1. मैंने दुनिया की बात कही
मर रहे हैं शहर
रात की कढ़ाई में
घुले तारे सिसक रहे हैं
समंदर की शिराओं ने
जैसे आत्महत्या कर लिया हो
ऐसे फैल रही हैं वे
पर्वत सारे टूट रहे हैं
हवाओं में मिला है
काले नाग का जहर
बच्चे मुरझा रहे हैं
बूढ़ों का तो हाल बुरा है
साधौ! यह घोर नरक की बात नहीं है
मैने दुनिया की बात कही है..!
***
2. आशाएँ
आशाएँ नहीं मरतीं
पतझर में
पतझर, मर जाता है
शाखाओं पर नई कोंपलों के आने से
आशाएँ नहीं मरतीं
किसी के मर जाने पर भी
जीवन है तो मरण भी
यही सोचकर
संतोष कर लेती हैं शायद
मगर वे देख नहीं पातीं
निर्दोष बच्चों,
अबलाओं का निर्मम नरसंहार
वे कर लेती हैं आत्महत्या
सुनकर युद्ध का कोलाहल
युद्ध आशाओं का हंता है..!
***
3.किसी को शिकायत नहीं है
नदी का काम है
बहना
और पहाड़ का
खड़े रहना
दोनों
अपना-अपना
काम कर रहे हैं
दोनों को
एक-दूसरे से
कोई शिकायत नहीं है..!
***
4. तार
तार सर्वदा
बांधने की वस्तु है
कदाचित् सलीके से
चढ़ा दिया जाए
किसी वीणा के ऊपर
तब मंत्रमुग्ध करने वाले
सप्त स्वरों को मुक्त भी करता है..!
***
5. युद्ध : इक्कीसवीं सदी के सीने में कैंसर
श्रेय लेने की लड़ाई
लड़ रहे होते
दो आदमी,
दो गाँव,
दो शासक या
आपस में दो देश
कि मैं पढ़ाऊँगा
इस पिछड़े देश को
मैं उन्नत और आधुनिक बनाऊँगा
गरीब आदिवासी भाइयों तक शिक्षा,
वस्त्र और औषधि पहुँचाऊँगा
तो बेहद खुशी होती
वे लड़ रहे हैं
ज़मीन के लिए
छीनने को एक-दूसरे का अस्तित्व
मानों इक्कीसवीं सदी के सीने में
हो गया है भयंकर कैंसर
इससे बड़ा रोग
और दुःख भला
और क्या हो सकता है
इक्कीसवीं सदी के लिए..!
***
6. प्रेम
1.
हवाओं की भाँति
हृदयों में संप्रेषित होता है
दो हृदयों में आवाजाही होने के बावजूद
प्रेम एक ही होता है
प्रेम अधूरा केवल हमारे विश्लेषणों में हो सकता है
वरना तो प्रेम का स्वरूप अनादिकाल से पूर्ण रहा है..!
2.
कुछ यात्राएं धुँध की भाँति होती हैं
कब उठती हैं?
कब स्थगित हो जातीं हैं?
जिनकी कोई मंजिल नहीं होती
प्रेम भी ऐसी ही यात्रा है
प्रेम का धुंधलका इंसान को परिष्कृत करके कहीं गायब सा हो जाता है
और इंसान ढूँढता रहता है ताउम्र उस धुंधलके में अपना वजूद..!
3.
उतना प्रेम
शायद ही कभी किसी ने पाया हो
इस दुनिया से
जितनी कि चाह रही
क्या मालूम उतना प्रेम लुटा देने से
यह दुनिया जरा सी और खूबसूरत हो जाए..!
4.
दुनिया के पनघट में
कई रंग के पानी
सबके अपने रंग, अपने स्वाद
इश्किया पानी का
कोई रंग है न स्वाद
केवल नशा है यूँ तो चढ़ता नहीं
चढ़ जाए तो उतरता नहीं..!
***
कवि परिचय
आशीष मोहन
(आशीष कुमार ठाकुर)
पद/व्यवसाय- आरक्षक म. प्र. पुलिस
जन्म तिथि - 26 जनवरी
माता - श्रीमती रजनी ठाकुर
पिता - श्री मोहन सिंह ठाकुर
शिक्षा - एम. ए.(इंग्लिश), पी. जी. डी.सी. ए.
० प्रकाशन -
- साहित्यिक पत्रिकाएँ
- वागर्थ, विश्वगाथा, सोचविचार, देशधारा, रचना उत्सव, किस्सा कोताह, प्रणाम पर्यटन, प्रेम सुधा पहल, आंचलिका, प्रतिमान (पंजाबी पत्रिका) सहित देश की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशन।
- समाचार पत्र
- दैनिक भास्कर, नवभारत, पत्रिका, संवाद कुंज, विनय उजाला, दो बजे दोपहर, देशबंधु, जग प्रेरणा, दिव्य एक्सप्रेस, पहले पहल (पाक्षिक समाचार पत्र)आदि प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशन।
- बाल पत्रिकाएँ किलोल, देवपुत्र एवम् बालकिरण में बाल कविताओं का नियमित प्रकाशन।
- ई पत्रिकाएँ आँच, पूर्वांगन, काव्य प्रहर आदि विभिन्न ई पत्रिकाओं में प्रकाशन।
* आकाशवाणी छिंदवाड़ा से कविताओं का प्रसारण।
* पंजाबी, गुजराती, अंग्रेजी व उड़िया आदि भाषाओं में रचनाओं का अनुवाद।
* पुरस्कार
- अक्षत सम्मान - आंचलिक साहित्यकार परिषद छिंदवाड़ा
- साहित्य की बात कविता प्रसार सम्मान - विदिशा
* पता
ग्राम + पोस्ट - झिरी,
तह. - छपारा
जिला - सिवनी (मध्य प्रदेश)
480887
मोबाइल नं. 9406706752
9303918321
E mail - thakuraasheesh123@gmail.com
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें