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मुख़्तार अहमद की कविताएँ

 


1.
कविता का अरण्य 
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कविता का अरण्य 
बिंब सा भटकता कवि 
चिड़िया होने का स्वप्न औ
कोकिल स्वर-सी आस 
काग भैरव-सा राग 
अछंद में छंद का भास 
पगडंडी नहीं होती वन में 
कंटक झाड़-झंखाड़ का वास
कवि का फूलता श्वास
कविता फुनगी पे खिलती 
जड़ से जुड़ी रहती 
और कवि की जड़ न होती 
फुनगी आँखों से ओझल रहती
शुष्क ध्वनियों से सजग 
व्यंजन से शब्द विलग 
कवि कविता नहीं कहता 
कविता कहती कवि मन 
ज्यों धरती का आचमन 
त्यों आकाश का तर्पन
ओझल सभी दंभ जैसे 
बरखा का उद्गम
घनेरी घटा का अवरोह 
नाद अवनाद का निनाद 
अवधू सा मन 
अघोरी सा तन 
ज्यों कलंदर देखे आसमान
बीच भंवर समस्त निदान 
ना काग़ज़ ना क़लम 
लाज़िम लफ़्ज़ अलम
अलंकार के अलंकरण 
शजरों पे ज्यों समर 
आलंबन सी लंबित लताएं 
तमसो मा ज्योतिर्गमय
झलकता भास्कर किरणमय।।

2.
मेरा बैर किसी से नहीं 
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मेरा बैर किसी से नहीं
न ज़िंदगी न मौत से
लकीर जो खींची तुमने
उसे मैं ख़ारिज करता हूँ
एक सब एक रंग
पहाड़ दरिया पेड़ सभी मेरे
और मरूस्थल भी
आंखों में समाया आलम
फिर क्यों खंडों में विभाजित
धरती आकाश समंदर
दो कदमों की नाप
तीसरा धरा अधर
नहीे समाता पाताल अब  कोई
नृप नहीं उदार
कैसे भिक्षुक उम्मीद करे
निस्वार्थ दान
मन समाया खोट
सेवक
करता नहीं कोई काम 
दान से पेट भरता
श्रमहीन जीवन
अखरता
दानवीर आहें भरता
लख चौरासी की ओट
बाट  जोख  वैतरणी
तारण नहीं तारणहार
अपनी टोकरी अपने सर
युग बीते  कल्प
नव युग
नव सोच
गली गली गलीच तारणहार
बसते
उम्मीद लगाये लोग
पीछे भगते
एकल सत्य रब 
बाकी झूठा सब।।

3.
सन्यासीपन
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ज़िंदा रहने की जद्दोजहद
और मरने का इंतज़ार
एक शून्य  / दायरा
औ भटकता जीवन
सरल कुछ भी नहीं 
 सन्यास  / विरक्त वनगमन
सम्भव तो है तोड़ना दायरा
 सभी तो नहीं हो सकते
सन्यासी भेग धर कमण्डल उठा
प्रस्थान सम्भव है भिक्षा प्राप्ति
 सन्यास/ देगा कौन?  
साधु विरागी फ़क़ीर
लेवत सभी फिर देवत कौन
तो अंततः सम्भव नहीं
तोड़ना दायरे फिर
प्रश्न / यथावत नहीं समापन 
सन्यास, फ़क़ीरी सम्भव नहीं
पर सम्भव है सन्यासीपन ।।
 

4.
अजब शख़्स है 
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अजब शख़्स है
गर्मी सुखा देती है
सर्दी सिकुड़ा देती है
बारिश भिगा देती है
 घर नहीं जाता;  बेघर है
शायद बेपरवाह या फिर बेहुरा
ऊतन ही जाना राम
तुलसी बताएं जैतना राम
कुछ के पास टूटा घर होता है
कुछ के पास टूटा परिवार
कुछ के पास टूटा विश्वास
और उसके पास तीनों कदाचित 
कुछ समझ नहीं आता अब 
अमीर है या फिर फ़क़ीर 
किंतु धीर गंभीर सदा मर्यादित।।

5.
हाँ हँस लो अच्छा है हँसना भी उसे देख 
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हाँ  हँस लो अच्छा है हँसना भी उसे देख 
चलने से क्या बिगाड़ लेंगे
वैसे बैठे रहने से भी क्या सुधार लिया
सो चल दिया चलना ज़रूरी है, ज़िंदों के लिए
और फिर मुर्दे कब चला करते हैं 
धरती को देखते चलने से दिखते हैं 
धरती पर चलते कुछ और जीव / प्राणी 
तेरे जैसे मेरे जैसे जो पहचानते हैँ
ज़मीन व हवा का रिश्ता 
और पानी की अहमियत
समतल मिट्टी की उदारता और कंकड़ों  का बांकपन 
दूर तक फैले उजाले के पीछे छिपे अंधेरों की झांकन
कुछ आभाहीन निस्तेज कुम्हलाये चेहरों पे रेखांकित 
करुण भाषा का  पठन 
प्रकृति  की उन्मुक्तता का चलन 
औ सूरज के ताप का वचन 
जिंदा पेड़ों के बीच बीमार व मार दिये गये
 जवान वृक्षों का क्रन्दन
बेशक बुद्ध न बना पाये किंतु 
संवेदन अवश्य बनता है 
अंततः संवेदना ही मनुष्यता है ।।


मुख़्तार अहमद

जन्म तिथि - 5 अप्रैल 1973
शिक्षा - स्नातकोत्तर, पीएचडी; बच्चन के काव्य में युग चेतना।
काव्य संग्रह - तुम अब स्वप्न नहीं देखती ( हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा अनुमोदित एवं आर्थिक सहायता द्वारा अनुग्रहित, 2007)
ज़िंदगी जब हिसाब मांगती है ( हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा अनुमोदित एवं आर्थिक सहायता द्वारा अनुग्रहित 2013)
राष्ट्रीय अखबारों में अनेक आर्टिकल तथा विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ तथा समीक्षाएँ प्रकाशित।
संपर्क ः  56, धीरपुर, निरंकारी कॉलोनी, दिल्ली-110009
मोबाइल - 9350147760

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