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विनीता बाडमेरा

कहानीकार गोपाल माथुर का पद्य-सा गद्य जो बहता और आत्मा को तर कर देता है। संवेदनाओं के धागों से गुंथे उनके कहानी संग्रहों और उपन्यासों में कहीं पहुँचना नहीं होता, लेकिन मन तक पहुँच जाती हैं उनकी बातें। ऐसे कथाकार का इन दिनों 'पहाड़ पर बारिशें' काव्य संग्रह पढ़ा। काव्य संग्रह में कुल सौ कविताएं हैं।
किताब के पहले पृष्ठ पर जहाँ अनुमानतः समर्पण लिखा होता है,  वहाँ लिखा हुआ है -
“एक अ-कवि के
खंडहर पर
छिटके
धूप के टुकड़ों को”
        निगाह एकबारगी वहीं ठिठक कर रह गई, क्योंकि इस तरह का दर्शन पहले कहीं पढ़ा नहीं था। उसके आगे के पेज पर अमेरिका के प्रख्यात कवि और निबंधकार जोसेफ ब्रोडेस्की की कविता पर लिखी कुछ पंक्तियां हैं। अंतिम पंक्ति में इस अमेरिकन कवि ने लिखा था कि “मानवीय हृदय की फूहड़ता के विरुद्ध कविता एकमात्र बीमा है।” मुझे लगता है, शायद यह पंक्ति कविता को पढ़ने-लिखने के लिए बड़ी-सी झप्पी है।
         इसके पश्चात ही एक लंबी कविता या आत्मकथ्य है, जिसे गोपाल जी ने अपने बचपन की स्मृतियों को संजोते हुए “पहाड़ो से उतरता है कोई” शीर्षक से दिया है। माउंट आबू जैसी खूबसूरत पहाड़ी जगह पर जन्मे गोपाल जी अपने कथ्य की अंतिम पंक्तियों में कहते हैं कि-
यदि कुछ नहीं छूटा/तो वे हैं पहाड़,
वे आज भी मेरे साथ हैं जैसे बिछुड़े ही न हो
         मैंने पाया कि शायद यही सबसे बड़ा कारण है उनकी कहानियों और उपन्यासों में पहाड़ों का बार-बार आना। बात-बेबात आना। दुःख में दुख का बड़ा पहाड़-सा होना और सुख में इसी पहाड़ पर बारिशों का होना।
         जहाँ तक मेरी स्मृति साथ देती है, कथाकार गोपाल जी का “तुम” काव्य संग्रह के बाद यह दूसरा काव्य संग्रह है। इस काव्य संग्रह की कविताओं को उन्होंने चार भागों में बांटा है।
         पहला भाग, जिसे कवि ने “उम्र के दिसंबर में प्रेम” का शीर्षक दिया है। प्रेम उम्र के किसी भी महीने में हो सकता है, तो फिर दिसंबर में क्यों नहीं! फिर यह तो प्रेम है, किसी से पूछ कर, उम्र देख कर थोड़े ना दिल पर दस्तक देता है!
        इस “उम्र के दिसंबर के प्रेम” में लिखी इन कविताओं की पंक्ति-पंक्ति कितनी ही अधूरी और पूरी प्रेम कहानियाँ हैं। पहली ही कविता में अजमेर शहर का आनासागर भी है, तो बेगम अख्तर की उदास ग़ज़लें भी। अतीत भूलाएं भूलता नहीं। प्रेम की टीस रह-रहकर उठती है। वे लिखते हैं-
पर न तो तुम खो सकती हो/ और न ही छिप पाना संभव है तुम्हारे लिए/ क्योंकि मेरे गुजरे हुए वर्षों का नाम है रेवा!
और आगे वे यह भी लिखते हैं कि-
रेवा मेरा अतीत है/मेरा बीता हुआ कल है रेवा/मेरे इतिहास का नाम है रेवा!
उसी “रेवा” नाम के इतिहास को वे बार-बार पढ़ते हैं। कांपती आवाज उसी नाम को पुकारती है। शायद कुछ नाम मिटाएं नहीं जाते। कुछ यादें कभी धुंधली नहीं होतीं। ऐसी ही “उम्र के दिसंबर में प्रेम” की एक और बहुत ही कोमल कविता है, जो थकती और उम्र झलकती देह को दिखाती है -
तुम मिली भी हो/तो उम्र के ऐसे मोड़ पर/जब सुर्ख गुलाबों की रंगत फीकी पड़ चुकी है/जब तुम्हें देखने के लिए/इम्प्लांट करनी पड़ती हैं दूसरी आंखें/स्पर्श तो दूर रहा/आवाज़ तक ठिठकती सी पहुंचती है/तुम तक
         एक उम्र के बाद देह को चाहना गौण हो जाता है। अपने प्रिय का सामीप्य ही सबसे मुख्य लगने लगता है। यह उम्र के दिसंबर का प्रेम भी तो ऐसा ही है।
       काव्य संग्रह के दूसरे भाग में “स्मृतियों की खुरचन” है और उन्हीं खुरचनों के लिए वे लिखते हैं कि “अहसासातों के सिलसिले कुछ अभिव्यक्त और कुछ अनभिव्यक्त”। यहाँ पर छोटी-छोटी कोमल भावनाओं को दर्शाती कविताएं हैं। एक ऐसी कविता की बानगी देखिए -
भाई / दरवाजा तो खोलो/देखो, धूप तुम्हें मिलने आई है/अजनबी की तरह नहीं/बल्कि किसी पुराने दोस्त की तरह/जिसे तुम भूल चुके हो/जीवन की आपाधापी में
        ए. सी. में पूरा दिन बिताने वाले धूप को कहाँ जानते हैं! फिर जान लें तो नाता कहाँ जोड़ पाते हैं। लेकिन पुराने दोस्त जैसे जिंदगी के हर मोड़ पर साथ चलने को उतारु हैं,  वैसे ही तो यह धूप है। इस छोटी-सी कविता में धूप के न जाने कितने ही अर्थ छुपे हैं।
       इसी प्रकार संग्रह के तीसरे भाग- “जैसे चांदनी चली आती है चुपचाप/खुली खिड़की से किसी-किसी रात” की कविताओं को हम पढ़ें तो यह कविताएं अलग मिजाज की कविताएं लगती हैं। लंबी, छोटी और फिर हर पंक्ति में एक दो शब्दों में लिखी ये कविताएं अनायास ही उदासी का रंग घोल देती हैं। पचपन क्रमांक की कविता को पढ़ना अलग ही अहसास है। वे लिखते हैं कि-
झड़ते/पत्ते/चुपचाप/मौसम गाता/उदास गीत/समय लां घ ता / स्वयं खुद को/नहीं होतीं/सूखे पत्तों की/छायाएं
        अंतिम पंक्ति तक मन गहरे विषाद से भर जाता है। ऐसी ही एक और क्रमांक सतहत्तर की कविता में जीवन का गहरा दर्शन छुपा है। वे कविता के मध्य में लिखते हैं-
एक सी नहीं होती/दो सुबहें/न दो शामें/और न ही/दो नदियों का पानी
दो दुःख भी/कहाँ होते एक से
        वाकई जीवन में कुछ भी तो समान नहीं है। और अंत के चौथे भाग में “पीछे लौटते हुए” शीर्षक से उनकी छोटी कविताएं, जो उन्होंने अपने उपन्यासों में लिखी हैं, संकलित हैं। इन कविताओं के बारे में गोपाल जी कहते हैं कि-
बहुत कुछ छूट जाता है/पर पूरा छूटता नहीं
बहुत कुछ बीत जाता है/पर पूरा बीतता नहीं।
       अस्तु किसी खास विषय को लेकर ये सौ कविताएं नहीं लिखी गई हैं। गोपाल जी की संवेदनाओं के पन्ने दर पन्ने खुलते चले जाते हैं और जैसे अपने आप ही कागज पर उकर जाती हैं कविताएं। एक कहानीकार को कवि के रुप में देखना भी अनूठा अनुभव है। गोपाल जी खुद स्वीकार करते हैं कि यह उनकी विधा भी नहीं है, तथापि एक रचनाकार को यह हक है कि वह एक विधा से दूसरी विधा में हस्तक्षेप कर सके।
        कोरी कल्पना की मिट्टी से इन कविताओं का निर्माण नहीं हुआ है। मन के कुछ अहसास हैं, जिनमें जीवन का फलसफा भी छुपा हुआ है, उन्हें ही शब्दों का जामा पहना कर इन्हें लिखा गया है। इन्हें पढ़ते हुए एक-एक कर कई कहानियों के दृश्य उपस्थित होते हैं। कितने ही मूक प्रेम की आवाजें कानों में गुंजती हैं! कितना ही अनकहा दर्द आंखों से होकर गुजरता है! एक कहानीकार का कवि होना देखने का मन हो तो अवश्य पढ़ लेनी चाहिए “पहाड़ पर बारिशें”।
मन को भिगोते इस दूसरे काव्य संग्रह के लिए गोपाल जी को बधाई।

पुस्तक - पहाड़ पर बारिशें
रचनाकार - गोपाल माथुर
प्रकाशक - रश्मि प्रकाशन, लखनऊ
मूल्य-240/

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