लपटें दरवाज़ें को घेरने लग गई थीं और हम पिता को भीतर देख कर भयभीत हो रहे थे। पर वे किसी तरह बच कर बाहर निकल आए। पूरे गांव के बीच अकेले उन्होंने उस हरिजन बस्ती में घुसकर सबको चौंका दिया। 

      पिता अठारह साल गांव के निर्विरोध प्रधान रहे। हरिजनों के लिए एक कुएं की स्वीकृति आई, पर कुआँ बने कैसे? अंधविश्वास अभी लोगों के सिरों को बुरी तरह जकड़े था। उन्होंने फिर यह बीड़ा उठाया। हरिजन और सवर्णों के घरों के बीचोंबीच कुआँ खुदवाया। कहा कि सब इससे पानी भरेंगे-पिएंगे। उन्होंने तहसील के अधिकारियों के सम्मुख कहा - ‘‘एक रैदास भाई पानी भर कर लाए, सबसे पहले मैं पिऊँगा।’’ उन्होंने ऐसा ही किया। 

      पिता पूजा-पाठी कतई नहीं थे। मैंने कभी उन्हें जल चढ़ाते या किसी देवता की तस्वीर या प्रतिमा के समक्ष आराधना करते नहीं देखा। कुछ दिनों मेरी मौसी ने जब सत्यनारायण की व्रत कथा कराना तय किया, तब उनके कहे, पिता को उसमें बैठना पड़ा। पर वे लोगों को दान-दक्षिणा देने और ज़रूरतमंदों को मदद करने में बहुत भरोसा करते थे। उनकी इस प्रवृत्ति को जानकर हर रोज़ उनके पास माँगने वालों का तांता लगा रहता था। बगावत बहुत थी। ऐसे में लोग सबसे अधिक लकड़ी माँगने वाले आते या फिर अनाज और राब की फरियाद करने वाले।

      मेरे भीतर सबसे बड़ी गाँठ अम्मा और पिता के रिश्ते को लेकर बनी रही। दोनों को कभी मैंने बतियाते नहीं देखा। उनमें न आपस की कोई चर्चा न घर-गृहस्थी की, बाल-बच्चों की भी नहीं। शायद इसी सन्नाटे का प्रभाव था कि मैं भी कभी पिता से संवाद नहीं कर सका। एक विकट खामोशी की चादर हरदम हमारे बीच में तनी रहती, जिसे वे तोड़ पाते और न मैं। अम्मा उन स्थितियों में मुझे बहुत दयनीय प्रतीत होतीं। किसी सीधी गाय की मानिन्द खूंटे से बंधी हुईं।   

      वह समय ऐसा था, जब अपनी पत्नी-बच्चों से प्रेम का प्रदर्शन करना निषिद्ध माना जाता था। याद है कि गांव-बस्ती में कोई पुरुष अपनी संतान को गोद में नहीं लेता था। सब अपने भाइयों और रिश्तेदारों के बच्चों पर प्यार का इज़हार किया करते थे। ऐसे में भाई-भतीजों के बीच ज्यादा सघन और आत्मीय रिश्ते बने दिखाई पड़ते थे। 

      पिता ने कच्चा मकान उठवाया था। खूब अच्छा। बड़ा-सा। वे हर साल उसमें कुछ-न-कुछ तरमीम कराते। यह उनकी धुन थी। बाद के दिनों में कुछ हिस्सा पक्का भी कराना चाहा, पर वह कभी पूरा नहीं हुआ।

      अज्ञेय की तरह मैं भी आज चाय पीते हुए पिता के बारे में सोच रहा हूँ। एक कविता में उन्होंने कहा है - ‘‘अच्छी बात नहीं है/पिताओं के बारे में सोचना/अपनी कलई खुल जाती है/कितनी दूर तक जाना होता है पिता से/पिता जैसा होने के लिए।’’

      घर छोड़ने के बाद मैंने ‘बाप’ शीर्षक से एक कहानी लिखी थी, जिसे एक संगोष्ठी में सुनकर विष्णु प्रभाकर ने कहा था कि इसमें नई पीढ़ी का आक्रोश अधिक है, जीवन अनुभव कम। क्या दरअसल हम पिता को तब जान पाते हैं, जब खुद पिता बन चुके होते हैं। पिता को मैंने कथाकार ज्ञानरंजन की आँखों से भी देखा है। पर जाने क्यों मुझे बार-बार चन्द्रकांत देवताले की कविता पंक्तियाँ याद आ जाती हैं - ‘‘प्रेम पिता का ईथर की तरह होता है/वह दिखाई नहीं देता।’’

      क्या मेरे पिता का प्यार भी ईथर की तरह था, मेरी आँखों की पकड़ में न आने वाला? मेरे ऊपर अख़्तर शीरानी की तरह अपने पिता का व्यक्तित्व खौ़फ की हद तक क्यों हावी था और चाहते हुए भी मैं उससे कभी उबर नहीं पाया। जानता हूँ कि अख़्तर के पिता महमूद शीरानी बड़े मर्तबे के इन्सान थे और वे अपने बेटे पर जी जान से फिदा थे। ऐसे बाप पर अख़्तर का फख्र करना कुदरतन वाज़िब था। पर उनके बीच भी जो डर की दीवार बन गई थी, वह कभी दरक नहीं पाई।

      पिता! जो कहना चाहता था मैं तुमसे, वह अनकहा रह गया और एक रोज़ फतेहगढ़ में गंगा के किनारे अपने दफ्तर में मुझे किसी ने खबर दी कि तुम नहीं रहे। सुनकर एकबारगी मेरे हाथ कांप गए थे। मेरी पत्नी को गुज़रे तीन साल से अधिक हो चुके थे और तब मैं अपने तीन छोटे बच्चों को घेरे-बटोरे किसी तरह ज़िंदगी को आगे ढकेल रहा था। ऐसे में मैं बहुत कम आ पाता था तुम्हारे पास। मेरे मन में यह पीड़ा हर वक्त कील की तरह चुभती। चाहता था कि मैं तुमसे कहूँ और कुछ तुम्हारी सुनूँ। पर जब सामने पहुँचता, तो वही कभी न टूटने वाला भयावह मौन किसी अविचल चट्टान की मानिन्द बीच में आकर खड़ा हो जाता। पिता! मेरे और तुम्हारे बीच पसरे इस सन्नाटे से तुम भी कभी थक जाते रहे होगे बेतहाशा और मैं भी चूर हो जाता था बुरी तरह। पीछे एक रोज़ जब मैं गांव में पहुँचा था तुम्हारे पास, तब तुम कुछ अस्वस्थ थे। मैं शहर से तुम्हारे लिए कुछ संतरे, खरबूजे, बिस्कुट, आंवले का तेल, रूह आफजा की बोतल और कुछ खाने की चीज़ें ले गया था। वे सब मैंने तुम्हारे पास ही रख दी थीं। उसमें से कुछ तुम्हें खाने को भी दीं। पर सप्ताह भर बाद लौटा, तो वह सब वैसा ही रखा था वहाँ तुम्हारे पास। देखकर मैं हिल गया। खरबूजे और संतरे सूख चुके थे। 

      पिता! क्या नाराज़गी थी? किससे किन्ना था तुम्हें? वैसे भी घर में रहते हुए कई बार तुम खाना छोड़ देते थे। कई-कई रोज़ नागा निकल जाते। मुुझे खबर लगती, तो शहर से आकर तुम्हें खाना खिलाता। ऐसा शायद मेरे छोटे भाइयों से नाराज़गी के चलते होता। 



      पिता! तुम कुछ भी बिना बताए विदा हो गए। मैं तुम्हारे मृत शरीर के निकट बैठा हूँ। तुम्हारा चेहरा देखने का भी साहस नहीं होता मेरा। मेरे भीतर तकलीफ़ का समंदर है इस क्षण। तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सका मैं। बेटे और पत्नी की मौत ने मुझे बहुत अपंग बना दिया था। तुम तो मेरा यह दर्द जानते थे। आज तुम्हारी मृत देह के नीचे बर्फ की सिल्लियाँ लगी हैं, जिनसे रिस कर पानी दूर तक बहता चला जा रहा है। मैं उस धार को देखकर बेचैन हूँ। कुछ सोच नहीं पा रहा हूँ। नाते-रिश्तेदार सब मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। लो मैं आ गया। तुम्हारी चिता जला कर मैं नदी की तरफ जा रहा हूँ। 

      घर आ गया हूँ। मैंने तय कर लिया है कि मैं तुम्हारे मरने पर कोई धार्मिक रस्म नहीं करूँगा। गांव वालों को खुश करने के लिए भी नहीं। ऐसा मैंने बेटे और पत्नी की मृत्यु पर भी किया था। 

      पिता! किसी लंबी बीमारी से तुम्हारा निधन नहीं हुआ। पता लगा कि निकट के बस अड्डे से गांव तक पैदल आते, उस रोज़ तुम थोड़ा भीग गए थे। छह-सात दिन जुकाम और टूटन रही और एक सबेरे तुम मृत पाए गए। 

      लेकिन अंतिम क्षणों में तुम्हें क्या-क्या याद आया होगा? मेरी अम्मा को भी तुमने जल्दी खो दिया था। मैं और एक अन्य पुत्र बाहर थे। तीन जो निकट थे, उन्हें भी तुम्हारी मौत का पता नहीं लगा। चौपाल पर किसी गांव वाले ने तुम्हारी अधखुली आँखें और निर्जीव शरीर को देखा तो भीतर खबर दी। एक भयावह सन्नाटा तुम्हारी मृत हो चुकी देह के चारों तरफ किसी काली चादर की भांति तना हुआ था, जिसे मैंने बखूबी महसूस किया।

      जिस दिन अपनी अम्मा को जलाने की जगह के निकट अपने खेत में तुम्हें फूंक कर आया, तो लगा कि जब तक तुम थे, मैं दुनिया को ललकार सकता था। मुझे मृत्यु की कल्पना तक न थी। पर तुम्हारे अनुपस्थित होते ही मौत का क्रूर हाथ ऐन अपने सामने मुझे दिखाई देने लगा था। दरअसल, मेरे और मौत के दरम्यान तुम अंगरक्षक बन कर खड़े जो रहे थे हर पल। यह मैं अब देख पा रहा हूँ...।

      पिता! तुम मेरे लिए उस निश्कंप दीपशिखा की तरह थे, जिसकी रोशनी में मैं ज़िंदगी को बेखटके पढ़ता और बाँचता रहा। भले ही हमारे मध्य उस तरह संवाद न रहा हो, पर कुछ तंतु मेरे-तुम्हारे बीच तने-बुने थे किसी अदृश्य जाल की तरह। शरद कोकास की लंबी कविता में मैं तुम्हें ही तो पाता हूँ - ‘‘जैसे किसी रात तलब की इंतहा में/लगता है कहीं दिख जाएं पिता/तो पूछें उनसे अपनी मासूमियत में/कहाँ छिपाया है वह छाता/जिसने भीगने से बचाया था हमारा बचपन/दुखों की बेहिसाब बारिश में/वह छाता किसके घर भूल आए हैं।’’ कुछ ऐसी ही थी तुम्हारी उपस्थिति मेरे लिए।

      और पिता! बताना चाहता हूँ तुम्हें कि अपने घर के सामने जो क्षीणकाय नदी कठिना बहती है, उसका जल अब खारा हो गया है। बहुत उथली हो गई है वह। कहूँ कि मरणासन्न है। जिस नदी की स्वच्छ जलधार में तुम मुझे बैलों को पानी पिलाने और नहलाने के लिए भेजा करते थे, उस नदी की आँखों में अब रोने के लिए आँसू भी नहीं बचे हैं। तुम्हारे न रहने के दो वर्ष बाद मैं गांव गया, तब एक बक्से से तुम्हारी टोपी, सदरी, चश्मा, डायरी और एक मशहूर आलम जंत्री मिली। इनमें से कुछ चीज़ें मैं कठिना जल में बहा कर चुपचाप तुम्हें प्रणाम कर लौट आया। पर नहीं बह सकी उस मंद धार के साथ तुम्हारी स्मृति। तुम आज भी दरवाज़े पर अपने बैलों को प्यार करते पूरे कद के साथ खड़े हो मेरे सामने। 

      तुम्हारी गैरहाज़िरी मुझे गांव में अब बहुत बेचैन करती है। मायकोवस्की की मृत्यु के बाद जेकब्सन ने भी कहा था कि वह उनकी शख्सियत पर कुछ कहे या उस अभाव पर, जो उनके न रहने से पैदा हो गया है। मैं भी आज तुम्हें लेकर ऐसी ही दुविधा में हूँ। मैं इससे मुक्त नहीं हो पा रहा हूँ पिता! 

      पिता! तुम उर्दू में ही लिखा-पढ़ी करते थे। खेती-बाड़ी और लेन-देन के कारोबार की वह खुशखत इबारत आज भी मेरे सामने है। दीवाली की पूजा के समय भी तुम उर्दू में ही ‘राम-राम’ लिखते। पिता! तुमने विरासत में बहुत कुछ दिया मुझे, लेकिन एक और बड़ी चीज़ थी तुम्हारे पास, उर्दू जिसे तुम दे सकते थे मुझे पर वह तुमने नहीं दी। यह अभाव आज मुझे पल-पल पर अखरता है। मैंने अक्सर तुम्हें चुपचाप उर्दू की मशहूर आलम जंत्री पढ़ते देखा था, जिसे नया साल शुरू होने से पहले खरीद कर लाते थे। जान नहीं पाया कि तुम उसमें किसका भविष्य बाँचते थे। अपना, मेरा या फिर  समय का।

      उस रोज़ तुम्हारा सबसे प्रिय मित्र चमरौधे वाला तौले थनैत पूछने लगा मुझसे कि तुम्हारी समाधि कब बनवाऊँगा। मैंने कहा कि वह तो मेरे भीतर है। मैं बाहर नहीं लाना चाहता उसे। मेरी यह बात थनैत समझ नहीं पाया, इसे मैं बखूबी जानता हूँ। 



सुधीर विद्यार्थी 

भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास के सजग अध्येता और विश्लेषक। अब तक चार दर्ज़न से अधिक पुस्तकों के लेखन के अतिरिक्त कई महत्वपूर्ण ग्रंथ संपादित। जनपदीय इतिहास और संस्कृति पर छह विशिष्ट कृतियाँ। संस्मरण, कविताएं और स्तंभ-लेखन भी। बीस वर्षों तक उत्तर प्रदेश के कर्मचारी-मज़दूर आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी और प्रांतीय नेतृत्व। इसी के तहत अनेक यातनाएं, मु़कदमे और दो बार जेल-यात्रा। देश भर में शहीदों और क्रांतिकारियों की स्मृति-रक्षा का कार्य। नाटकों और नुक्कड़ नाटकों का संयोजन। अनियतकालीन पत्रिका ‘संदर्श’ का संपादन और प्रकाशन। क्रांतिकारी इतिहास लेखन के लिए ‘परिवेश सम्मान’, ‘गणमित्र सम्मान’, ‘अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान’, ‘अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद सम्मान’, ‘साहित्य भूषण सम्मान’, ‘स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र नंदवाना स्मृति सम्मान’, ‘वीरेन डंगवाल साहित्य सम्मान’ तथा सृजनात्मक गद्य के लिए ‘शमशेर सम्मान’। 

संपर्क : 6, फेज-5 विस्तार, पवन विहार, पो. : रुहेलखंड विश्वविद्यालय,  बरेली-243006
मो - 9760875491


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