तुम्हारी कीलें
रास्ते पर बिछी
तुम्हारी जो कीले हैं,
समय की शिला पर लिखीं-
तुम्हारी मजबूरियों के
शिलालेख हैं।
खोखले लोकतंत्र में
कब तक
चलेंगे, हथौड़े वर्चस्व के?
थोड़ा सा मना लो ज़श्न
बसन्त के आने का
कर लो - घमण्ड
अपने सही साबित
होने का।
कब तक
लोकतंत्र को रखोगे
सिलबट्टे पर?
तुम्हारी पीसने की
कला ने
पीस कर रख दिया है
जातीय मूल्यों को।
सहसा खत्म सी हो गई
अभिव्यक्ति की प्रखरता।
अब, कब तक...
कहाँ तक...
भागोगे
संविधान की आत्मा से?
रास्ते पर इकट्ठी है
जन मन गण की भीड़
रखकर लोकतंत्र को
हथेली पर
कब तक नचाओगे
जो निरर्थक चिल्लाती रहेगी
लोकतांत्रिक देश की
आत्मा को
बचाने के लिए।
कहीं ऐसा न हो
कि
उसकी मजबूर चिल्लाहट
बदल जाए
क्रान्ति की
मजबूत आवाज़ में,
और -
खड़ी हो जाए
उखाड़ फेंकने के लिए
तुम्हारी बिछाई
क्रूरता की पर्याय
कीलों की।
यह कैसा देश है
यह कैसा देश है
देश का नेता कैसा है
अपने दर्प और हुकूक में
एकदम मस्त-सा हो गया है।
इतनी महँगाई क्यों है
घनघोर बेरोजगारी क्यों है
आखिरकार युवा
निराशा के आकुंठ में डूबे क्यों हैं?
इन जोरदार प्रश्नों को वह
आखिरकार प्रश्न क्यों नहीं मानता है?
लगता है-
प्रश्नों के उत्तर में
कहीं पराजय का भय तो नहीं
इसीलिए
चौथे स्तम्भ के साथ
वह भी निरुत्तर-सा है
कहीं वह
चापलूसों की तुच्छताओं के अधीन तो नहीं
अभी तो कुछ-कुछ फर्क पड़ता है
आगे की कहना तो बेमानी-सा लगता है
मगर देश किसी नेता से नहीं होता
देश किसी विधाता से नहीं होता
देश तो संविधान से होता है
संविधान की आत्मा से होता है।
यह कैसा देश है
यहाँ कैसा स्वराज है?
वंशवाद
वंशवाद की बेल
खत्म कर देती है
अवसर, अधिकार,
समन्वय, भाईचारा,
समरसता की निपुण काठी को।
खत्म कर देती है
उन संघर्षों को,
जो उन्नति के पथ पर
चल कर -
समाज को नई उच्चाइयों पर
ले जाने के लिए तैयार होते हैं,
उनका समूचा संघर्ष
भेट चढ़ जाता है
वंशवाद की बेल पर।
प्रतिभा
अनकहे लफ्ज़ आँखों में लिए
निहार रही होती है
गलियारों के कोने से
घनघोर विक्षिप्त अवस्था में।
क्योंकि-
वंशवाद खत्म कर देता है
विकास के बीज को
जो जीवन संघर्ष की
ज्वाला में तपकर
प्रस्फुटित होता है
छा जाने को
सामाजिक न्याय और तानो-बानों में।
खुद भी इंतज़ार करो
हम तो आराम से थे
अपने झुरमुटों, पेड़ों और झाड़ियों के बीच
तुम लोग
खामखाँ अपने
आलीशान महलों का आराम छोड़कर
जंगलों में आ गए,
और रौंद डाला है
अपने वहशीपन से पूरे जंगल को
कुछ तो लिहाज़ कर लिया करो
अपने इन्सान होने का,
और अगर शर्म नहीं आती है तो
खुद भी इंतज़ार करो
मरने के लिए
एकदम से मिटने के लिए
शायद
तुम्हारी भी कोई पीढ़ी बची रहे
तुम्हारी लगाई हुई
आग को बुझाने के लिए।
तो तुमने छल किया
तुमसे मैं जब
हराया नहीं गया
गिराया नहीं गया
तो तुमने छल किया
प्रपंच किया
हर उस जगह पर
जहाँ पर तुम कर सकते थे।
तुमने अपना होने का दावा किया
जो तुम नहीं थे।
तुमने विश्वास दिलाया
हरदम अज़ीज होने का।
बहुत करीने से
मेरे भरम को तुमने ही पालना सिखाया
कि तुम हो तो
मेरा मैं ज़िन्दा है
मेरा वजूद ज़िन्दा है।
फिर धीरे-धीरे सरककर
एक दिन तुम ज़ुदा हो गए
मुझसे
जैसे ज़ुदा हो जाती है
साँझ सूरज से, रात दिन से
मगर मेरा मैं ज़िन्दा रहा
मेरा वजूद ज़िन्दा रहा
लेकिन न तुम रहे,
न तुम्हारे एहसास रहे
बस तुम्हारा भ्रम रहा,
तुम्हारा छल रहा।
रंगमंच
मुझे इंतज़ार है
अपनी बारी का रंगमंच पर
अभी नेपथ्य में
किरदार को जी रहा हूँ
सुना है,
रंगमंच माँज देता है
तपा देता है,
अभिनय की घनघोर प्रक्रिया में
उस अभिनेता को
जो सीख रहा है
अभी-अभी किरदार में उतरना।
लिबास
बहुत मुश्किल है
सही आदमी की पहचान
कपड़ों के लिबास में,
विचारों के लिबास में,
धन के लिबास में,
कर्म के लिबास में,
ईमानदारी के लिबास में।
बहुधा रंगों से सराबोर है--
वह बहरूपिया।
बड़ी मुश्किल है
रंगों की भीड़ में
उस संकीर्ण आदमी की सटीक पहचान।
मनुष्य और मौसम के मिजाज़ की
समझ पैदा करने वाले शब्द
अपनी अहमियत
खोते जा रहे हैं।
लिबास की बढ़ती कीमत
और -
आदमी की घटती कीमत के बीच
कहीं अदृश्य सा
हो गया है
सहजता से सराबोर
सुघड़ आदमी।
जो दिखता है वो बिकता है
जैसे मुहावरे के इस दौर में
भावनाओं की,
सम्भावनाओं,
संबंधों का दायरा
सिकुड़ता जा रहा है।
बाज़ार का शिकार आदमी
अपने अंदर के
इंसान को
स्वार्थ के लिबास में
लपेटता जा रहा है
मानो!
वह भूल गया हो
नाश और निर्माण की
परिवर्तनकारी प्रक्रिया को।
दौर
चिड़ियों का चहचहाना
अब कम-सा हो गया है
जो शाखाएँ थीं
वो अब नहीं रहीं
जिन पर उन्मुक्त चहचहाहट से
सांस लेती थीं ये
सृष्टि के बनाये
अद्भुत गौरव में,
पत्तियों की जो सरसराहट थी,
अब सन्नाटे में हो गईं हैं - तब्दील,
जो पंछियों को जोड़ती थी
मनुष्य जीवन की
उम्मीद भरी
सांस से।
सारा आकर्षण
तिरोहित-सा हो गया है
उस पेड़ के प्रति
जो कभी गुलज़ार था
प्रकृति के बनाये हुए
नियमों के प्रति
भूमण्डलीकरण के भयानक दौर ने
खत्म कर दिया
प्रकृति के स्वाभाविक, संवेदनशील
सारभौमिक नियमों को
भेंट चढ़ गए हैं -
सारे घरौंदे,
क्योंकि
कोसो और भूल जाओ
जैसे निर्मम नियमों
के इस दौर में
मतलबी मनुष्य ने
अपने से इतर
अन्य जीवों के
जीवन को
ना घर का छोड़ा
ना घाट का।

पवन कुमार सिंह
जन्म : उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद के गांव - धवरियासाथ में 8 नवंबर, 1984 को।
शिक्षा : प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा जनपद मऊ से ही प्राप्त की। स्नातकोत्तर स्तर तक की उच्च शिक्षा जनपद-वाराणसी के ‘काशी हिंदू विश्वविद्यालय’ से प्राप्त करने के पश्चात प्रयागराज में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी कुछ समय व्यतीत किया।
लेखन कार्य : कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। कुछ कविताएं साझा-संग्रहों में भी प्रकाशित हुई हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कई मंचों पर महत्वपूर्ण कविताओं का मंचन।
कार्यक्षेत्र व रुचियाँ : वर्तमान में उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग में सरकारी शिक्षक के रूप में कार्यरत। कविता-लेखन व पाठ के साथ-साथ समाज-सेवी के तौर पर भी सक्रिय।
सम्पर्क सूत्र : फ्लैट नंबर एल. ए. (306), एल्डिको सुकृति-प्रीमियम, एल्डिको सिटी, आई. आई. एम., लखनऊ -226013 (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल : 9936526219
ईमेल thakurp9singh@gmail.com
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